ह्वेनसान बौद्ध सूत्र का अध्ययन करने के लिये सन 628 वर्ष के शरद में थांग राजवंश की राजधानी छांग आन यानी आज के शी आन शहर से भारत के लिये रवाना हुए , फिर 19 साल के बाद बड़ी तादाद में सूत्र लेकर भारत से छांग आन वापस लौट आये । छांग आन लौटने के तुरंत बाद वे चीनी भाषा में बौद्ध सूत्रों का अनुवाद करने लगे । थाग राजवंश के राजा के आदेशानुसार ह्वेनसान ने सूत्रग्रंथ रखने के लिये ता य्येन स्तूप की डिजाइन की और निर्माण कर लिया । साथ ही ता य्येन स्तूप के बगल में राजा ने अपनी मां की स्मृति में महा त्स एन मंदिर भी वनवाया। महा वीर भवन इसी मंदिर का प्रमुख संगठित भाग है । इस महा वीर भवन की भव्यता को बहाल करने के लिये 2006 से इस भवन का पुनर्जीर्णोधार किया गया । करीब तीन साल के कठोर परिश्रम के जरिये अब यह महा वीर भवन बिलकुल नयी सूरत में नजर आता है और आलीशान बुद्ध मूर्ति की स्थापना भी की गयी है ।
चीन का भ्रमण कार्यक्रम अब आरम्भ होता है । ह्वेनसान बौद्ध सूत्र का अध्ययन करने के लिये सन 628 वर्ष के शरद में थांग राजवंश की राजधानी छांग आन यानी आज के शी आन शहर से भारत के लिये रवाना हुए , फिर 19 साल के बाद बड़ी तादाद में सूत्र लेकर भारत से छांग आन वापस लौट आये । छांग आन लौटने के तुरंत बाद वे चीनी भाषा में बौद्ध सूत्रों का अनुवाद करने लगे । थाग राजवंश के राजा के आदेशानुसार ह्वेनसान ने सूत्रग्रंथ रखने के लिये ता य्येन स्तूप की डिजाइन की और निर्माण कर लिया । साथ ही ता य्येन स्तूप के बगल में राजा ने अपनी मां की स्मृति में महा त्स एन मंदिर भी वनवाया। महा वीर भवन इसी मंदिर का प्रमुख संगठित भाग है । इस महा वीर भवन की भव्यता को बहाल करने के लिये 2006 से इस भवन का पुनर्जीर्णोधार किया गया ।
करीब तीन साल के कठोर परिश्रम के जरिये अब यह महा वीर भवन बिलकुल नयी सूरत में नजर आता है और आलीशान बुद्ध मूर्ति की स्थापना भी की गयी है ।
27 अक्तूबर के शाम को शेनशी प्रांतीय जातीय धार्मिक व सांस्कृतिक आदान प्रदान संघ , शेनशी प्रांतीय बौद्ध धार्मिक संघ की अध्यक्षता में शीआन बौद्ध धर्म संघ , शीआन महा त्स एन मंदिर व शीआन बौद्ध धर्म सांस्कृतिक अनुसंधान केंद्र ने शीआन शहर में छांग आन बौद्ध धर्म शास्त्र संगोष्ठी उद्घाटित की ।
संगोष्टी के उद्घाटन समारोह में चीनी राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा की स्थाय़ी कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष शू चा लू ने भाषण देते हुए कहा कि हालांकि ह्वेनसान को बिछड़े हुए एक हजार चार सौ साल हो गये हैं , पर आज के जमाने के लोग फिर भी उन की जिंदगी से बहुत प्रभावित हुए हैं । उन्हों ने आगे कहा कि एक हजार चार सौ साल पहले ह्वेनसान ने शीआन शहर में बौद्ध धार्मिक सूत्रों का अनुवाद किया , जबकि आज लोग उन की रचनाओं और असाधारण जींदगी का अध्ययन करने में पुष्टि का ग्रहण कर लेते हैं । हो सकता है कि धर्म आज के विश्व के सभी मामलों का समाधान करने में समर्थ नहीं है , पर आर्थिक व व्यक्तिगत विकासक्रम में समुचित संतुलन की खोज विविधतापूर्ण मानव जाति की संभ्यता का समान कर्तव्य है ।
