ल्हासा में मंदिर मठों का दौरा

2019-09-18 06:00:00
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जैसा की आप जानते हैं कि चीन का तिब्बत स्वायत्त प्रदेश दक्षिण पश्चिम चीन स्थित छिंगहाई तिब्बत पठार पर एक रहमय भूमि पर खड़ा है। अनेक सालों से वह अपने विशेष अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य और रहस्यमय धार्मिक संस्कृति से जाना जाता रहा है और विभिन्न देशों के पर्यटकों को अपनी ओर खिंच लेता रहा है। जबकि तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की राजधानी की हैसियत से ल्हासा शहर में अलग ढंग की धार्मिक संस्कृति के बारे में जानकारी जानना बहुत जरूरी है। तो आज के इस कार्यक्रम में हम आप के साथ ल्हासा शहर के चुमला खां और चह पंग इन दोनों सब से प्रसिद्ध मठों के दौरे पर ले चलते हैं।

ल्हासा शहर में कदम रखते ही अलग ढंग के शांतिमय व निश्चिंत वातावरण का आभास होता है। शहर की सड़कों के दोनों किनारों पर लोग हाथ में सूत्र व मालाएं लिये घूमते हुए दिखाई देते हैं। असल में यह ल्हासा शहर की एक प्रकार की धार्मिक संस्कृति के रूप में मानवीय जीवन की एक अभिव्यक्ति है। वास्तव में तिब्बती पंचांग के अनुसार 15 अप्रैल को शाक्यमुनि का जन्म होने, बुद्ध बनने और निर्वाण होने का दिवस है, बाद में इसी दिवस के उपलक्ष में बौद्ध धार्मिक अनुयाइयों के बीच विविधतापूर्ण धार्मिक गतिविधियां चलाने की परम्परा बन गयी है। फिर पिछले हजारों सालों से यह परम्परा धीरे धीरे विकसित होकर आज के सूत्र का रूप ले चुका है।

ल्हासा शहर में सूत्र पढ़ने के लिए तीन लाइनों का विकल्प किया जा सकता है। प्रथम लाइन तिब्बती भाषा में नांगकोर कहा जाता है, इस का अर्थ है भीतरी रिंग रोड ही है। इस रिंग रोड की कुल लम्बाई पाँच सौ मीटर है यानी चुमलाखांड मठ के प्रमुख भवन का एक पूरा चक्कर लगाया जाता है। दूसरी लाइन को मध्यम रिंग रोड कहा जाता है। उस की कुल लम्बाई एक हजार मीटर है यानी वह चुमलाखांड मठ का एक चक्कर लगाया जाता है और तीसरी लाइन है लिन कोर यानी बाह्य रिंग रोड कहा जाता है। इस रिंग रोड की कुल लम्बाई पाँच हजार मीटर है यानी ल्हासा शहर के पुराने शहरीय क्षेत्र का एक चक्कर लगाया जाता है। उक्त तीन लाइनों से चुमलाखांड मठ का घनिष्ट रिश्ता होने से जाहिर है कि चुमलाखांड मठ तिब्बती लामा बौद्ध अनुयाइयों के दिल में महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। तो फिर चुमलाखांड मठ इतना दर्शनीय स्थल कैसे बना है और लाखों करोड़ों अनुयायी इजारों मील का रास्ता तय कर पूजा करने क्यों आते हैं। आखिरकार इस में क्या रहस्य गर्भित है। तो यह रहस्य आज से कोई एक हजार तीन सौ साल से पहले के थांग राजवंश की राजकुमारी वन छंग की शादी से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि ईस्वी सातवीं शताब्दी में थांग राजवंश की राजकुमारी वन छंग की शादी जब तत्कालीन तिब्बत के राजा सुंगचानकांगपू के साथ हुई, तो उस समय ल्हासा घासफूस उगने वाले तालाब के बीच अवस्थित था। यह स्थिति देखकर राजकुमारी वन छंग ने कहा कि ऊपर आकाश से देखा जाए, तो ल्हासा का आकार प्रकार एक लेटी राक्षसी मालूम पड़ता है। इस राक्षसी को वश में लाने के लिए उस के शरीर पर एक मठ की स्थापना की जरूरत है और चुमलाखांड ठीक इसी राक्षसी के हृद्य पर ही है। अतः स्थानीय लोगों ने बकरियों से मिट्टी लादकर चुमलाखांड मठ का निर्माण कर दिया। राजकुमारी वन छंग ने अपने साथ लायी 12 वर्षीय शाक्यमुनि की सोना मूर्ति चुमलाखांड मठ में स्थापित कर दी, तब से चुमलाखांड मठ एकदम नामी होने लगा और उस ने तिब्बती लामा बौद्ध धार्मिक अनुयाइयों के दिल में तीर्थ स्थल के रूप में घर कर लिया।

