अखिल- चलिए दोस्तों, मैं आपको बताता हूं कि अफ्रीकी देश बेनिन में बच्चों की मौत के बाद भी की जाती है परवरिश। वो क्यों, आइए.. सुनिए।
दोस्तों, पश्चिमी अफ्रीकी देश बेनिन में रहने वाली फॉन जनजाति में यदि जुड़वां बच्चों की मौत हो जाती है, तो बच्चों के माता-पिता को एक विचित्र परंपरा का पालन करना पड़ता है।
इस समाज में जुड़वां बच्चों की मौत के बाद लकड़ी का पुतला बनाकर उनकी बच्चों की तरह ही देखभाल की जाती है। यह परंपरा सिर्फ जुड़वां बच्चों की मौत के बाद ही निभायी जाती है। माता-पिता जब तक जिंदा रहते हैं इस परंपरा को निभाते हैं।
फॉन जनजाति के लोग अपने जिंदा रहने तक इन पुतलों का पालन-पोषण जिंदा बच्चों की तरह ही करते हैं। पुतलों को नहलाना, खाना खिलाना, कपड़े पहनाना और बिस्तर में सुलाना इनके लिए रोज का काम होता है। इन पुतलों को हर रोज स्कूल भी पढऩे के लिए भेजते हैं।
फ्रेंच फोटोग्राफर एरिक न इस जनजाति की विचित्र परंपराओं पर आधारित एक डॉक्युमेंट्री तैयार की है। इस जनजाति की मान्यता है कि अगर ऐसा न किया जाये तो बच्चों की आत्मा भटकती रहती है। जिससे परिवार वालों को तकलीफ होती है।
गुड्डे-गुडिय़ां के रूप में बनवाएं गये इन पुतलों को मां अपने सीने से चिपकाकर रखती है।
बेनिन के आदिवासी वूदू धर्म को मानते हैं। यहां जुड़वां बच्चों की संख्या अधिक होती है। यहां हर 20 में से एक बच्चा जुड़वां पैदा होता है। जुड़वां बच्चों की देखभाल करना भी काफी कठिन होता है। अक्सर इनकी मौत हो जाती है। इसके बाद फॉन ट्राइब्स के लोग अपनी परंपरा अनुसार बच्चों के पुतले बनाकर उनकी देखभाल करते हैं।
लिली- तो दोस्तों, यह था हमारा अजीबोगरीब और चटपटी बातों का सेगमेंट, अभी हम सुनते हैं यह हिन्दी गाना... उसके बाद आपके ले चलेंगे हमारे मनोरंजन के दूसरे सेगमेंट की तरफ...
अखिल- दोस्तों, आपका एक बार फिर स्वागत है हमारे इस मजेदार कार्यक्रम संडे की मस्ती में... मैं हूं आपका दोस्त एन होस्ट अखिल।
लिली- चलिए दोस्तों, हम अखिल जी से सुनते हैं एक प्रेरक कहानी। कहानी का शीर्षक है बदलाव
अखिल- दोस्तों, एक बार बूढ़े दादा जी को उदास बैठे देख बच्चों ने पूछा , "क्या हुआ दादा जी, आज आप इतने उदास बैठे क्या सोच रहे हैं ?" "कुछ नहीं, बस यूँ ही अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था!", दादा जी बोले।"जरा हमें भी अपनी लाइफ के बारे में बताइये न …", बच्चें ज़िद्द्द करने लगे।
दादा जी कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले , " जब मैं छोटा था, मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी , मेरी कल्पनाओं की भी कोई सीमा नहीं थी… मैं दुनिया बदलने के बारे में सोचा करता था… जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ… बुद्धि कुछ बढ़ी… तो सोचने लगा ये दुनिया बदलना तो बहुत मुश्किल काम है… इसलिए मैंने अपना लक्ष्य थोड़ा छोटा कर लिया… सोचा दुनिया न सही मैं अपना देश तो बदल ही सकता हूँ. पर जब कुछ और समय बीता, मैं अधेड़ होने को आया… तो लगा ये देश बदलना भी कोई मामूली बात नहीं है… हर कोई ऐसा नहीं कर सकता है... चलो मैं बस अपने परिवार और करीबी लोगों को बदलता हूँ… पर अफ़सोस मैं वो भी नहीं कर पाया. और अब जब मैं इस दुनिया में कुछ दिनों का ही मेहमान हूँ तो मुझे एहसास होता है कि बस अगर मैंने खुद को बदलने का सोचा होता तो मैं ऐसा ज़रूर कर पाता… और हो सकता है कि मुझे देखकर मेरा परिवार भी बदल जाता… और क्या पता उनसे प्रेरणा लेकर ये देश भी कुछ बदल जाता… और तब शायद मैं इस दुनिया को भी बदल पाता !