चीन स्थित भारतीय दूतावास के मिनिस्टर माजुम्दा ने भाषण भी दिया । उन्हों ने अपने भाषण में कहा कि आज शीआन शहर आने पर मैं अपार प्रसन्न हूं , क्योंकि इस के तीन कारण हैं। सर्वप्रथम 13 साल बाद मैं दुबारा शीआन आया , चीन की परिवर्तनशील धारा में शीआन शहर के विकास व समृद्धि को अपनी आंखों से देखने का मौका एक बार फिर मिला है । दूसरी तरफ शीआन समूचे पूर्वी एशिया का प्राचीन बौद्ध धार्मिक अध्ययन करने व सीखने का अहम अखाडा है , यह सौभाग्य की बात है कि मैं अपनी पत्नी के साथ यहां प्रथम छांगआन बौद्ध धर्म अंतर्राष्ट्रीय अकादमी संगोष्ठी में शरीक हुए ।
तीसरा कारण है कि मैं बुद्ध की मातृभूमि से आया एक राजनयिक हूं , दीर्घकालीन ऐतिहासिक द्विपक्षीय संबंधों का विकास करना मेरा कर्तव्य है । आचार्य ह्वेनसान ने चीन व भारत दोनों देशों की प्राचीन संभ्यता के आदान प्रदान के लिये भारी योगदान किया , वे शीआन शहर के असाधारण वासी थे । मैं उन के अमर कारनामों का बड़ा सम्मान करता हूं । इसलिये मैं अपनी मौजूदा शीआन यात्रा को एक तीर्थ यात्रा के रूप में मानता हूं ।
हालांकि चीन व भारत दोनों देशों का संबंध बहुत पुराना है , पर आज फिर भी अभूतपूर्व विकास दौर से गुजर रहा है । चीन भारत का सब से बड़ा व्यापार साथी है । वाणिज्य , छात्रों , विद्या और मीडियाओं की द्विपक्षीय आवाजाही दिन ब दिन प्रगाढ़ होती गयी है । गत वर्ष एक दूसरे के यहां आने वाले व्यक्तियों की संख्या पांच लाख तक पहुंच गयी है । दोनों देशों के बीच हर हफ्ते 25 सीधी उड़ाने उपलब्ध भी हैं ।
एक हजार चार सौ साल पहले आचार्य ह्वेनसान संयोग से भारत पहुंच गये , तब से दोनों देशों की जनता एक दूसरे से सीखने लगी । हम न सिर्फ ज्ञान विज्ञान , व्यापार व पूंजी निवेश के क्षेत्रों में सहयोग से जन जीवन स्तर को उन्नत करने में संलग्न हैं , बल्कि जलवायु परिवर्तन जैसे भूमंडलीय मामलों के क्षेत्रों में भी सहयोग कर रहे हैं , ताकि बौद्ध सूत्र के उपदेश के अनुसार मानव जाति व प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्वक सहअस्तित्व रहने का मसदस साकार किया जा सके।
हम एक तरफ सहयोग के नये आयाम की खोज करने की कोशिश कर रहे हैं और लगातार एक दूसरे से सीखते हैं , दूसरी तरफ हमारे बीच मौजूद पुराने रिश्ते को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं । लोयांग पाइ मा मंदिर में एक भारतीय वास्तु शैली से स्थापित एक सुंदर मंदिर भी है , यह मंदिर भारतीय वासियों ने निर्मित किया है और गिफ्ट के रुप में चीनी जनता को भेंट किया है , ताकि दोनों पक्ष संभ्यतापूर्ण विरासत का समान उपभोग कर सकें ।
अगले वर्ष चीन व भारत के बीत राजनयिक संबंध की स्थापना की 60 वीं वर्षगांठ मनायी जाएगी । मौके पर दोनों पक्ष एक दूसरे के यहां राष्ट्रीय वर्ष जैसे आयोजन किये जायेंगे । हम इस मौके का फायदा उठाकर सांस्कृतिक सम्पर्क को सुदृढ़ बना देंगे , दोनों देशों की जनता को हमारी समानताएं प्रदर्शित करेंगे ।
आचार्य ह्वेनसान ने जिस कक्ष में भारत से लाये बौद्ध सूत्रों का अनुवाद किया था , वह कक्ष अब बिलकुल मेरे बगल में है , इसलिये मुझे गहरा महसूस हुआ है कि ऐसे मौके पर पश्चिम की यात्रा नामक प्रसिद्ध चीनी प्राचीन रचना का हिन्दी संस्करण प्रकाशित हुआ है , वह एक कितनी बड़ी सुखद बात है । मैं इसी काम में लगे सभी विद्वानों का आभारी हूं ।