जब हमारे संवाददाता ल्हासा की सड़कों पर घूम रहे थे, तो अंगिनत तिब्बती लामा बौद्ध अनुयायी हजारों मील के रास्ते की परवाह न कर दंडवती करते हुए बड़ी चुमलाखां��� जाते हुए दिखाई दे रहे थे। आम तौर पर वे अकल्पनीय परिश्रम कर के हर तीन कदम बढ़ने पर दंडवत करते हैं, इसी तरह जाते जाते बड़ी चुमलाखांड मठ एक पहुंचने में लगभग आधे साल से एक साल का समय लग जाता है। जब वे अपना गंतव्य स्थल पहुंचते हैं, तो उन के मुंह, हथलियां और घुटनें बहुत मैली नजर आती हैं, कुछों को लम्बा रास्ता तय करने में जख्मी भी होती है। हालांकि बाहर से वे ढीले ढाले व मैले नज़र आते हैं, पर उन के हृद्य से उगी निष्ठावान भावना और आत्मसंतोष से लोग बहुत प्रभावित होते हैं। शायद यह ही तिब्बत की अलग पहचान और अद्धुत दृश्य है।

इधर सालों में तिब्बत के पर्यटन कार्य के विकास और छिंगहाई तिब्बत रेल मार्ग पर यातायात शुरू होने की वजह से विश्व के विभिन्न देशों से बड़ी तादाद में पर्यटक तिब्बत जाते हैं और ये पर्यटक ल्हासा में बड़ी चुमलाखांड के दर्शन करने अवश्य ही जाते हैं। ऐसी स्थिति में बड़ी चुमलाखांड पर पड़े भारी दबाव को कम करने और इस मठ के रख रखाव के लिए मठ की प्रबंधन कमेटी के कर्मचारियों ने अनेक प्रयास किये हैं. ताकि और अधिक देशी विदेशी पर्यटक इस पवित्र मठ के दर्शन कर सकें। बड़ी चुमलाखांड मठ में हमारे संवाददाताओं ने बहुत से विदेशी पर्यटकों को देखा है। वे बड़ी चुमलाखांड व तिब्बत के संरक्षण पर अपना अपना मत रखते हैं।

ल्हासा शहर में और एक रमणीय स्थल यानी विख्यात चह पुंग मठ देखने लायक भी है। यह मठ तिब्बती लामा बौद्ध धर्म की कलू शाखा का है और वह कान तान मठ व सला मठ के साथ ल्हासा शहर के तीन बड़े मठ माना जाता है। चह पुंग मठ ल्हासा शहर का सब से बड़ा मंदिर ही नहीं, पीढ़ी दर पीढ़ी के लामाओं का अध्ययन करने का स्थल भी रहा है। यह मठ ल्हासा शहर के पश्चिमी उपनगर के ऊज पर्वत के सहारे खड़ी हुई है, इसका प्रमुख रंग सफ़ेद है। दूर से देखा जाये, सफ़ेद चावलों के ढेर जैसा है। तिब्बती भाषा में चावल के ढेर का उच्चारण चह पंग ही है, इसलिए इस मठ का नाम चह पुंग रखा गया।

इस चह पुंग मठ की सब से बड़ी विशेषता है कि तिब्बती पंचांग के अनुसार हर वर्ष में तीस जून को इस मठ में श्वय तून उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव ल्हासा शहर में एक अलग ढंग का दिवस माना जाता है। उत्सव के दिन भिक्षु चह पुंग मठ में सुरक्षित बड़े आकार वाले थांग का नामक मूल्यवान चित्र बड़ी सावधानी से तड़के धूप के प्रथम किरण में बाहर निकाल कर ऊज पर्वत पर लटकाते हैं। पर्वत की तलहटी से ऊपर की चोटी तक लटके सुंदर थांगका चित्र हवा में फहरते नजर आते हैं और यह दृश्य देखकर बौद्ध धार्मिक अनुयायी बुद्ध की शौभा महसूस कर पाते हैं।

असल में चह पुंग मठ के निर्माण के शुरू में इतना बड़ा नहीं था। 17वीं शताब्दी में पांचवीं पीढ़ी के दलाई लामा इसी मठ में रहते थे और उस ने भिक्षुओं को इस मठ का विस्तार करने का आदेश दिया। चोछिन महा भवन इस मठ का केंद्र है और वह भिक्षुओं का सूत्र सुनाने, बहस मुबाहिसा करने और धार्मिक रस्म आयोजित करने का स्थल भी है। इस का क्षेत्रफल कोई चार हजार पाँच सौ मीटर है और सात हजार लोगों को समा सकता है। जब हमारे संवाददाता इस महा भवन में प्रविष्ट हुए, तो इस मठ में बसे भिक्षु सूत्र पर बहस मुबाहिसा कर रहे थे।

चह पुंग मठ की तीसरी मंजिल पर सुप्रसिद्ध मैत्रय बुद्ध की मूर्ती रखी हुई है। मूर्ति के सामने एक सफ़ेद शंघ भी रखा हुआ है। कहा जाता है कि यह शंघ बुद्ध शाक्यमुनि द्वारा छोड़ी गयी वस्तु है और वह इस मठ की धरोहर भी है। जब हम यहां आ पहुंचे, तो मठ के आचार्य ने इस शंघ से पवित्र जल उन्हें पिलाया, ताकि सभी लोग सही सलामत व सुखचैन रहे।

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