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तीसरा दिन 13 अगस्त
2009-08-14 17:08:33

सुबह नाश्ता करके तय हुआ कि हमारा समूह पहले तहुंग रेडियो स्टेशन जा कर वहां ताई भाषा की लोकप्रिय गायिका से मिलेगा और बातचीत करेगा.शहर से होते हुए हम गाड़ी में तहुंग रेडियो स्टेशन की ओर रवाना हुए तो शहर पर एक नज़र डालने का मौका मिला.हल्की हल्की बूंदाबादी में रोज़मर्रा के जीवन की चहल-पहल बिलकुल वैसी ही थी जैसी चीन के किसी भी अन्य शहर में दिखाई पड जाती है.चीन में शहरों का विकास यह ध्यान में ऱख कर नहीं हुआ कि यह दूर दराज के इलाकों में सड़कें छोटी रख लें,या इमारतें कम ऊंची बना लें.बेजिंग और त हुंग में या रुअली में विकास का एक जैसा मॉडल यह सुनिश्चित करता है किसी भी तरह का भेदभाव लोगों के साथ न हो.रेडियो स्टेशन ज्यादा दूर नहीं था.पहुंचने पर पाया कि सब हमारा इंतजार कर रहे हैं.ताई जनजाति की 63 वर्षीय लोक गायिका वांग श्यांग या से काफी देर तक बातचीत हुई,उन्होंने बताया कि वे किसान परिवार से हैं और अपने पिता से उन्होंने गाना सीखा है.अब वे आर पार के ताई जनजाति के लोगों में बहुत लोकप्रिय हैं ,लोगों को अपनी छूटी जड़ों से जोड़ने का वह कोमल तंतु का काम कर रही हैं. जो लोग सीमापार थाईलैंड में रहते हैं , उन के गीत सुन कर वे अक्सर भावविभोर हो जाते हैं और उन्हें पत्र लिखते हैं और बहुत से लोग मौका मिलते ही सीमापार त हुंग आ कर उन से मिलना चाहते हैं और बातचीत करना चाहते हैं,उन्होने यह भी कहा कि अब विकास के दौर में चीन की जनजातियों का इतना अच्छा विकास हुआ है,कि नई पीढी़ के युवा शहर जा कर नौकरी करना पसंद करते हैं,गांव में रह कर खानदानी पेशा करने का उन का मन नहीं है.उन की खुद की बड़ी बेटी इस समय शनचन में काम करती हैं.उन्हें इस बात का हल्का सा दुख भी था कि धीरे-धीरे विकास की इस दौड़ में पंरपरा,और रीतिरिवाज खतम हो जाएंगे.उन्होंने हमारे आग्रह पर पांच छह ताई जाति के गीत भी गा कर सुनाए..गाना सुनते हुए हमें लगा जैसे किसी पहाड़ी गांव में हम पहुंच गए हों.उन्होंने यह भी बताया कि ताई भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए वे अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रही है.

उस के बाद हम त हुंग के लुशी शहर के प्रशासन के सचिव के दफ्तर गए.उन से हुई बातचीत में उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार त हुंग की सरकार केंद्रीय सरकार की नीतियों विशेष कर अल्पसंख्यक जातियों के लिए बनाई गई नीतियों के तहत इस क्षेत्र का विकास कर रही हैं...जनजाति क्षेत्रों में शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार के लिए सरकार ने अब तक जो कदम उठाए हैं उस से इस क्षेत्र में गरीबी,अशिक्षा और बेराजगारी दूर हुई है,और यह भी कि अब सरकार इस क्षेत्र में उद्योगों का विकास करने की सोच रही है.इन सब बातों को शहर के मेयर ने बाद में और भी उत्साह से उन्होंने हमारे सामने रखा.उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक जनजातियों के सामने सब से बड़ा सवाल विकास का है,और जब इस दिशा में उन्हें प्रत्यक्ष लाभ मिलने लगा है और इस क्षेत्र का तेजी से आधुनिकीकरण हुआ है,तो वे लोग अब अपने जीवन को और बेहतर बनाना चाहते हैं.बावजूद इस के कि अल्पसंख्यक जनजाति के लोग कितना भी विकास करें ,उन के प्रति सरकार की उदार नीतियां नहीं बदलेगीं जिन में यह नीति भी शामिल है कि अल्पसंख्यक जनजाति के लोग एक से अधिक बच्चे पैदा कर सकते हैं.इस से उन की जनसंख्या कम होने का खतरा दूर हो गया है。हमें यह भी मालूम हुआ कि सीमा व्यापार और आयात-निर्यात यहां की आर्थिक शक्ति का मेऱुदंड है.सरकार ने अने क उदार नीतियां बना कर विदेशी पूंजी को यहां आकर्षित किया है .हम ने शहर में जा कर यह भी महसूस किया कि इतनी तेजी से यहां का आधुनिकीकरण और विकास हुआ है कि देख कर लगता ही नहीं कि आप चीन के एस सीमांत प्रांत के शहर में घूम रहे हैं.