28 अक्तूबर की सुबह शीआन शहर के महा त्से एन मंदिर में महा वीर भवन के पुर्ननिर्माण पूरा होने और बुद्ध मूर्ति की पुन स्थापना करने की भव्य रस्म भी आयोजित हुई , पिछले दो सालों से अधिक संमय के पुनर्निर्माण के जरिये महा वीर भवन में नया निखार आया है ।
चीनी राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा की स्थायी कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष श्वू चा लू ,शेनशी प्रांतीय जन प्रतिनिधि सभा की स्थायी कमेटी के उपाध्यक्ष ह्वांग वी और विभिन्न क्षेत्रों से आये आचार्य , विद्वान रस्म में शरीक हुए ।
दो हजार वर्ष पहले जब बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार चीन में हुआ , तो छांगआन शहर बौद्ध धर्म को उत्तर चीन में लोकप्रिय बनाने का केंद्र रहा है और बौद्ध धर्म के चीनीकरण का उद्गम स्थल भी है , अतः वह बौद्ध धर्म की दूसरी जन्मभूमि के नाम से भी जाना जाता रहा है , जबकि हजार वर्ष पुराना महा त्से एन मंदिर में आचार्य ह्वेनसान ने बड़ी तादाद में बौद्ध सूत्रों व ग्रंथों का अनुवाद किया ।
इसी मंदिर के आचार्य छ्वान श्यांग के अनुसार दो हजार वर्ष से पहले के स्वी व थांगराजवंशों से लेकर आज तक महा त्से एन मंदिर की अनेक बार मरम्मत की गयी है , नये चीन की स्थापना के बाद इसी मंदिर की 6 बार मरम्मत हो गयी है , जिस से महा त्से एन मंदिर थांग राजवंश से कहीं अधिक शानदार दिखाई देता है । महा त्से एन मंदिर का प्रमुख निर्माण महा वीर भवन ही है , उस का निर्माण मिंग राजवंश में हुआ था , पर छिंग राजवंश के थुंग ची राजा काल में युद्धाग्नि से नष्ट हुआ , फिर क्वांग शू राजा काल में इस महा वीर भवन का पुनर्निर्माण हुआ , बाद में प्रसिद्ध परोपकारी चू ची छाओ ने धन राशि जुटाकर महा वीर भवन की मरम्मत की । लेकिन तत्कालीन वैज्ञानिक स्तर और भूस्थल की क्रिया के कारण गत सदी के 80 वाले दशक से यह वीर भवन ढहने ही वाला है ।
इस वीर भवन का आलीशान दृश्य बहाल करने के लिये 2004 के शरद से 2005 के वसंत के दौरान सांस्कृतिक अवशेष , पुरातत्व खोज , भूतत्व और भवन निर्माण के विशेषज्ञों ने महा वीर भवन की पुनः मरम्मत पर विचार विमर्श कर प्रस्ताव पेश किया । राजकीय सांस्कृतिक अवशेष ब्यूरो द्वारा पुनर्निर्माण प्रस्ताव को अनुमोदित किये जाने के बाद 2006 के अंत में इस महा बीर भवन की मरम्मत का काम शुरु हो गया । 2009 के वसंत तक इस वीर भवन की मरम्मत की एक करोड़ 80 लाख य्वान से अधिक मूल्य वाली परियोजना पूर्ण रूप से पूरी हो गयी ।
आज महा वीर भवन बिलकुल नयी सूरत में नजर आता है और वह विश्व के लाखों करोड़ों बौद्ध धार्मिक अनुयाइयों और पर्यटकों को अपनी ओर खिंच लेता है । इस महा वीर भवन का कुल क्षेत्रफल 293 से अधिक वर्गमीटर है , वह 23.5मीटर लम्बा , 12.5 मीटर चौड़ा और नौ मीटर ऊंचा है ।
महा वीर भवन के पुनर्निर्माण व बुद्ध मूर्ति की स्थापना की रस्म के बाद बौद्ध धर्म शास्त्र संगोष्ठी व चित्र प्रदर्शनी भी हुई । चीन के 8 प्रसिद्ध सहस्राब्दी आचार्यों ने संगोष्ठी में बुद्ध की बुद्धिमत्ता की खूब चर्चा की । उन्हों ने भिन्न भिन्न दृष्टिकोणों से छांग एन बौद्ध धर्म के विकास का तफसील से उल्लेख किया और समूचे देश से आये दो सौ से अधिक विद्वानों के साथ बौद्ध शास्त्र का गहन रुप से अध्ययन किया ।















