दो एशियाई महाशक्तियों के लिए क्या महत्वपूर्ण है?
चीन और भारत एशिया में बड़ी जनसंख्या वाली दो प्रमुख क्षेत्रीय ताकतें हैं तथा दुनिया में तेजी से उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से हैं। बीते 70 सालों में पीछे जा कर देखें तो, चीन और भारत के संबंध असाधारण विकास के रास्ते से गुजरे हैं। 21वीं शताब्दी में, दोनों देशों ने शांति और समृद्धि के लिए रणनीतिक और सहयोग भागीदारी की स्थापना की है और द्विपक्षीय संबंधों के विकास को पूरी तरह से पाया है।
लेकिन इस बार, चीन और भारत अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। गत वर्ष सीमा पर हुए संघर्ष दोनों देशों के बीच के रिश्तों के लिए "नया मोड़" लेकर आया है। मई 2020 से, भारत और चीन के बीच तनाव चल रहा है। आज, चीन-भारत संबंध नए दो राहों पर खड़ा है।
गत वर्ष 15 जून की रात, चीन और भारत के सैनिकों के बीच गलवान घाटी में हिंसक संघर्ष हुए, उसके बाद से दोनों देशों के बीच तनाव बेहद बढ़ गया। झड़प के बाद, भारत में चीन विरोधी भावनाएं बढ़ गयीं, जिसमें भारत में बिक रहे चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मांग ने जोर पकड़ लिया। इसके अलावा, कुल मिलाकर व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले 267 चीनी ऍप्स और डेस्कटॉप ऍप्लिकेशन्स जिसमें पबजी, टिकटॉक, वेइबो, यूसी ब्राउज़र, वीचैट, शेयरइट, कैमस्कैनर आदि शामिल हैं, जिन्हें भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिये गए।
बहुत सारे लोग इस घटना की तुलना 2017 में डोकलाम (तोंग लांग) गतिरोध से कर रहे हैं, जहां भारत और चीन के बीच टकराव 73 दिनों तक चला। उसके बाद, दोनों एशियाई शक्तियों ने इस संघर्ष और तनाव को समझ और सूझबूझ के साथ से ख़त्म किया। इस बार, चीन और भारत इस तनाव को राजनयिक और सैन्य स्तर संवादों से कम करने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच सेनाध्यक्ष स्तर पर बातचीत चल रही है। दोनों देशों की सीमाओं पर सेनाओं के बीच समझौते के जरिए गतिरोध ख़त्म करने के लिए सैन्य-स्तर संवाद को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अप्रैल 2018 में, वुहान में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो दिवसीय अनौपचारिक बैठक की, जिसने डोकलाम विवाद को पीछे छोड़ते हुए चीन-भारत रिश्तों में नई ऊर्जा भर दी। उस अनौपचारिक संवाद को "दिल-से-दिल उपक्रम" कहा गया। इसके बाद जब 2019 में राष्ट्रपति शी चिनफिंग भारत दौरे पर आए तो प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण भारतीय परंपरा का पालन करते हुए, तमिल पारंपरिक पोषक पहनकर महाबलीपुरम में उनका स्वागत किया और अनौपचारिक तौर पर उनसे मिले।
असल में, इन बैठकों का मकसद दोनों देशों के बीच के विवादास्पद मामलों पर सहमति बनाने के लिए हल ढूँढना था। दोनों देशों को पता है कि सिर्फ सहयोग और समन्वय के ज़रिये ही वे विकास के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं, और समझौता एक उपाय है जिसके ज़रिये सीमा विवाद को सुलझा सकते हैं। पिछले 40 सालों में, चीन और भारत दोनों ने सीमा पर शांति और स्थिरता को बनाए रखने की कोशिश की है।
चीन और भारत को दुनिया के सभ्य देशों में गिना जाता है। इतिहास में, दोनों देशों ने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है। दोनों देशों ने सिर्फ विश्व की संस्कृति में ही योगदान नहीं दिया है बल्कि एक-दूसरे के साथ सांस्कृतिक विकास में अहम योगदान निभाया है। अगर भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक लेन-देन नहीं होता तो, दोनों देशों के सांस्कृतिक विकास कभी होते ही नहीं। भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक संबंध इतने करीब और गहरे हैं कि पूरे विश्व में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा।
यह स्पष्ट है कि सांस्कृतिक विनिमय दो देशों के बीच मन-मुटाव को कम करने और उनके लोगों के बीच आपसी समझ को बेहतर करने में मददगार है। वर्तमान में, दोनों देश विश्व की शांति में महत्वपूर्ण किरदार निभा सकते हैं। विश्व की 40 फीसदी आबादी इन दोनों देशों में रहती है। अगर ये दोनों देश साथ हैं तो पूरा विश्व उनका अनुसरण करेगा। यह बेहद जरूरी है कि दोनों देश एक दूसरे के हितों को समझें और सम्मान दें। एक दूसरे के साथ सहयोग दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने का आधार है।
