चीन की अल्पसंक्यक जातियों में से एक पुई जाति के प्रथम गांव का दौरा

2019-10-23 06:00:00
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आप जानते ही हैं कि चीन एक बहुजातीय देश है और यहां प्रमुख जाति हान जाति को छोड़कर और अन्य 55 अल्पसंख्यक जातियां भी हैं। 26 लाख जनसंख्या वाली पुई जाति उन में से एक है और इस जाति का आधा भाग आज दक्षिण पश्चिम चीन के क्वेइचो प्रांत में बसा हुआ है। आज के इस प्रोग्राम में हम आप के साथ पुई जाति बहुल गांव चंद्रमा गांव देखने चलते हैं। इस गांव को अपनी जातीय संस्कृति के अच्छे संरक्षण की वजह से प्रथम चीनी पुई गांव माना जाता है।

पुई जाति के कस्बे और गांव आम तौर पर पहाड़ों की तलहटियों या नदियों के किनारे खड़े हुए हैं। किनारे खड़े हुए हैं और वे घने जंगलों से घिरे हुए दिखाई पड़ते हैं। पास में नदियां कल-कल करती हुईं बहती हैं। एक दिन की सुबह हम जल्दी उठकर चंद्रमा नामक गांव के लिए रवाना हुए। एक स्वच्छ नदी के तट का अनुसरण करते हुए जब हम चंद्रमा गांव के छोर पर पहुंचे, तो हमने देखा कि सुन्दर पु ई जाति की पोषाक में सुसज्जित युवतियां हमें मदिरा पेश करने के लिए गीत गाते हुए खड़ी हुई हैं। स्थानीय गाइड ने हमें बताया कि उन्होंने जो गीत गाया है, वह मार्गरोधी शराब गीत ही है। जबकि पेश करने के लिए हाथों में जो शराब है, वह मार्गरोधी शराब ही है।

यह मार्गरोधी शराब आदरणीय मेहमानों के सम्मान में पेश की जाती है और वह शकुन का प्रतीक भी है। स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार आदरणीय मेहमानों को दो बार मार्गरोधी शराब पिलाई जाती है। पहली बार युवा लोग मेहमानों को सम्मान के रूप से शराब पेश करते हैं, फिर बुजुर्ग लोग मेहमानों को यह शराब पेश करते हैं।

पु ई जाति की परम्परा के अनुसार मेहमान दो कप शराब पीने पर ही गांव में दाखिल हो सकता है। पर यह चिंता की बात नहीं है। यहां पर जो शराब पिलायी जाती है, वह तेज शराब न होकर चावल से तैयार की गयी शराब है और उस का स्वाद थोड़ा खट-मीठा है, पीने में बड़ा मज़ा आता है।

चंद्रमा-गांव का हरेक घर घने बांसों व पेड़ों से घिरा हुआ है। चारों ओर शांत व साफ़ सुथरा वातावरण व्याप्त है, पास में कल-कल बहती चंद्रमा-नदी गांव को चार चाँद लगाती है। चंद्रमा- गांव का नाम ठीक इसी चंद्रमा-नदी पर रखा गया है। इस नदी के पीछे एक मर्मस्पर्शी पौराणिक कहानी भी प्रचलित है।

कहा जाता है कि बहुत पहले यहां माऊ मई नामक एक सुन्दर लड़की रहती थी और उसे चंद्रमा नामक एक लड़के से मुहब्बत हो गयी। यहां का ये लांग नामक राजा सुन्दर लड़की माउ मई को अपनी दासी बनाना चाहता था, पर लड़की माउ मई इस के लिए कतई तैयार नहीं थी। मज़बूर होकर राजा ये लांग ने उससे कहा कि यदि तुम्हारा चंद्रमा भाई इस नदी को उलटी बहा दे, तो मैं तुम दोनों को एक साथ रहने दूंगा। ऐसी स्थिति में बेचारा चंद्रमा-भाई बेहद दुःखी हुआ और रोने के सिवा वह कुछ नहीं कर सकता था। अतः वह हर रोज इस नदी के तट पर बैठ कर रोता रहता था, उसके रोने की आवाज़ से प्रभावित होकर भगवान इस नदी को उल्टा बहाने ही वाले थे कि अचानक मुस्लाधार वर्षा हुई और नदी में बाढ़ आ गयी। चंद्रमा-भाई बाढ़ में डूब गया। यह जानकर माउ मेई बहुत दुःख हुई और उसने सीधी खड़ी चट्टान से कूदकर आत्महत्या कर ली।

