शक्तिशाली मातृभूमि के बिना विदेश में हमें अभिमान प्राप्त नहीं होगा:छू ह्वान

2019-10-24 16:50:23
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दोस्तों, नये चीन की स्थापना के 70 वर्षों में चीन के विभिन्न पक्षों में उल्लेखनीय सफलताएं प्राप्त हुई हैं। न सिर्फ़ चीनी जनता के जीवन में ज़मीन-आसमान का बदलाव आया है, बल्कि विदेशों में रह रहे प्रवासी चीनियों ने भी मातृभूमि के विकास से उन के जीवन में हुए परिवर्तन को गहन रूप से महसूस किया है। दक्षिण कोरिया-चीन सांस्कृतिक मैत्री संघ की अध्यक्ष छू ह्वान ने कहा कि देश के बिना घर हासिल नहीं होता। और शक्तिशाली मातृभूमि के बिना विदेश में हमें अभिमान भी प्राप्त नहीं होता। गौरतलब है कि छू ह्वान को सक्रिय रूप से दक्षिण कोरिया व चीन के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को मजबूत करने से सेजोंग संस्कृति पुरस्कार मिला। वे यह पुरस्कार पाने वाली पहली चीनी व्यक्ति हैं। चीन व दक्षिण कोरिया के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के 27 वर्षों में चीन का बड़ा विकास हुआ है। ज्यादा से ज्यादा दक्षिण कोरियाई लोग चीन के बारे में जानना चाहते हैं। साथ ही दक्षिण कोरिया में रहने वाले चीनियों को भी ज्यादा से ज्यादा अभिमान मिल सकता है।

दक्षिण कोरिया-चीन सांस्कृतिक मैत्री संघ दक्षिण कोरिया के संस्कृति, खेल व पर्यटन मंत्रालय के अधीन एक राष्ट्रीय संघ है। जिस की स्थापना वर्ष 2002 में हुई। वह दक्षिण कोरिया में चीन के प्रति सात मैत्री संघों में एकमात्र संघ है, जिसका प्रबंध चीनी व्यक्ति करते हैं। इस संघ की स्थापना करने के मूल इरादे की चर्चा में छू ह्वान ने याद करते हुए कहा कि विदेश में रह रहे एक चीनी व्यक्ति के रूप में उन्हें आशा है कि ज्यादा से ज्यादा विदेशी लोग चीन के बारे में जान सकेंगे। उन के अनुसार, लगभग 17 वर्ष पहले इस संघ की स्थापना की गयी। उस समय दक्षिण कोरिया के लोग चीन के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। इसलिये मैंने अकसर यह कहा था कि हालांकि चीन व दक्षिण कोरिया भूगोल में बहुत नजदीक हैं, लेकिन संस्कृति की समझ में उसी समय दोनों के बीच लंबी दूरी थी। लंबी दूरी तो भयानक बात नहीं है, पर मन में अनुभूति की दूरी अच्छी बात नहीं है। क्योंकि अगर दोनों के ख्याल से हम एक दूसरे से खूब समझते हैं, लेकिन वास्तव में इतना परिचित नहीं हैं। ऐसी स्थिति में बहुत गलतफ़हमियां पैदा होंगी। मुझे लगता है कि यह शायद पूर्व व पश्चिम के बीच मौजूद सांस्कृतिक अंतर से और भयानक होगा। उस समय मैंने यह फैसला किया कि मैं उन्हें चीन के बारे में ज्यादा जानकारियां दूंगी, क्योंकि चीन की संस्कृति बहुत रंगारंग है।

चीनी लोगों के कर्तव्य के अलावा उस साल हुई एक बात ने छू ह्वान पर बड़ा प्रभाव डाला। इस बात से उन्हें पता चला कि दक्षिण कोरिया में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिये एक मंच की स्थापना की आवश्यकता है। उन्होंने कहा,उस समय जब मैं दक्षिण कोरिया में रहती थी, तो सब से पहले मैंने ह्वाय्वेन चीनी संस्कृति संस्थान की स्थापना की, यानी चीनी राष्ट्र का पार्क है। वहां मैंने उन्हें चीनी भाषा व चीनी भोजन बनाना सिखाया। उस समय एक शिपिंग कंपनी के अध्यक्ष भी मेरे संस्थान में आए। वे उस साल में उन कम लोगों में से एक हैं, जो चीन के बारे में कुछ न कुछ जानते थे। मुझे स्पष्ट रूप से इस बात की याद आती है कि उन्होंने सच्चे दिल से मुझ से कहा कि मैं आप को बहुत धन्यवाद देता हूं। अगर आप के पास समय हो, तो मैं आप को मैकडॉनल्ड्स में खिलाऊंगा। क्योंकि चीन में मैकडॉनल्ड्स नहीं है। वह साल 2000 था। वर्ष 2000 में चीन में मैकडॉनल्ड्स क्यों नहीं था?यह मेरे लिये एक बड़ा झटका था। उस समय मुझे लगा कि एक ऐसी मंच की स्थापना करनी चाहिये, जिससे दोनों देशों की जनता एक दूसरे को समझ सकती हैं।