कोविड-19 से उभरे आर्थिक संकट से सामना करने के लिए, मोदी सरकार ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश शुरू कर दी। भारत को पांच चीज़ों की जरूरत है: उद्देश्य, समावेशन, निवेश, मूलभूत सुविधाएं और नवप्रवर्तन तीव्र विकास के रास्ते पर जाने के लिए जरूरत है। लेकिन लक्ष्य को पाने के लिए, भारत को चीन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। जिस राह पर चलकर चीन पिछले 40 सालों में स्वावलम्बी बन गया और दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन के उभरा है; वे सभी तकनीकी कदम और भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रहा है।
साल 2021 से, चीन 14वीं पंचवर्षीय योजना में प्रवेश करेगा। इस कालावधि में चीन का विकास अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए अधिक बाजार के मौके देना जारी रखेगा। चीन बाहर की दुनिया के लिए बड़े स्तर पर खुलेगा और आपसी हितकारी सहयोग में एक नया दौर बनाएगा। इसमें और अधिक अन्य क्षेत्रों में खुलेपन को प्रोत्साहित करना तथा कुछ रुझानों के माध्यम से, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए चीन के बड़े बाजारों की बढ़त पर निर्भर रहने व परस्पर विनिमय के फायदों को समझना शामिल है। चीन अपने खुलेपन को विस्तृत रूप से आगे बढ़ाएगा। वह व्यापार और निवेश उदारीकरण व सरलीकरण, और अग्रिम व्यापार नवप्रवर्तन तथा विकास को प्रोत्साहित करेगा।
यदि भारत धीरे-धीरे अपने उद्योगों, व्यापारों, निवेश, मूलभूत सुविधा, और नवप्रवर्तन को चीन के साथ मिलकर बढ़ाता है तो, उसका आत्मनिर्भर बनाने का सपना बहुत दूर नहीं है। मैं समझता हूं कि भारत का "नया भारत" और चीन का "नया काल" के प्रयास दुनिया के लिए सर्वाधिक हित में होगा क्योंकि पिछले 2000 सालों में से 1600 साल चीन और भारत दुनिया के आर्थिक विकास की इंजन के रूप में काम करते आ रहे हैं।
इसमें कोई शक नहीं है कि भारत और चीन का सामाजिक और राजनीतिक प्रणाली अलग-अलग है, फिर भी दोनों प्राचीन पूर्वी देश हैं। पूरी दुनिया विश्व के तेजी से विकसित हो रहे देशों के विकास को लेकर आशावादी है। वहीं, वे विश्व के और पश्चिमी दुनिया के बड़े देशों की रणनीतिक बाधाओं का सामना करते हैं।
हालांकि, 21वीं सदी को एशिया की शताब्दी के तौर पर माना जा रहा है। एशिया में कई देश तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहे हैं। अर्थव्यवस्था में तीव्र उन्नति के साथ संस्कृति भी समृद्ध हो रही है। यह कई एशियाई देशों की राजनीतिक, आर्थिक उन्नति को बढ़ावा देगा। चीन और भारत इस विकास में महत्वपूर्ण किरदार निभा सकते हैं। वे एशियाई देशों के प्रमुख भागीदार हो सकते हैं और उनके राजनीतिक और आर्थिक विकास को सुविधाजनक बना सकते हैं। दुनिया में बहुत सारे लोग विकास के इस दौर को समझने लगे हैं। ऐसी परिस्थिति में, एक-दूसरे से सीख कर अपने देशों को बेहतर बना सकते हैं।
वैश्वीकरण के दौर में, सभी देश गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं जिसमें संसाधनों और आर्थिक मौकों का निर्धारित प्रयास के साथ दोहन भी है। वर्तमान में भारत को अपने "मेक इन इंडिया" अभियान को मजबूत करने के लिए मूलभूत सुविधा, प्रौद्योगिकी, और कच्चा माल की जरूरत है, जो चीन और अन्य देशों पर निर्भर है। भारत अपने लक्ष्य पर सहयोग के जरिये पहुंच सकता है।
मेरा मानना है कि चीन और भारत के पास पर्याप्त दूरदृष्टि और क्षमता है, साथ मिलकर "ड्रैगन-हाथी टैंगो" को समझने के लिए, जिससे अगले 70 सालों में शानदार भविष्य बनाने के लिए और मानव साझे भाग्य वाले समुदाय के निर्माण में नया अध्याय लिख सकते हैं। भारत और चीन के बीच सहयोग और विनिमय को मजबूत करने और पारंपरिक मित्रता को आगे विकसित करने के लिए, यह बेहद जरूरी है कि वे एक दूसरे को समझें और एक-दूसरे के हितों का ख्याल रखें।
टकराव के बीच, कोई भी देश उन्नति और विकास नहीं कर सकता। भारत और चीन के रिश्ते और भाग्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। संबंधों को खराब नहीं करना चाहिए, जिससे वह बाद में ठीक नहीं हो सके। यह समझने की जरूरत है कि चीन और भारत के भविष्य का विकास उज्ज्वल है, और एक दूसरे के हितों का ध्यान रखना ही होगा।
(लेखक : अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप (सीएमजी), पेइचिंग की ओर से रिपोर्टिंग करते हैं। वे चीन में पिछले 10 सालों से हैं)