तब से ही यह नदी दूसरी नदियों से अलग होकर पूर्व से पश्चिम के बजाए पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगी। नदी के तट पर स्थित इस छोटे पहाड़ी गांव को तब से चंद्रमा नाम दिया गया।

चंद्रमा-गांव में बहुत सी पु ई जातीय परम्पराएं हैं, जिन में तांबा ढोल सब से चर्चित है। जिस दिन हम चंद्रमा-गांव गये, उसी दिन चीनी पंचांग के अनुसार जाति का परम्परागत पहाड़ी-दीत दिवस मनाया जा रहा था। दिवस की खुशियों में आयोजित समारोह में हम ने पु ई जाति का धरोहर तांबा-ढोल देखा।

तांबा-ढोल पु ई जाति के पूजा पाठ समारोह में प्रयोग किये जाने वाला महत्वपूर्ण यंत्र है। पु ई जाति के हरेक गांव में एक तांबा-ढोल होना ज़रूरी है और वह आम तौर पर गांव के मुखिया या किसी बड़ी हस्ती के घऱ में सुरक्षित रखा जाता है।

तांबा-ढोल पु ई जाति की धरोहर है और पु ई जाति तथा समूची जाति की एकता का प्रतीक भी है। पुराने जमाने में इस प्रकार के तांबे ढोल का प्रयोग लड़ाइयों में किया जाता था।

लेकिन इस प्रकार वाले तांबे ढोल के बारे में यह भी कहा जाता है कि भगवान ने यह तांबा-ढोल पु ई जाति को उपहार में दिया था। जब किसी वृद्ध का दम टूट जाता है, तो गांव के लोग जोर से ढोल पीटते हैं, ताकि भगवान ढोल की आवाज सुनकर उस वृद्धि की आत्मा स्वर्ग में ले जा सके। इस के अलावा नव वर्ष और परम्परागत अहम त्यौहारों में पूर्वजों की पूजा करने की रस्म में भी तांबा-ढोल पु ई जाति में अपना विशेष स्थान रखता है, इसलिए पु ई जाति में ढोल पीटने के कड़े नियम हैं। इन नियमों के अनुसार सिर्फ़ नव-वर्ष, अंत्येष्टि या महत्वपूर्ण भव्य त्यौहारों के ���पलक्ष्य में ही तांबा-ढोल पीटने की इजाजत दी जाती है। इतना ही नहीं, ढोल पीटने से पहले एक भव्य व रहस्यमय पूजा रस्म आयोजित होना भी अत्यावश्यक है।

तांबा-ढोल की पूजा रस्म गांव में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। पूजा रस्म में तांबा-ढोल के आगे प्रसाद के रूप में मुर्गा आदि का मांस रखा जाता है, फिर गांव के सब से वृद्ध पुरुष के नेतृत्व में सभी शादीशुदा पुरुष एक साथ तांबा-ढोल की पूजा करते हैं।

तांबा-ढोल पु ई जाति का पवित्र ढोल है। लोग इस का बहुत आदर करते हैं। इसलिए हर वर्ष इस वक्त सभी लोग ढोल पूजा के लिए मुर्गे व सुअर का प्रसाद लेने यहां इकट्ठे हो जाते हैं। पूजा रस्म में सब से पहले गांव के दीर्घायु वृद्धि तीन बार ढोल पीटते हैं। इस का अर्थ यह है कि पहली बार वायुमंडल देवता की पूजा के लिए ढोल पीटा जाता है, दूसरी बार भूमि-देवता की पूजा के लिए ढोल पीटा जाता है। जब कि तीसरी बार पवित्र तांबे ढोल की पूजा के लिए इसे पीटा जाता है। तीन बार ढोल पीटने के बाद पवित्र ढोल शानदार फसल और अमन चैन को सुनिश्चित कर सकता है।

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