भारत स्थित चीनी राजदूत ल्वो चाओह्वेई-- ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने विभिन्न क्षेत्रों में यथार्थ सहयोग को और गहरा किया है

2018-08-08 10:00:00
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भारत स्थित चीनी राजदूत ल्वो चाओह्वेई-- ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने विभिन्न क्षेत्रों में यथार्थ सहयोग को और गहरा किया है

भारत स्थित चीनी राजदूत ल्वो चाओह्वेई-- ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने विभिन्न क्षेत्रों में यथार्थ सहयोग को और गहरा किया है

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 25 जुलाई को दक्षिण अफ्रीका के जोहानसबर्ग में आयोजित हुआ। मौके पर भारत स्थित चीनी राजदूत ल्वो चाओह्वेई ने चीनी मीडिया के साथ एक साक्षात्कार किया। इस शिखर सम्मेलन का अर्थ बताते हुए ल्वो ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में हुआ यह सम्मेलन ब्रिक्स देशों के दूसरे स्वर्णिम दशक में प्रवेश करने की पृष्ठभूमि में आयोजित हुआ, जिस का अहम अर्थ होता है। पहला, सम्मेलन ने वैश्वीकरण और बहुपक्षीयवाद की ब्रिक्स आवाज सुनायी। हाल में विश्व में भूमंडलीकरण विरोधी एकतरफ़ावादी और संरक्षणवादी प्रवृत्ति नज़र आयी है। अमेरिका ने क्रमशः अपने देश के कानून के मुताबिक एकतरफ़ा तौर पर आयातित उत्पादों पर और अधिक शुल्क लगाने की घोषणा की और गंभीर रूप से विश्व व्यापार संगठन के नियमों का उल्लंघन किया। अमेरिका का ट्रेड वॉर चीन के खिलाफ़ नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को शत्रु समझता है, जिसने विभिन्न देशों के अर्थतंत्र, अंतरदेशीय उद्यमों और उपभोक्ताओं के हितों को नुकसान पहुंचाया है और पूरी दुनिया के नागरिकों के हितों को क्षति भी पहुंचायी है। इससे अमेरिका के खुद के हितों पर भी असर पड़ेगा। ट्रेड वॉर का कोई विजेता नहीं हो सकता। अहम नवोदित आर्थिक समुदाय के सहयोग प्लेटफार्म होने के नाते विभिन्न स्थलों में ब्रिक्स देशों ने अनेक बार एकतरफावाद और संरक्षणवाद का विरोध करने का समान रुख प्रकट किया था। दूसरा, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने विभिन्न क्षेत्रों में यथार्थ सहयोग को और गहरा किया है। पाँच देश औद्योगिकीकरण, नवाचार, समावेशी और पूंजी निवेश आदि क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करेंगे, ताकि ब्रिक्स देशों की समूची प्रतिस्पर्द्धा शक्ति को उन्नत कर सके। तीसरा, ब्रिक्स श्यामन शिखर भेंटवार्ता की सहमतियों का कार्यान्वयन कर ब्रिक्स प्लस के आधार पर ब्रिक्स के दोस्तों के सर्किल को निरंतर विस्तृत करेंगे, ताकि दूसरे स्वर्णिम दस साल की सुन्दर अभिलाषा को साकार किया जा सके। चौथा, एकता व सहयोग की ब्रिक्स छवि को दर्शाया गया। हाल में दुनिया के अधिकांश देश विकासशील देश हैं। नवोदित आर्थिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रिक्स देश एकजूट कर विश्व शांति व स्थिरता की रक्षा करने वाली मजबूत शक्ति और प्रबल स्तंभ बनेंगे।

 ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग में मौजूद समस्याओं की चर्चा में ल्वो ने कहा कि ब्रिक्स सहयोग की आंतरिक प्रेरणा शक्ति को मज़बूत किया जाना चाहिए। 2017 के आंकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक संपर्क इतना घनिष्ट नहीं है, पूंजी निवेश भी अपेक्षाकृत कम रहा है। ब्रिक्स नवीन विकास बैंक की और बड़ी निहित शक्ति है। ब्रिक्स देशों में सबसे तेज़ आर्थिक विकास करने वाले दो देश होने के नाते चीन और भारत को ब्रिक्स के विकास की अहम जिम्मेदारी उठानी है। ब्रिक्स तंत्र में सहयोग को बढ़ावा देना द्विपक्षीय विकास की आवश्यक मांग है। दोनों को राजनीतिक सहयोग को प्रगाढ़ कर वैश्विक प्रशासन में और ज्यादा सहमतियां प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। चीन और भारत ब्रिक्स के ढांचे में विविधतापूर्ण सहयोग कर सकते हैं और अन्य ब्रिक्स देशों के साथ रुखों का समन्वय बनाना चाहिए। यदि चीन और भारत एक ही आवाज़ में बोलते हैं, तो सारी दुनिया ध्यान से सुनेगी। चीन और भारत को आर्थिक सहयोग मजबूत कर समावेशी विकास को आगे बढ़ाना चाहिए। चीन और भारत की मज़बूत आर्थिक आपूर्ति है और विकास की भारी निहित शक्ति है। दोनों को ब्रिक्स देशों के आर्थिक साझेदारी रणनीति का कार्यान्वयन कर ब्रिक्स देशों के नये औद्योगिक क्रांतिकारी साझेदारी संबंधों की स्थापना करनी चाहिए। चीन और भारत को सांस्कृतिक आदान प्रदान को घनिष्ट करने की जरूरत है। प्राचीन काल से ही चीन और भारत के बीच सांस्कृतिक आवाजाही चल रही है। इस साल चीन और भारत उच्च स्तरीय सांस्कृतिक तंत्र की पहली बैठक बुलाएंगे। यह द्विपक्षीय समझ व मैत्री को प्रगाढ़ करने के लिए लाभदायक होगा, जिससे बाहरी दुनिया पर सक्रिय प्रभाव पड़ सकेगा। साथ ही चीन और भारत को दोस्तों के दायरे का विस्तार करना चाहिए। ब्रिक्स प्लस के जरिए ब्रिक्स देश विकासशील देशों के साथ आर्थिक सहयोग का विस्तार कर सकेंगे। चीन-भारत प्लस सहयोग मोड ने ब्रिक्स प्लस सहयोग के विषय को मजबूत किया है।

  तो चीन एक किस तरह के चीन-भारत संबंध चाहता है?ल्वो के मुताबिक, एक स्वस्थ व स्थिर चीन-भारत संबंध दोनों देशों, इस क्षेत्र यहां तक पूरी दुनिया के लिए अहम हैं। चीन-भारत संबंध जटिल रहा है। द्विपक्षीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो दोनों देश अहम पड़ोसी देश हैं। दोनों का लम्बा व पुराना आदान प्रदान का इतिहास है, साथ ही दोनों के बीच अनसुलझ यथार्थ समस्याएं भी है। घरेलू विकास के दृष्टिकोण से चीन और भारत आर्थिक विकास, सुधार को गहरा करने और आधुनिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के महत्वपूर्ण दौर में रहे हैं। चीनी सपने और नये भारत के इरादे को साकार करने के लिए बेहतर बाहरी वातावरण की जरूरत भी है। वैश्विक दृष्टिकोण से देखा जाए इधर के सालों में विकासशील देशों का सामूहिक पुनरुत्थान हुआ। चीन और भारत उन में प्रतिनिधि होने के नाते भूमंडलीकरण विरोधी और संरक्षणवाद की पृष्ठभूमि पर दबाव का सामना कर रहे हैं। साथ ही दोनों देशों को साथ साथ पुनरुत्थान के नवोदित बड़े देशों के सहअस्तित्व के रास्ते की खोज भी करनी चाहिए। वूहान अनौपचारिक भेंटवार्ता चीन और भारत के द्विपक्षीय संबंधों के इतिहास में मील का पत्थर है। मैत्री, सहयोग, विकास, समन्वय और नियंत्रण इस भेंटवार्ता की उपलब्धि है। इस मुलाकात से दोनों देशों के नेताओं के बीच मैत्री को प्रगाढ़ किया गया। द्विपक्षीय आपसी विश्वास को मजबूत कर द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा दिया गया। द्विपक्षीय विकास रणनीति को गहरा किया गया। अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समस्याओं पर समन्वय को मज़बूत किया गया और मैत्रीपूर्ण सलाह मश्विरे के जरिए मतभेदों पर नियंत्रित किया गया।