देशों के बीच संबंधों का आधार जनता के बीच स्नेह है। दक्षिण कोरिया-चीन सांस्कृतिक मैत्री संघ की स्थापना के आरंभ में दक्षिण कोरियाई जनता व चीन के बीच दूरी को कम करने के लिये छू ह्वान ने चीन-दक्षिण कोरिया मैत्री सांस्कृतिक दिवस और दिल से दिल जुड़ें नामक दक्षिण कोरिया व चीन के युवाओं के बीच आदान-प्रदान गतिविधि का आयोजन किया। चीन-दक्षिण कोरिया मैत्री सांस्कृतिक दिवस के आयोजन से दोनों देशों की केंद्रीय व क्षेत्रीय सरकारों व उद्यमों के बीच आदान-प्रदान मजबूत किया गया। उधर दिल से दिल जुड़े गतिविधि में चीन के छिंगहाई, क्वेइचो, युन्नान आदि क्षेत्रों और दक्षिण कोरिया के दक्षिण जिओला प्रांत व ग्यांगसैग्बुक आदि क्षेत्रों के एकल अभिभावक परिवारों व गरीबी परिवारों से आए चार सौ से अधिक युवाओं को निःशुल्क एक दूसरे देशों की यात्रा करने का मौका दिया गया। लेकिन ऐसी सद्भावना से भरी हुई गतिविधियों के प्रति उस साल सवाल भी उठाया गया। जिस का कारण तो यही है कि वे चीन के बारे में नहीं समझे। छू ह्वान के अनुसार,हमने दस्तावेज लिखकर दक्षिण कोरिया की क्षेत्रीय सरकार व सड़क कार्यालय को सौंप दिया, और उनसे बच्चों की सिफ़ारिश करने का आग्रह किया। हम उन्हें निमंत्रण भेजेंगे, और एयर टिकट समेत सभी खर्च देंगे। उस समय हमें बड़ा झटका मिला। क्योंकि उन सरकारी अधिकारी हम पर विश्वास नहीं करते थे। उन के ख्याल से इससे पहले उन्हें केवल विकसित देशों से इस तरह का निमंत्रण मिला है, क्या चीन सभी खर्च दे पाएगा?इसलिये उन्होंने बारी बारी से इस बात की पुष्टि की। और उन का दूसरा संदेह यह था कि क्या हमारे संघ ने कोई लाभ के लिये यह काम किया। हालांकि उन की दुर्भावना नहीं है, लेकिन इस के दौरान हमें अच्छा नहीं लगा। पर आखिर वे इस गतिविधि का समर्थन दिया, और बच्चों की सिफ़ारिश की। परिणाम तो अच्छा रहा। चीन की यात्रा करने से पहले बच्चे चीनी भाषा नहीं सीखना चाहते थे, लेकिन चीन में आते ही उन्हें चीनी भाषा सीखने की तीव्र इच्छा हुई, और उन्होंने चीन में पढ़ाई करने के बारे में भी पूछा।

आदान-प्रदान का परिणाम दोनों देशों में होता है। दक्षिण कोरिया के बच्चों को चीन के बारे में बड़ा शौक पैदा हुआ। उधर दक्षिण कोरिया की यात्रा करने वाले चीनी बच्चे भी वहां पढ़ाई करना चाहते थे। छू ह्वान के अनुसार,उन में एक बच्ची तो ऐसी हैं। वे चीन के कानसू प्रांत के थ्येनश्वेए शहर से आई हैं। गत वर्ष वे दक्षिण कोरिया के एक विश्वविद्यालय से स्नातक हुई। अब वे एक अंतर्राष्ट्रीय स्कूल में चीनी भाषा सिखाती हैं। गत वर्ष के अंत में उन्होंने मुझे फ़ोन किया और कहा कि वे अपने पहले महीने का वेतन दान के रूप में हमारे संघ को देना चाहती हैं। उन्होंने हमें बड़ा विश्वास दिया।

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