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033 आंखों देखा है सच

cri 2017-06-20 19:47:04
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033 आंखों देखा है सच

आंखों देखा है सच 眼见为实

"आंखों देखा है सच"कहानी को चीनी भाषा में"यान च्यान वेइ शी"(yǎn jiàn wéi shí) कहा जाता है। इसमें"यान" आंखें हैं और"च्यान"का अर्थ है देखना, जबकि"वेइ"का अर्थ है होना और"शी"का अर्थ है सच।

चीन की प्राचीन कथा पुस्तक के अनुसार आज से दो हजार वर्ष पूर्व, चीन के हान राज्य काल(ईसा पूर्व 202 से वर्ष 220 तक) में एक बार छ्यांग जाति की सेना ने हान राज्य की सीमा पर धावा बोला। हान राजवंश के सम्राट ने 76 साल के बुजुर्ग सेनापति चाओ छ्वाङ क्वो को दुश्मन को देश से खदेड़ने के लिए भेजा।

सेनापति चाओ छ्वाङ क्वो युद्ध कला में दक्ष थे और उन्हें दर्जनों युद्ध जीतने का अनुभव भी था।

सम्राट ने जब उनसे पूछा:"छ्यांग जाति के आक्रमण को नाकाम करने के लिए कितनी सेना की जरूरत होगी?"

चाओ छ्वाङ क्वो ने जवाब दिया:" यह तय करने के लिए युद्ध क्षेत्र में जाकर खुद अपनी आंखों से देखना होगा, युद्ध मैदान से दूर इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है। मैं खुद अग्रिम मोर्चे पर दुश्मन की शक्ति का पता लगाने जाऊंगा और सही जानकारी के आधार पर लड़ाई की योजना बनाऊंगा।"

सम्राट की आज्ञा पर बुजुर्ग सेनापति चाओ सेना की मात्र एक टुकड़ी लेकर युद्ध क्षेत्र गये, सैन्य टुकड़ी जब पीली नदी के पास पहुंची, तो सामने छ्यांग जाति की सेना की एक छोटी टुकड़ी दिखी। सेनापति चाओ छ्वाङ क्वो ने दुश्मन पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। दुश्मन की सेना हार गई और हान सेना ने कई दुश्मन सैनिक पकड़ लिए। इस विजय पर खुश होते हुए अधीनस्थ सैन्य अधिकारी ने सेनापति चाओ से तुरंत दुश्मन की अन्य टुकड़ियों पर हमला करने की सलाह दी, लेकिन सेनापति चाओ छ्वाङ क्वो ने उसकी सलाह नहीं मानी। उन्होंने कहा:"हमारी सेना बहुत दूर से अभी-अभी यहां पहुंची है, सभी जवान थके हुए हैं, और हमें दुश्मन सेना की स्थिति का पता नहीं है। कहीं वे घात लगाकर तो नहीं बैठे हैं, हमें सतर्क होना चाहिए।"

इसके बाद सेनापति चाओ छ्वाङ क्वो ने युद्ध के मैदान की स्थिति, दुश्मन के युद्धबंदियों से उनकी सैन्य शक्ति की असलियत जानी और दुश्मन को छिन्न भिन्न करने की योजना बनायी। इस तरह की अच्छी तैयारी के लिए स्रम्राट से अतिरिक्त सेना भेजने की मांग की। अंत में हान राज्य की सेना ने छ्यांग जाति की सेना को पूरी तरह परास्त कर सीमा से दूर बाहर खदेड़ दिया और अपने क्षेत्र में लम्बे समय तक शांति कायम रखी। बुजुर्ग सेनापति का यह कथन कि आंखों देखा हाल सच होता है, देश में प्रसिद्ध हो गया।

नीति कथा"आंखों देखा है सच" को चीनी भाषा में"यान च्यान वेइ शी"(yǎn jiàn wéi shí) कहा जाता है। वास्तव में यह वाक्य पूरा नहीं है, चीनी कहावत में इसे वाक्य को पूरा कर"यान च्यान वेइ शी, अर थिंग वेइ श्यु"कहा जाता है। इसमें"अर"का अर्थ कान है और"थिंग"का अर्थ सुनना है, वहीं"वेई"का अर्थ है होना और"श्यु"का अर्थ है झूठा। कुल मिलाकर यह पूरा वाक्य का अर्थ निकलता है"आंखों देखी मानों, और कानों सुनी न मानों"। इस कहानी से हमें पता चलता है कि कभी-कभी सुनी हुई बातें सच नहीं होती हैं। हमें खुद आंखों से देखकर स्थिति की असलियत जाननी चाहिए।

