आतिशबाजी व पटाखा

2018-02-21 09:00:00
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आतिशबाजी छोड़ने से रंग, तस्वीर और ध्वनी का प्रभाव पैदा होता है। वह लोगों को दृष्टिगत प्रभाव देने वाला उत्पाद है। पटाखे का दूसरा नाम है प्यान फो, जिसे जलाने से विस्फ़ोट होता है और तेज ध्वनि व चमक पैदा होती है। वह मुख्यतः लोगों को ध्वन्यात्मक प्रभाव देता है।

प्राचीन चीन में लोग यह मानते थे कि आग अनिष्ट को भगा दे सकती है, चिनगारी मंगल आने का पूर्व वाचक है। ध्वनि भूत प्रेतों को डरा सकती है और दुष्टों को भगा दे सकती है। धुआं से यांग छी ( धनात्मक प्राण) बढ़ जा सकती है। चूंकि आतिशबाजी व पटाखे छोड़ने से उपरोक्त ध्वनि, अग्नि, धुआं व प्रकाश आदि पैदा होंगे, इसलिए वह स्वभाव से लोगों की उन मान्यता से मेल खाता है और समारोह व उत्सव मनाने के लिए आदर्श सामान बन गया है। चीन में हर पारंपरिक उत्सव या अहम जशनों के अवसर पर खुशी की भावना प्रकट करने और शांति व सुखमंगल की प्रार्थना करने के लिए लोग प्रायः आतिशबाजी और पटाखे छोड़ देते हैं। विशाल भूमि पर पटाखों की आवाज़ जगह जगह सुनाई देती है। आसमान में आतिशबाजियों के रंगबिरंगा व रूपवान प्रकाश चमकता है। वाकई बड़ी खुशहाली व शांति का माहौल जुड़ जाता है।

यदि आप आतिशबाजी व पटाखे की उत्पत्ति जानना चाहते हैं, तो बाओ जू (पटाखा) की चर्चा करनी जरूरी है। बाओ जू चीन द्वारा आविष्कृत विशिष्ट पटाका था, जो“बाओ जांग”,“फाओ जांग”व “प्यान फो”नाम से भी जाना जाता है। इस का लगभग दो हज़ार से ज़्यादा वर्षों का इतिहास है। प्राचीन काल में नव वर्ष के अवसर पर भूत प्रेतों को भगा देने के लिए लोग अग्नि से बांस को जलाते थे। बांस जलने से फट जाता था और पटाके की आवाज आती थी।“बाओ जू”( फटने वाला बांस ) का नाम इस से आया था। थांग राजवंश में बाओ जू“बाओ गेन”भी कहलाता था। एक अपेक्षाकृत लम्बे बांस को पाइप पाइप में जलाने पर निरंतर विस्फ़ोट की आवाज़ आती रहती थी। बाद में ताओ पंथी कीमियागारों ने अनेक बार रासायनिक परीक्षण करने के उपरांत बारूद बनाने के फ़ार्मूले की खोज की और बारूद का आविष्कार किया। उन्होंने पता चला था कि शोरे, गंधक व काठकोयले के आनुपातिक मिश्रण से काला बारूद बनाया जा सकता है जिसे जलाने से विस्फ़ोट पैदा होता है। बारूद के आविष्कार के बाद लोग बांस जलाने की जगह कागज के रोल में बारूद भर कर विस्फ़ोटित करते थे। उस का विस्फ़ोट होते समय कर्णभेदी तेज ध्वनि पैदा होती है और कागज कणों में फटकर उड़ता है और बारूद का गंध चारों ओर फैलता है। इसलिए बाओ जू को“बाओ जांग”भी कहा जाता था। इस के बाद लोग पटसन की रस्सी से बाओ जू को गुच्छों के रूप में बांध देते थे और एक साथ जलाते थे। इस का और एक नाम“प्येन फो”(बुने हुए पटाखे) आया था। चूंकि वह चाबुक मारने जैसी ऊंची आवाज देता था, इसलिए उसे“प्यान फो”(चाबुक का पटाखा) का नाम भी दिया गया। “प्येन फो”के आधार पर विभिन्न प्रकार के पटाखे और आतिशबाजी भी उत्पादित किए गए। और तो और समाज के विकास के साथ पटाखे का काम दुष्टों व भूत प्रेतों को भगा देने से बदलकर त्योहार के शुभ, खुशी व उल्लास देने में आ चुका है।

ऐतिहासिक ग्रंथों व संबंधित साहित्यिक रचनाओं के अनुसार स्वेई व थांग राजवंशों में बारूद कदम ब कदम मनोरंजन के लिए धुआं पैदा करने के काम में आया था। उत्तरी सुंग राजवंश में बारूद से आतिशबाजी बनाने का उद्योग विकसित होकर परिपक्व हो गया था और बड़े आकार वाला“ढांचे पर बांधने वाली आतिशबाजी”या“गमले में आतिशबाजी”प्रकाश में आए। मिंग व छिंग राजवंशों में चीन में आतिशबाजी व पटाखे बनाने की कला बहुत उन्नत स्तर पर पहुंची थी और आतिशबाजी छोड़ना लोकप्रिय रहा था। ऊंचाई, किस्म व आकार की दृष्टि से देखा जाए तो उस समय की आतिशबाजी व पटाखे बहुत श्रेष्ठ थे। मिंग राजवंश के कवि चांग शी च्ये ने अपनी कविता में आतिशबाजी छोड़ने से आकाश में पैदा दृश्यों का सजीव वर्णन किया थाः “आकाश में सौ दीपक धाराएं चमकती हैं, मानो अप्सरी सजधज रंगीन आलोक लेकर आती हो। प्रतीत होता है कि लम्बे तलवार से अजगर का वध रहा हो और मुरली बजाते कोई वीर तुंग थिंग झील को पार करता हो।”छिंग राजवंश के अंतिम काल में आतिशबाजी छोड़ने का पैमाना और बड़ा हुआ और आतिशबाजी बनाने की कला उत्तम हो गयी और आतिशबाजी की किस्मों में बड़ा बहुल्य और विविधता आ गयी, जो अतुलनीय था।

चीन में आतिशबाजी व पटाखे के जन्म व विकास की प्रक्रिया से पूर्ण रूप से चीनी जनता की प्रखर बुद्धिमता प्रतिबिंबित हुई है और चीनी राष्ट्र की महान व गहन पारंपरिक संस्कृति अभिव्यक्त हुई है। वह चीनी जनता के प्राचीन आविष्कार की अद्भुत कृति है और प्राचीन चीनी रीति रिवाज की बुद्धिमान प्रतिबिंब भी है।

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