पठारीय शहर शिनिंग

2019-08-28 09:00:00
Comment
शेयर
शेयर Close
Messenger Messenger Pinterest LinkedIn

चीन की छिंगहाई तिब्बत पठार विश्व में समुद्र सतह की सब से ऊपरी ऊँचाई पर स्थित पठार मानी जाती है। बहुत से भौगोलिक और जोखिमी इस छिंगहाई तिब्बत पठार को दक्षिण व उत्तर ध्रुवों का दर्जा देकर पृथ्वी का तीसरा ध्रुव कहते हैं।

शिनिंग शहर नीदरलैंड के राष्ट्रीय फूल टुलिप की जन्मभूमि है। बहुत से पर्यटकों का विचार है कि समुद्र सतह की सब से ऊपरी ऊँचाई पर स्थित छिंगहाई तिब्बत पठार पर पानी और ऑस्किजन का अभाव होने से वनस्पतियों, खास कर फूल पौधों का उगना अनुचित है। पर वास्तविक स्थिति ठीक इस के विपरित है। शिनिंग की विशेष भौगोलिक स्थिति और वातावरण टुलिप फूल उगाये जाने की बेहद अनुकूल स्थिति उपलब्ध है।

क्योंकि वहां का पठारीय मौसम ठंडा है। दिन रात के तापमान का अंतर काफ़ी बड़ा है, इसलिए विभिन्न किस्मों वाले फूलों, खासकर टुलिप के लिए बेहद अनुकूल है और इन फूलों के रंग भी अद्धुत सुंदर हैं।

वर्तमान में शिनिंग शहर में विशाल पैमाने पर टुलिप उगे हुए हैं। जब वसंत में विविधतापूर्ण रंगीन टुलिप खिल जाते हैं, तो उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है। 2002 वर्ष से शिनिंग शहर की नगर पालिका ने हर वर्ष के मई में टुलिप उत्सव मनाये जाने का निर्णय लिया है। ऐसे मौके पर शिनिंग शहर के चौराहों और प्रमुख सड़कों के दोनों किनारों पर खिले हुए ताजा टुलिपों से तैयार झांकियां दिखाई देती हैं। यदि पर्यटक मई में शिनिंग शहर के भ्रमण पर जाते हैं, तो उन्हें विभिन्न प्रकार के चालीस लाख से अधिक पठारीय टुलिप देखने को मिलते हैं।

हर वर्ष जुलाई व अगस्त में चीन के अधिकतर क्षेत्रों में बहुत गर्मी लगती है, जबकि शिनिंग शहर का मौसम काफ़ी सुहावना होता है और ठंडी हवा चलती है। क्योंकि शिनिंग शहर एक बेसिन में स्थित है, इसलिए गर्मियों में यहां का सब से ऊँचा तापमान केवल बीस से कम डिग्री होता है।

इधर के सालों में बहुत से देशी विदेशी पर्यटक गर्मियों में गर्मी से बचने के लिए शिनिंग जाना पसंद करते हैं। वे इस शहर में ठहरने के दौरान यहां के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द उठाने के साथ साथ ठंडी हवा के झोके को भी महसूस कर पाते हैं। शिनिंग शहर पूरे चीन, यहां तक की विश्व में गर्मियों से बचने वाली दुर्लभ आरामदेह जगह है। शिनिंग शहर का मौसम अत्यंत सुहावना ही नहीं, शहर के उपनगर में स्थित चार सौ वर्ष पुराना ऐतिहासिक बौद्ध धार्मिक ताल्स मठ भी देखने लायक है।

ताल्स मठ दक्षिण पश्चिम शिनिंग शहर से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वह उत्तर पश्चिम चीन का बौद्ध धार्मिक केंद्र माना जाता है। चार लाख वर्गमीटर की जमीन पर स्थित यह ताल्स मठ एक हजार से अधिक आंगनों और चार हजार पाँच सौ से अधिक भवनों से गठित संपूर्ण हान व तिब्बती वास्तु कलाओं से युक्त भवनों का समूह चीन में बहुत विख्यात है। और तो और इस मठ में भित्ति चित्र, कसीदा और घी से बनी बनाई कलाकृतियां सब से प्रसिद्ध व मूल्यवान हैं।

इस पगोड़ा मठ की स्थापना 1560 में हुई। इस तरह उस का इतिहास कोई चार सौ वर्ष पुराना है, पर अच्छे संरक्षण की वजह से वह बहुत सुन्दर दिखाई देता है। मठ के मुख्य द्वार के सामने आठ आलीशान सफेद पगोड़े खड़े हैं जो इस मठ का प्रतीक भी हैं और आकर्षण का केंद्र भी। यहां खड़े होकर आप अगर चारों ओर नजर दौड़ायें तो पाएंगे कि पगोडा समूह के सामने स्थित छोटा चौक तिब्बती शैली की दस्तकारी की दुकानों से खचाखच भरा है और दुकानदार आवाज लगाते चीज़ें बेचने में मग्न हैं। देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ इन छोटी-बड़ी दुकानों से होकर मठ की ओर उमड़ती दिखती है। इस तरह इस पवित्र मठ के चारों ओर व्यावसायिक वातावरण पर्याप्त रहता है। इसे देखकर मुझे चिंता हुई कि कहीं यह व्यावसायिक वातावरण और पर्यटकों की भीड़ इसकी धार्मिक पवित्रता को तो भंग नहीं करेगी। पर इस मठ के दौरे से मेरी यह चिन्ता दूर हो गयी।

मठ के पिछले भाग में एक छोटे आँगन स्थित है। इस आँगन के मकान हान व तिब्बती जाति की वास्तुशैलियों वाले हैं। मकानों की छत पर लगे हरे पत्थर और गोल छज्जे हान शैली के हैं, जबकि लाल सीढ़ीनुमा खंभे, दीवारें और खिड़कियां तिब्बती शैली की। दिलोजान से दंडवत होने में मग्न अनुयाइयों को देखते हुए पर्यटकों को उन की बुद्ध के प्रति अपार निष्ठा महसूस हुई। शायद उन्हें विश्वास हुआ होगा कि उन के हृद्य में अवश्य ही एक छायादार पीपल है और हर पीपल पत्ती पर एक बुद्ध की मूर्ति अंकित है और ये मूर्तियां अपना मानसिक आस्था और जीवन लक्ष्य ही है। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए वे कठिनाइयों को दूर कर अकल्पनीय दृढता से स्वयं निर्धारित कार्य पूरा करने के लिए प्रयास करते रहते हैं।

ताल्स मठ चीन के प्रसिद्ध बौद्ध धर्म का पवित्र स्थल है। हजारों लाखों निष्ठावान अनुयायी दूर फासले की परवाह न कर यहां आते हैं दंडवत प्रार्थना के जरिए अपने और भगवान के बीच का फासला नाप लेते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं।

यहां पर लोगों ने सच्चे मायने में बौद्ध धर्म की संस्कृति का तर्क समझ लिया है और दूसरे अलग क्षेत्र के विविधतापूर्ण रीति रिवाज को महसूस किया है। इतने अधिक निष्ठावान अनुयायी और शांत वातावरण किसी दूसरी जगह में कहीं नजर नहीं आते हैं।

थाल्स यानी पगोडा मठ के दौरे से पर्यटकों को बौद्ध धर्म का यह तर्क समझ में आया कि किसी भी एक क्षण दिल में एक साधारण भाव बनाये रखकर उसमें बसे पीपल की रक्षा की जानी चाहिए।

शेयर

सबसे लोकप्रिय

Related stories