दोपहर का खाना ताई अल्पसंख्यक जनजाति के एक रेस्तरां में था,जहां ताई नृत्य और संगीत के साथ ताई विशेषता वाले भोजन का हम ने स्वाद चखा.खाने में हमारे साथ शहर के सचिव और मेयर भी शामिल हुए...शहर के मेयर स्वंय अल्पसंख्यक ताई जाति के हैं..और उन्होंने ताई लोकगायक के साथ आवाज से आवाज मिला कर ताई गीत गा कर हमें यह अहसास करा दिया कि चाहे वे शहर के मेयर हों लेकिन अपनी संसकृति नहीं भूले हैं.

वानतिंग हमारा अगला पड़ाव था.वानतिंग हमेशा से आर्थिक और सामरिक महत्व का स्थान रहा है,क्योंकि यह एक बार बर्मा और भारत के रेशम मार्ग का दक्षिणी-पश्चिमी भाग था,बाद में 1938 में यह युन्नान और बर्मा सड़क का टर्मिनस बना.जापान विरोधी युद्ध में बाकी दुनिया से जुड़े रहने का केवल वानतिंग मार्ग ही चीन के पास बचा था क्योंकि सारे समुद्री रास्ते बंद थे इसी रास्ते से देश के भीतर जरुरी सैन्य सामग्री पहुंचाई जा सकती थी.वानतिंग में म्यनमार के साथ 28.65 वर्ग कि मी लम्बी सीमा है.यहां कि कुल जनसंख्या 12000 है जिन में 45 प्रतिशत लोग तीन जनजातियों के हैं ये जनजातियां हैं हान,ताई और चिंग पो.और 15 प्रतिशत वे चीनी प्रवासी हैं जो जापान विरोधी युद्ध में चीन की रक्षा करने में मदद देने यहां आए थे..उन के द्वारा दी गई शहादत की याद में उन के बच्चों के प्रयासों से यहां एक स्मृति-स्थल बनाया गया है जहां हर उस प्रवासी चीनी का नाम और पता लिखा है जिस ने जापान विरोधी युद्द में मातृभूमि की मदद के लिए अपनी जान दी थी.

आज का वानतिंग एक विकसित शहर है,चौड़ी सडकें,दोनों ओर सजे हुई चमचमाती दुकानों की कतारें और व्यापारियों की चहलपहल.यहां आप को वह हर चीज़ दुकान या सुपर स्टोर में मिल जाएगी जो आप चीन के किसी भी बड़े शहर में खरीदने की सोच सकते हैं.वानतिंग सीमा पुल पर कुछ समय बिता कर हम ने दूसरे विश्वयुद्ध में इस पुल ने क्या भूमिका निभाई और इस पुल और जगह का क्या सामरिक महत्व रहा उस के बारे में एक छोटा सा संग्रहालय देखा,उस के बाद हम रात का खाना खाने के लिए म्यनमार चीन सीमा रेखा के बिलकुल पास धान व मक्का के खेतों के बीच स्थित एक स्थानीय रेस्तरां में गए.रात का खाना स्थानीय सरकार के कुछ पदाधिकारियों की ओर से था.यहां खाने में साथियों ने पूछा कि यह लिसलिसी सी सब्जी क्या है ,गौर से देखा तो भिंडी थी,चीन में भिंड़ी सिर्फ यहां देखने को मिली बाकी किसी जगह इस के दर्शन हमें नहीं हुए .जनजाति जीवन की संस्कृति और रहन सहन की एक ओर झलक देखने को हमें यहां मिली,जनजाति के लोग बहुत भावुक और संवेदनशील होते हैं और संबंध और दोस्ती के मामले में तो और भी ..वह भी जब खाने की दावत उन्होंने दी हो और शराब तो खाने में जरुरी है ही.आप पकड़े जाने पर पुलिस को विश्वास दिला कर छूट सकते हैं लेकिन अल्पसंख्यक जनजाति के मेहनवाजों की गिरफ्त से शराब में नहाए बिना कभी नहीं छूट सकते ....चीन में लोग एक साथ एक मेज़ पर बैठ कर खाना खाते हैं और खाने के समय मेहनवाज़ शराब का कप ले कर हर व्यक्ति के पास आता है...हर बार आप को उस के साथ अपने कप की शराब खत्म करनी होती है..इस तरह हर व्यक्ति जो आप के प्रति अपनी भावना प्रकट करना चाहता है कप शराब ले कर आप के पास आएगा और आप को उस के साथ खड़े हो तक अपने कप की शराब खत्म करनी होगी .हम सब लोग तो थोड़ी चालाकी,थोड़ी समझदारी से मेहमानवाजों की गिरफ्त में आने से बच गए लेकिन उन्होंने हमारे शिखर की अच्छी घेराबंदी की और ब मुश्किल रात नौ बजे के करीब उन की मेहमानवाजी खत्म हुई और हम मूसलाधार बारिश का बस के शीशों से नज़ारा देखते हुए काफी देरी से होटल पहुंचे..अल्पसंख्यक जनजाति के ऐसे खाने के समारोह में यदि आप जिद्द करते हैं और शराब नहीं पीते तो आप निश्चय ही अपने संबंधों को खराब करेंगे...और अपने मेहमानवाज को नाराज़ करेंगे ..और ऐसा करना तो शायद कभी नहीं चाहेंगे..

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