​भारतीय फिल्म“ट्रीज़ अंडर द सन”के निर्देशक बीजू कुमार के साथ साक्षात्कार

2019-06-26 16:59:52
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संवादाता - आप अपनी फिल्म के माध्यम से किस तरह की कहानी कहना चाहते हैं ?

बीजू कुमार – मैं समझता हूं कि फिल्म समाज के मुद्दे पर बननी चाहिए, फिल्में समाजिक मुद्दों को संबोधित करनी चाहिए। इसलिये मेरी हर फिल्म किसी न किसी सामाजिक मुद्दे पर होती है।

संवादाता – आप अपनी फिल्म में समाज के एक विशेष तबके के बारे में बात कर रहे हैं। आपने अपनी फिल्म के लिये एक बहुत सी संवेदनशील मुद्दा चुना है, जब ये फिल्म केरल के सिनेमाघरों में लगी थी तो लोगों की इसपर क्या प्रतिक्रिया थी ?

बीजू कुमार – हालांकि शांघाई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में मेरी फिल्म का पहला शो हुआ है, इसके बाद हम केरल में इस फ़िल्म को रिलीज़ करेंगे लेकिन मेरे दर्शक जानते हैं कि मैं हमेशा सामाजिक मुद्दों पर फ़िल्म बनाता हूं। और मैं हमेशा ही गरीब तबके की बात करता हूं, मैं समाज के निम्न तबके को संबोधित करता हूं। हमारा फिल्म उद्योग आमतौर पर ऐसी फिल्में नहीं बनाता है वो मनोरंजक फ़िल्में बनाता है। लेकिन मैं ये मुद्दे दर्शकों तक ले जाना चाहता हूं।

संवादाता – जैसा कि आपने कहा कि फ़िल्मों में कुछ संदेश होना चाहिये, आपकी फिल्मों में संदेश होता है लेकिन मुझे लगता है कि कहीं न कहीं इसमें मनोरंजन की कमी होती है, क्यों नहीं आप भी अपनी फिल्मों में थोड़ा मनोरंजन डालते हैं फिल्म की गुणवत्ता और संवेदनशीलता को बरकरार रखते हुए, क्योंकि आपने फिल्म बनाने में पैसा लगाया है और आपके लिये इससे पैसा कमाना ज़रूरी है ?

बीजू कुमार - मैं समझता हूं कि जहां तक मनोरंजन की बात है इसके लिये बहुत सारी फिल्में हैं जो थियेटर में लगती हैं, जो वहां लोगों का मनोरंजन कर रही हैं। लेकिन मेरा मानना है कि कलाकार मनोरंजन के लिये नहीं है बल्कि वो सामाजिक दायित्व निभाने के लिये है, उसका पहला कर्तव्य सामाजिक दायित्व निभाना है, यही मेरा दृष्टिकोण है, हालांकि मनोरंजन व्यावसायिक पहलू के लिये बहुत ज़रूरी है, मैं अपनी फ़िल्मों के लिये ऐसे निर्माताओं के पास जाता हूं जो कि मेरे जैसी सोच रखते हैं। वो निर्माता भी सामाजिक मुद्दों वाली फिल्मों में पैसा लगाते हैं, व्यवसाय के लिये नहीं। मनोरंजन के लिये बहुत सारे निर्माता देश दुनिया और केरल में मौजूद हैं लेकिन कुछ निर्माताओं को मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता के लिये काम करना चाहिए।

संवादाता – आपकी फ़िल्म अंतर्राष्ट्रीय पटल पर शामिल हुई है, ये एक बहुत संवेदनशील फ़िल्म है, चीन में भी ऐसी ही संवेदनशील और सामाजिक सरोकारों वाली फिल्में बनाई जाती हैं, क्या आप आने वाले दिनों में चीन के साथ सह निर्माण के क्षेत्र में काम करना चाहेंगे जहां पर ?

बीजू कुमार – जी हां, ज़रूर करना चाहूंगा, ये मेरा शांगहाई का दूसरा दौरा है, इससे पहले में वर्, 2012 में यहां एक कॉन्वोकेशन में आया था और सात वर्ष बाद मैं फिर यहां आया हूं। इन दिनों मैं एक फ्रांसीसी फ़िल्म पर काम कर रहा हूं, ये एक सह निर्माण प्रोजेक्ट है, सह निर्माण एक बहुत अच्छी बात है, इसमें हमें दूसरे देश जाने और वहां के लोगों से संपर्क करने का मौका मिलता है। ये बहुत दिलचस्प है, अगर आगे मुझे ऐसे मौके मिलते हैं तो मैं इसे ज़रूर इस्तेमाल करूंगा।

संवादाता – वो कौन से दूसरे फ़ोरम हैं जहां पर आप अपनी फ़िल्म के साथ जाना पसंद करेंगे ?

