अच्छे छात्रों से पढ़ने का आग्रह करने की ज़रूरत नहीं

2019-09-06 13:41:14
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युवावस्था मानव की जिन्दगी में एक बहुत महत्वपूर्ण समय होता है। इस दौरान बच्चों को अच्छी आदतें सिखानी चाहिये। बेशक, यह असंभव है कि हर छात्र को बचपन से ही सीखने का बड़ा शौक होता है। इसलिये माता-पिता को बच्चों को अपनी इच्छा से सीखने की अच्छी आदत डलवानी चाहिये। तो यह आदत कैसे विकसित हो सकती है ?

पहले, बच्चों को दूसरे लोगों की मदद के बारे में ठीक से समझना चाहिये। कभी कभार कुछ छात्र यह शिकायत करते हैं कि उनकी पढ़ाई अच्छी नहीं चल रही, इसकी वजह उनके टीचर या मां-बाप हैं। क्योंकि उन्होंने मदद नहीं दी। या उनके लिए पर्सनल टीचर की व्यवस्था नहीं की। वास्तव में अगर हम ध्यान से देखें, तो पढ़ाई में ज्यादा अच्छे विद्यार्थियों को दूसरे लोगों की प्रत्यक्ष मदद बहुत कम चाहिए होती है। उन्हें अपने आप पढ़ाई करना पसंद होता है। दूसरे की मदद उन्हें केवल कुछ सूचना हासिल करने और उनकी नज़र को विस्तृत करने में भूमिका निभाती हैं।

उदाहरण के लिये जब विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन ने आरंभिक रूप से प्राकृतिक विज्ञान में प्रवेश किया, तो एक व्यक्ति ने उन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। वे थे रूसी छात्र तालमेय। उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान के गेट की पहली चाबी आइंस्टीन को दी। यह चाबी पवित्र जीआमिट्री नामक एक पुस्तिका थी। इस पुस्तिका की यादें हमेशा आइंस्टीन के दिमाग में ताज़ा रही। सबसे पहले तालमेय ने अकसर आइंस्टीन के साथ गणित के विषय पर चर्चा की। बातचीत करते करते गणित के प्रति आइंस्टीन का शौक धीरे धीरे बढ़ता गया। स्कूल में पढ़ाने के कुंठित तरीके को छोड़कर आइंस्टीन ने अपने आप से कैल्क्युलस सीखना शुरू किया। कुछ समय के बाद हालांकि गणित में तालमेय आइंस्टीन से पीछे हो गये, लेकिन वे पहले की तरह उत्साह के साथ आइंस्टीन को उसी समय प्रचलित प्राकृतिक विज्ञान की तरह तरह पुस्तकों व दर्शन पुस्तकों का परिचय देते थे।

इस कहानी से हमें यह पता चला कि सबसे कारगर उपाय सीधे तरीके से बच्चों को शिक्षा देना नहीं है। सबसे मददगार उपाय तो उन्हें सीखने का शौक बढ़ाने के लिये सूचनाएं व संसाधन देना है।

दूसरे, बच्चों को यह समझाना चाहिये कि पढ़ाई उनका स्वयं काम है, उन्हें खुद पढ़ने की अच्छी आदत डालनी चाहिये। छात्रों को स्वतंत्रता व गंभीरता से पढ़ाई में हर काम करना, हर समस्या का समाधान करना चाहिये। दूसरे की मदद के बिना जितना संभव हो, उतनी कोशिश करें। अच्छी तरह से अपने आप का प्रबंध करें।

रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार विजेता हाएरोवस्की बचपन के दिनों में एक दिन स्कूल से घर वापस आने के बाद बहुत उदास थे। भोजन करते समय उनकी मां ने उनसे कारण पूछा। उन्होंने जवाब दिया कि कोई बात नहीं है। केवल टीचर द्वारा दिये गये सवालों के जवाब में एक गलती है। पर अभी तक उन्हें यह पता नहीं है कि आखिर ग़लती क्यों है?भोजन के बाद वे फिर एक बार इस बारे में सोचते रहे।

उस समय उनकी बड़ी बहन व छोटा भाई खेल रहे थे। कुछ समय के बाद उनके छोटे भाई ने उन्हें एक साथ खेलने के लिए बुलाया। पर उन्होंने कहा कि उन्हें सबसे पहले इस सवाल का जवाब देना है। और कुछ समय के बाद उनकी बड़ी बहन भी आई, और उन्हें एक साथ खेलने के लिए बुलाने लगी। लेकिन वे लगातार इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे थे। इस पर बहन ने कहा कि क्या तुम्हें मेरी मदद चाहिये?तो तुम जल्द ही हमारे साथ खेल सकते हो। पर उन्होंने कहा कि, नहीं दीदी। मैं खुद इसका जवाब ढूंढना चाहता हूं। अंत में उन्होंने खुद इस सवाल को हल कर अपनी बहन व भाई के साथ खेलना शुरू किया। हाएरोवस्की बचपन से ही पढ़ाई को अपना काम समझते थे। पढ़ाई के प्रति उनका रुख प्रशंसा के योग्य है।