033 आंखों देखा है सच

जंगली बतख का दुखत अन्त 不辨真假

दूसरी कहानी का शीर्षक है:"जंगली बतख का दुखत अन्त"। इसे चीनी भाषा में"पू प्यान चन च्या"(bù biàn zhēn jiǎ) कहा जाता है। इसमें"पू"का अर्थ है नहीं, और"प्यान"का अर्थ है पहचानन. जबकि"चन"का अर्थ है सच और"च्या"का अर्थ है झूठा।

बहुत पहले की बात है, चीन में मछलियां पालने वाला एक बुजुर्ग रहता था। उसके घर के सामने तालाब में तमाम मछली के बच्चे थे और हर साल बड़ी मात्रा में मछलियां पकड़ी जा सकती थी। बुजुर्ग की जीविका इसी मछली पालन पर चलती थी और दिन भी काफ़ी अच्छे कटते थे।

एक दिन, बुजुर्ग ने पाया कि उसके तालाब के किनारे पर एक छोटी मछली मरी पड़ी है, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आखिरकार यह कैसे हो गया। इसका पता लगाने का उसने निश्चय किया।

दूसरी सुबह, बुजुर्ग अपने मकान के सामने रखे लकड़ियों के ढेर के पीछे छिप कर तालाब पर नज़र रखे रहा, लेकिन कुछ पता नहीं चला, उसके बाद दोपहर का खाना खाकर भी वह लकड़ियों के ढेर के पीछे से तालाब पर नज़र रखता रहा।

तभी एक जंगली बतख कहीं से उड़कर तालाब के किनारे उतरी और चारों ओर देखने के बाद, फिर पानी में डुबकी लगाकर एक छोटी मछली को पकड़कर खा गयी। जब वह दूसरी मछली पकड़ने ही वाली थी, तो बुजुर्ग आगे बढ़कर ऊंची आवाज में चिल्लाया:"है !---- "

आवाज़ सुन कर जंगली बतख वहां से भाग गयी।

बुजुर्ग ने मन ही मन सोचा:"यह कोई अच्छा तरीका नहीं है, मैं रोज़ इस तरह बतख को नहीं भगा सकता। कोई और तरीका सोचना होगा।"

देर तक सोचने के बाद बुजुर्ग को एक अच्छा तरीका सूझा। उसने धान के सूखी घास से एक मनुष्य का पुतला बनाया और उसके सिर पर घास की टोपी लगाकर तालाब के किनारे रख दिया।

अगले दिन दोपहर के वक्त बुजुर्ग फिर तालाब के किनारे आकर छुप गया, वह देखना चाहता था कि पुतला काम आता है या नहीं। ऐन वक्त पर जंगली बतख फिर से वहां पहुंच गयी। जैसे ही वह पानी में डुबकी लगाने को थी, तभी उसने देखा कि तालाब के किनारे कोई व्यक्ति खड़ा है। वह डर के मारे से वहां से उड़कर दूर चली गयी।

अपनी सफलता पर बुजुर्ग को बड़ी खुशी हुई। उसने अपने आप से कहा:"यह अच्छा तरीका है। आगे मुझे फिर से रोज़ तालाब के किनारे पहरा देने की ज़रूरत नहीं होगी।"

बुजुर्ग बड़ा निश्चिंत होकर दूसरे काम में लग गया और उसका ध्यान फिर तालाब पर नहीं गया।

लेकिन जंगली बतख फिर आयी। शुरु-शुरु में उसे सीधे तालाब के पास आने का साहस नहीं था। वह पुतले के सिर के ऊपर उड़ते हुए मंडरा रही थी और गौर कर रही थी कि वह पुतला हरकत में आएगा। कई बार ऐसा करने के बाद बतख को पता लग गया कि वह पुतला कुछ नहीं कर सकता। और वह निश्चिंत होकर मछली मारने में लग गयी।

कुछ दिनों के बाद, बुजुर्ग फिर तालाब में पहुंचा और उसे पता चला कि जंगली बतख पहले की ही तरह मछली पकड़ रही है, तो उसने खुद पुतले के रूप में तालाब के पास खड़ा होने का फैसला किया। वह घास की टोपी पहने वहीं खड़ा रहा और ज़रा भी नहीं हिला। जंगली बतख फिर से वहां आ धमकी, वह इतना निश्चिंत थी कि असली बुजुर्ग को पुतला समझकर उसकी टोपी पर उतर कर खड़ी हो गई। बेशक जंगली बतख बुजुर्ग के हाथ में पड़ गयी और मारी गयी।

श्रोता दोस्तो, अभी आपने जो कहानी सुनी, उसका नाम था"जंगली बतख का दुखत अन्त"। चीनी भाषा में इसे"पू प्यान चन च्या"(bù biàn zhēn jiǎ) कहा जाता है। असली और नकली पुतले को न पहचानने की वजह से बतख को अपनी जान गंवानी पड़ी।

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