बीजू कुमार – मेरी पहले की लगभग हर फ़िल्म किसी न किसी बड़े फ़िल्म महोत्सव में ही दिखाई गई है, अपनी इस फ़िल्म को लेकर मैं शांगहाई फ़िल्म महोत्सव में आया हूं और आगे भी दूसरे फ़िल्म महोत्सवों में जाऊंगा, मैं अपनी फ़िल्मों को महोत्सवों में स्क्रीनिंग करने के बाद ही रिलीज़ करता हूं। इसके बाद हम सिंगापुर फ़िल्म महोत्सव में जा रहे हैं, अभी और फ़िल्म महोत्सव होने वाले हैं। हम लोग अपनी फ़िल्मों को इसी तरह महोत्सवों में लेकर जाते हैं।

संवादाता – आप राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के फ़िल्म महोत्सवों के बारे में क्या सोचते हैं कि ये फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों के लिये कितने सहायक होते हैं, क्योंकि आप अलग अलग विषयों की फ़िल्मों के साथ इन महोत्सवों में आते हैं ?

बीजू कुमार – इस तरह के फ़िल्म महोत्सव हमारी दो तरह से मदद करते हैं, पहला तो हमें यहां पर सही दर्शक मिलते हैं जो गंभीर विषयों पर बनी फ़िल्में देखने आते हैं। वो परिपक्व मस्तिष्क वाले लोग होते हैं और वो क्रियेटिव तरह की फ़िल्में देखना चाहते हैं जो आम मनोरंजक फ़िल्मों जैसी नहीं होतीं। और दूसरा जब कोई फ़िल्म इस तरह के अंतर्राष्ट्रीय महोत्सवों में आती है तो अपनेआप उस फ़िल्म को एक अच्छी फ़िल्म होने का स्तर मिल जाता है, यानी कलात्मक फ़िल्म होने का स्तर इसे दूसरे देशों के लोग भी देखते हैं और हमारे संपर्क उनसे बनते हैं फिर हमें ढेर सारे अवसर मिलते हैं खासकर अलग तरह के फ़िल्म वितरण तंत्र के साथ। यहां पर बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं।

संवादाता – केरल फ़िल्म उद्योग में बजट को अगर हम छोड़ दें तो आपको बाकी क्षेत्रों में कौन कोन सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है अगर हम स्टूडियो, उपकरण और तकनीक की बात करें तो ?

बीजू कुमार - केरल फ़िल्म उद्योग एक बड़ा उद्योग है जहां पर हर वर्ष करीब डेढ़ से दो सौ तक फ़िल्में एक वर्ष में बनाई जाती हैं, जो एक बड़ी संख्या है। लेकिन दुर्भाग्यवश करीब नब्बे फ़ीसदी फिल्में मनोरंजन के लिहाज से बनाई जाती हैं सिर्फ़ दस फ़ीसदी या दस से भी कम फ़िल्में ही अंतर्राष्ट्रीय महोत्सवों के लिये बनाई जाती हैं, कहानी और फ़िल्म बनाने के तरीके के लिहाज से पूरे वर्ष में बनने वाली दो सौ फिल्मों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर वाली फ़िल्में सिर्फ़ दो या तीन ही बनती हैं। जहां तक व्यावसायिक फिल्मों की बात है तो केरल फ़िल्म उद्योग एक बड़ा उद्योग है हमारे पास करीब एक हज़ार थियेटर हैं।

संवादाता – आपने शांगहाई और हांगकांग फ़िल्म उद्योग को देखा है, अगर हम उपकरणों की बात करें तो क्या केरल फ़िल्म उद्योग में वो सारे उपकरण मौजूद हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिलते हैं या फिर आपके यहां ऐसे उपकरणों की कमी है और इस कमी के साथ फ़िल्म निर्माता फ़िल्में बना रहे हैं ?

बीजू कुमार - भारतीय फ़िल्म उद्योग की तुलना में मलयालम फ़िल्म उद्योग में बहुत उच्च स्तर के उपकरण मौजूद हैं। वहां पर बहुत अच्छे स्टूडियो हैं, बहुत अच्छे उपकरण हैं और बहुत अच्छे तकनीशियन भी केरल में मौजूद हैं। तकनीकी और रचनात्मकता के क्षेत्र में मलयालम फ़िल्म उद्योग बहुत आगे है।

संवादाता – अगर हम आज से अगले दस वर्षों की बात करें तो केरल की फिल्म इंडस्ट्री राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कहां होगी ?

बीजू कुमार – हमारे यहां बनने वाली करीब दो सौ फिल्मों में से कुछ को राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिलता है वो फिल्में भी पेशेवरों द्वारा बनाई जाती हैं उन्हें कोई गैर पेशेवर नहीं बनाता, कुछ फ़िल्मों को अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिलता है लेकिन समस्या ये है कि अगर हमें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला होता है तो भी हम अपनी फ़िल्में थियेटरों में रिलीज़ नहीं कर पाते। थियेटर सिस्टम बहुत अलग होता है। जब किसी फिल्म को पुरस्कार मिलता है तो थियेटर उसे जगह नहीं देते क्योंकि वो जानते हैं कि ये पुरस्कार पाने वाली फिल्म है ये आम फिल्म के दर्शक के लिये नहीं है तो वो लोग नहीं चाहते कि ऐसी फिल्में उनके थियेटरों में लगें। सिर्फ़ यही एक दिक्कत है केरल फिल्म उद्योग के साथ।

संवादाता – सीआरआई के लिये अपना अमूल्य समय निकालने के लिये आपका धन्यवाद।

बीजू कुमार – धन्यवाद।

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