सामान्य जीवन में मां-बाप को ऐसी कहानियां बच्चों को बतानी चाहिये। और उन्हें बताने की जरूरत है कि पढ़ाई अपना काम है, पढ़ाई से जुड़े हर काम को स्वतंत्रता व गंभीरता से करना चाहिये। ताकि बच्चे अच्छी आदत डाल सकें।

तीसरा, पढ़ाई में बच्चों की जिज्ञासा पैदा करनी चाहिए। अगर बच्चों को पढ़ने में बड़ी जिज्ञासा हो, तो वे हर समय पढ़ना चाहते हैं। जैसे चीन के महान लेखक, विचारक व क्रांतिकारी लू श्वन। वे अवकाश के समय भी किताब पढ़ते थे। उन्होंने यह भी कहा था कि समय स्पंज में छिपे पानी की तरह है। अगर आप इसे कसना चाहते हों, तो पानी ज़रूर निकल जाएगा।

अब हम भौतिकी में नोबेल पुरस्कार विजेता फर्मी की चर्चा करते हैं। उन्हें भी बचपन से ही किताब पढ़ने का बड़ा शौक था। स्कूल में प्राप्त शिक्षा उनके लिये काफ़ी नहीं थी, वे अकसर बाजार में जाकर भौतिक विज्ञान से जुड़ी तमाम पुस्तकें खरीद लेते थे। एक दिन उन्होंने घर में भौतिक व गणित की दो किताबें ले ली। उन्होंने अपनी बहन को बताया कि वे फ़ौरन उन दो किताबों को पढ़ेंगे। उन्होंने बड़े चाव से पढ़ा और कहा कि यह किताब बहुत दिलचस्प है। उनकी मेहनत और पढ़ाई में जिज्ञासा ने उन के पड़ोसी प्रोफ़ेसर अमिदी पर गहरा प्रभाव डाला।

प्रोफ़ेसर उन्हें बहुत पसंद करते थे, और हमेशा उन्हें कुछ मुश्किल सवाल देते थे। अमिदी को लगता था कि फ़र्मी सभी सवालों का जवाब नहीं दे पाएंगे। पर फ़र्मी हमेशा कम समय में सभी जवाब दे देते थे। फिर फ़र्मी प्रोफ़ेसर से और मुश्किल सवाल देने को कहते थे। एक बार प्रोफ़ेसर ने एक सवाल फ़र्मी को दे दिया, इस सवाल का जवाब प्रोफ़ेसर खुद भी नहीं जानते थे। पर आश्चर्य की बात है कि फ़र्मी ने इसका जवाब दे दिया। प्रोफ़ेसर ने उनकी खूब प्रशंसा की, और भौतिक व गणित में अपनी सभी पुस्तकें एक एक करके फ़र्मी को दे दी। फ़र्मी एक मछली की तरह भौतिक व गणित के समुद्र में तैरते थे। प्रोफ़ेसर की शिक्षा व मदद से फ़र्मी को युवावस्था में विस्तृत जानकारियां और गहन व अद्वितीय विचार हासिल हो गए।

वास्तव में अगर एक छात्र को पढ़ने की जिज्ञासा है, तो उसे हर समय पढ़ने का मौका मिल सकता है। अगर अवकाश होता है, तो उसका पहला काम ज़रूर पढ़ाई होता है। वे थोड़े-थोड़े समय में अपनी इच्छा से पढ़ सकते हैं, अपने पसंदीदा संसाधन ढूंढ़ सकते हैं, और पढ़ाई में मिली मुश्किलों का सामना कर सकते हैं।

हर मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे की पढ़ाई अच्छी हो, लेकिन अच्छी पढ़ाई की पूर्वशर्त होती है। एक पूर्वशर्त है, बच्चा खुद पढ़ना चाहता है। इस पक्ष में मां-बाप को दो बातों पर ध्यान देना चाहिये। एक है बच्चे को अपने आप सीखने का प्रोत्साहित करना। और दूसरा है बच्चे के लिये पढ़ने का एक अच्छा पारिवारिक माहौल तैयार करना।

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