चीन के प्रति जर्मन विद्यार्थियों का प्रेम

2018-11-16 15:38:28
Comment
शेयर
शेयर Close
Messenger Messenger Pinterest LinkedIn
1/3

दोस्तों, जर्मनी के रुहर क्षेत्र के एस्सेन शहर में स्थित एक मिडिल स्कूल ने चीन से घनिष्ठ संबंध कायम किया है। वर्ष 2014 से वर्ष 2016 तक चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की पत्नी फंग लीय्वान ने दो बार इस मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों व अध्यापकों से भेंट की। इसलिये चीन के प्रति इस स्कूल के बच्चों की विशेष भावना है। वे चीन व जर्मनी के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का युवा दूत बनना चाहते हैं।

जर्मनी के एस्सेन शहर में स्थित बुर्ग्गीमनासियूम मिडिल स्कूल के कोरस रिहर्सल हॉल में संगीत अध्यापिका छन यू इस स्कूल के चीनी कोरस को शिक्षा दे रही हैं। आप आवाज़ सुनकर यह पता नहीं लगा सकते कि यह कोरस किशोर जर्मन बच्चों से गठित है। वर्ष 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की पत्नी फंग लीय्वान ने इस मिडिल स्कूल का दौरा किया। उन्होंने बच्चों को चीनी गीत गाने से चीनी भाषा सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। इस मौके से लाभ उठाकर इस स्कूल ने एक चीनी कोरस की स्थापना की, जिस के सभी सदस्य जर्मन बच्चे हैं। चीनी कोरस की प्रशिक्षक छन यू ने याद करते हुए कहा कि,बच्चों ने फंग से सवाल पूछा कि हम चीनी भाषा अच्छी तरह से सीखना चाहते हैं, क्या इस के बारे में कोई अच्छा उपाय है?फिर फंग ने जवाब दिया कि आप लोग चीनी गीतों के जरिए चीनी भाषा सीख सकते हैं। यह उपाय बहुत सरल व तेज है। इस के बाद इस चीनी कोरस की स्थापना की गयी। कोरस में 60 प्रतिशत सदस्य चीनी भाषा सीखते हैं। और 40 प्रतिशत सदस्यों ने शौकिया तौर पर इस में भाग लिया। उन में हर व्यक्ति का अपना चीनी नाम है। वास्तव में कुछ बच्चों को कुछ भी गाना नहीं आता। इसलिये उन्हें धीरे धीरे सीखना पड़ा। पर बच्चों ने बड़ी कोशिश की, क्योंकि वे यह काम अच्छी तरह से करना चाहते हैं।

इस कोरस की स्थापना के बाद बच्चों ने कई बार चीन व जर्मनी के युवाओं के बीच आयोजित बड़ी आदान-प्रदान गतिविधियों में गीत गाये । माक्सिमिल्येन कोलगेस उन बच्चों में से एक थे। इस साल उन्होंने विश्वविद्यालय में प्रवेश किया है। कोलगेस ने कहा कि मार्च 2014 में जब फंग लीय्वान ने यहां का दौरा किया, तो फंग ने उन्हें बताया कि फंग लीय्वान का चीनी सपना यह है कि ज्यादा से ज्यादा चीनी बच्चियों को अच्छी शिक्षा मिल सकेगी। क्योंकि चीन के गरीबी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के प्रति स्कूल जाना एक आसान बात नहीं है। इस बात ने उन्हें गहरी छाप छोड़ी। वर्ष 2016 में उन्होंने चीन के गरीबी क्षेत्रों में शिक्षा देने का फैसला किया। ताकि वे वहां के बच्चों के लिये अपना योगदान दे सकें। वर्ष 2016 के सितंबर में उन्होंने क्वांगशी ज्वांग स्वायत्त प्रदेश के क्वेईलिन शहर में एक साल की शिक्षा दी। वहां वे चीनी बच्चों को अंग्रेज़ी सीखाते थे। उसी समय उन का चीनी नाम तो खुंग हाओ था। चीन में शिक्षा देने के अनुभव की चर्चा में कोलगेस ने गौरव के साथ कहा,कक्षा में मुझे बच्चों पर खास ध्यान देना पड़ता था कि क्या वे सचमुच ध्यान से मेरी बातों को सुनते हैं या नहीं?हालांकि कुछ बच्चे बहुत शरारती थे, लेकिन मुझे यह काम बहुत पसंद है। मैंने देखा कि बच्चों को हर दिन मेरी कक्षा में कुछ न कुछ नयी जानकारी मिल सकती थी। स्कूल के बाहर अगर मुझे उन से रास्ते पर या दुकान में मिला, तो वे कक्षा में सीखी अंग्रेज़ी से मेरे साथ बातचीत कर सकते थे। यह देखकर मैं बहुत खुश हूं।

वर्ष 2016 के 19 अक्तूबर को फंग लीय्वान ने पेइचिंग के त्याओयूथाई राष्ट्रीय होटल में जर्मन बुर्ग्गीमनासियूम मिडिल स्कूल के अध्यापकों व विद्यार्थियों से भेंट की। कोलगेस उन आमंत्रित विद्यार्थियों में से एक हैं। दो साल के बाद उन्होंने फिर एक बार फंग लीय्वान से मुलाकात की, और फंग को क्वेईलिन में अपने जीवन के बारे में बताया। कोलगेस ने कहा,जब मैं पेइचिंग के त्याओयूथाई राष्ट्रीय होटल में फिर एक बार मैडम फंग से मिला, तो मैंने उनसे बताया कि अब मैं क्वेइलिन में बच्चों को अंग्रेज़ी सिखा रहा हूं। क्योंकि उन का चीनी सपना ऐसा है कि चीन के गरीबी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों, खास तौर पर लड़कियों को अच्छी शिक्षा मिल सकेगी। अब मैं तो इस सपने को पूरा करने के लिये काम कर रहा हूं। यह सुनकर उन्हें बहुत खुशी हुई।

कोलगेस जैसे जर्मन बच्चे कम नहीं है, जो मैडम फंग की बातों से प्रभावित हुए हैं। कोलगेस के सहपाठी एलेक्सेंडर सायेम एल दाहर ने एक्सचेंज छात्र के रूप में खुङमिंग में एक साल पढ़ाई की। मैडम फंग के चीनी सपने और चीन व जर्मनी के युवाओं पर उन द्वारा दिये गये प्रेम व ध्यान ने गहन रूप से एलेक्सेंडर के दिल में छाप छोड़ी। एलेक्सेंडर ने कहा,मैं बहुत प्रभावित हूं। वर्ष 2016 में हमने पेइचिंग की यात्रा की। वहां मैं फिर एक बार मैडम फंग से मिला। मैं उन्हें बताया कि अब मैं खुङमिंग में पढ़ाई कर रहा हूं। उन्होंने मुझे प्रोत्साहन दिया कि तुम हर दिन अच्छी तरह से पढ़ाई करो, और दिन-ब-दिन प्रगति हासिल करो। मुझे लगता है कि मैडम फंग मेरी मां जैसी हैं, और मेरे लिए वे एक अध्यापिका भी हैं।

एलेक्सेंडर के अनुसार चीन में उन के एक साल के जीवन में उन्होंने बहुत चीनी दोस्त बनाये। भविष्य में वे चीन वापस लौटकर उन दोस्तों से मिलेंगे। उन्हें भी आशा है कि विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद वे ऐसी कंपनी में काम करना चाहते हैं, जिस का व्यापार चीन व जर्मनी के बीच होता है। ताकि वे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक व व्यापारिक आदान-प्रदान के लिये अपना योगदान दे सकें।

शेयर