9 जून को चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी ने शांगहाई सहयोग संगठन के छिंगताओ शिखर सम्मेलन के दौरान फिर एक बार द्विपक्षीय भेंटवार्ता की। वास्तव में छिंगताओ शिखर सम्मेलन वूहान अनौपचारिक भेंटवार्ता का विकास है। दोनों नेताओं ने अगले साल दूसरे दौर की अनौपचारिक भेंटवार्ता करने पर सहमत किया। यह छिंगताओ भेंटवार्ता की सब से अहम उपलब्धि है। चीन और भारत के बीच सीमांत समस्या के विशेष प्रतिनिधि सम्मेलन इस साल में आयोजित होगा। अच्छे चीन-भारत संबंध पर बरकरार रखना चाहिए। दोनों को इसे मूल्यवान समझकर उभय प्रयास करना चाहिए।

इस साल के नवम्बर माह में चीनी अंतर्राष्ट्रीय आयात एक्सपो चीन के शांगहाई में आयोजित होगा। लेकिन इस एक्सपो के प्रति भारतीय उद्यमों ने ज्यादा रुचि नहीं दिखायी है। इस के पीछे क्या कारण है?इस की चर्चा में चीनी राजदूत ल्वो ने कहा कि नवम्बर माह भारतीयों के लिए एक सब से बड़ा त्योहार मनाया जाएगा, यानी दीवाली है। वह चीन के परम्परागत त्योहार वसंत त्योहार की तरह है। इसलिए यह संभवतः भारतीय उद्यमों के चीन आकर प्रदर्शन करने पर असर पड़ सकेगा। अब दोनों पक्ष इस पर घनिष्ट सलाह मश्विरा कर रहे हैं।

भारतीय आर्थिक विकास बहुत तेज़ है और बाजार की बड़ी निहित शक्ति भी है। कई चीनी कारोबार भारत में पूंजी निवेश करने के लिए आए हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय बाजार में चीनी मोबाइल फोनों का अनुपात आधे से ज्यादा हो चुका है। भारत में चीनी कारोबारों का निवेश आपसी लाभ और साझी जीत वाली कार्यवाई है। भारतीय पक्ष को और न्यायपूर्ण व उचित पूंजी निवेश के वातावरण की तैयारी करनी चाहिए और अनावश्यक सुरक्षा जांच को कम करना चाहिए, ताकि चीन समेत विदेशी कारोबारों के भारत में निवेश देने के लिए अच्छी स्थितियां तैयार कर सके।

एशियाई आधारभूत/बुनियादी संस्थापन निवेश बैंक(एआईआईबी) का अहम सदस्य देश होने के नाते भारत को 1.2 अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज मिला, जो सबसे बड़ा उधारकर्ता है। ल्वो के विचार में यह आश्चर्य की बात नहीं है। 87 सदस्य देशों   वाली बहुपक्षीय वित्तीय संस्था होने के नाते एआईआईबी खुली और समावेशी है। एआईआईबी अंतर्राष्ट्रीय बुनियादी संरचनाओं के निर्माण को आगे बढ़ाने पर ध्यान देता है। तेज़ विकसित होने वाले नये आर्थिक समुदाय होने के नाते यातायात और विद्युत आदि बुनियादी संरचनाओं के निर्माण क्षेत्र में भारी पूंजी की आवश्यक्ता है। 25 से 26 जून तक एआईआईबी का तीसरा वार्षिक सम्मेलन मुम्बई में आयोजित हुआ। वार्षिक सम्मेलन में मुख्य टीम है बुनियादी संरचनाओं के निर्माण के लिए पूंजी इकट्ठा करने के लिएः नवाचार व सहयोग । भारतीय पीएम मोदी ने भाषण में भारत और एआईआईबी के सहयोग की पूरी पुष्टि की।

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