कला के बीज बच्चों के दिल में बोने की जरूरत

2018-04-10 10:17:07
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य्वेएशीथोंग चीन के छिंगताओ शहर में स्थित एक बाल कला संस्था है। अन्य कला संस्थाओं की अपेक्षा य्वेएशीथोंग शिक्षा देने के दौरान बच्चों की सौंदर्य-भावना के प्रशिक्षण पर ज्यादा ध्यान देती है। य्वेएशीथोंग की स्थापक माओ येनशिन के मुताबिक जब बच्चों की सौंदर्य-भावना उचित स्तर पर पहुंच जाए, तो उसी समय कला की तकनीक सीखना उन के लिये ज्यादा आसान होगा। चीन की पुरातन पुस्तक के अनुसार वसंत व शरद ऋतु में शिष्टाचार व संगीत सीखाये जाते थे, और सर्दी व गर्मी के दिनों में कविता व पुस्तक सीखायी जाती थी। माओ येनशिन ने कहा कि य्वेएशीथोंग का नाम तो इस वाक्य से पैदा हुआ। य्वेए का मतलब है संगीत, शी का मतलब है कविता, और थोंग का अर्थ है बाल।

तीन साल पहले माओ येनशिन ने पेइचिंग में प्रथम स्तरीय अध्यापिका का पद, जिस पर उन्होंने आठ साल तक काम किया है, छोड़कर अपने जन्मस्थान में वापस लौटकर नये धंधे खोलना शुरू किया। इस की चर्चा में माओ ने कहा,मेरे प्रति जिन्दगी का एक बड़ा अर्थ आत्म-मूल्य प्राप्त करना है। और मैंने यह महसूस किया कि बच्चों के साथ रहने और उन के बड़े होने के दौरान मदद देने में मुझे खूब सफलता व संतुष्टि मिलती है। छोटे बच्चे चित्र बनाने में कुछ भी नहीं जानते। हमारे यहां आकर वे सब से पहले रंग से जुड़े ज्ञान सीखते हैं, फिर चित्र बनाने की तकनीक। बच्चों को चित्र बनाना सिखाना मुझे बहुत पसंद है।

क्योंकि विश्वविद्यालय में माओ ने बाल शिक्षा सीखी। और उन की मेजर कला विषय है। इस के बाद वे आठ साल तक अध्यापिका बनती थीं। इसलिये माओ को बाल की कला शिक्षा पर खूब अनुभव प्राप्त हैं। उन्होंने देखा कि बाजार में इस विषय का अभाव है, इसलिये अंत में उन्होंने नये धंधे खोलकर अपनी बाल कला संस्था की स्थापना की। इसकी चर्चा में उन्होंने कहा, उस समय छिंगताओ स्थित कला शिक्षा संस्था में केवल परिणाम के लिये शिक्षा दी जाती थी। इसका मतलब है कि सौंदर्यशास्र की दृष्टि से ऐसा चित्र केवल एक चित्र है, पर सुन्दर नहीं है। इसलिये मैंने इस क्षेत्र को चुनकर नया धंधा खोला। हमारी विशेषता यह है कि सौंदर्यबोध के लिये शिक्षा दी जाती है, तकनीक के लिये नहीं।

नया काम शुरू करने के बाद माओ ने छिंगताओ के लाओशान क्षेत्र में एक सौ वर्ग मीटर वाली कक्षा किराये पर ली। शानदार सजावट नहीं है, शुरूआत रस्म भी नहीं है। केवल प्रोत्साहन से माओ ने शिक्षा देना शुरू किया। विद्यार्थी उन्हें अध्यापिका श्याओ माओ कहते थे। क्योंकि ऐसे करके वे छोटे बच्चों से और नजदीक हो सकती हैं। कला शिक्षा के विकास के साथ साथ माओ को कुछ नयी मुश्किलों को मिल गया। उन के अनुसार,मेरे प्रति सब से बड़ा मामला तो एक अध्यापिका से एक उद्यमी व ऑपरेटर बनना है। यानी अपनी भूमिका में बदलाव। हालांकि हम शिक्षा, सौदर्यबोध, व बच्चों के मन समझते हैं, लेकिन हम बाजार को नहीं समझते। बाद में हमें यह पता लगा कि अगर आप बाजार की मांग के अनुसार अच्छी तरह से काम करना चाहते हैं, तो अपने उत्पादों का प्रणालीकरण प्राप्त करना होगा। यानी विभिन्न आयु के बच्चों के लिये विभिन्न प्रणालीबद्ध वाली शिक्षा देते हैं। इसके अलावा विद्यार्थी विभिन्न प्रणालीकरण वाली कक्षा में विभिन्न तरीके की कला शैली सीख सकते हैं। हम केवल एक शैली के लिये सीमित नहीं हैं, हमें आशा है कि बच्चों को रंगारंग सौंदर्य मिल सकते हैं। और भविष्य में उनका शौक क्या होगा?हम उन्हें खुद रास्ता चुनने का मौका देते हैं।

नये धंधे खोलने के रास्ते पर माओ कदम-ब-कदम चलती हैं। उन्होंने अपनी शक्ति संस्था को बड़ा बनाने में नहीं डाली, पर लगातार अपनी कक्षाओं को समृद्ध बनाने में शक्ति लगायी। सामान्य कला कक्षा के अलावा विद्यार्थियों को ज्यादा क्लासिक कलात्मक रचनाओं को देखने का मौका देने के लिये माओ ने सफलता से पाँच बार कला संग्रहालय यात्रा आयोजित की। इस की चर्चा में उन्होंने कहा,मुझे लगता है कि बाल कला में हमें बच्चों को विशाल मौके देने चाहिये, ताकि वे ज्यादा समृद्ध ज्ञान प्राप्त कर सकें। उनसे प्राप्त ज्ञान एक कीफ़ जैसा है। समय के चलते चलते भविष्य में इस कीफ़ के नीचे ज्यादा से ज्यादा छोटे बनती है, यानी ज्ञान ज्यादा विशेष बनता है। मेरे ख्याल से ज्यादा छोटे बच्चों  को ज्यादा विशाल ज्ञान प्राप्त करने का मौका देना चाहिये। इसी विचार-धारा के अनुसार मैंने संग्रहालय की कक्षा चुनी। जब बच्चों का सौंदर्यबोध एक ऊंची स्तर पर पहुंचेगा, तो उसी समय वे आसानी से विशेष तकनीक सीख सकेंगे।

हर बार संग्रहालय यात्रा से पहले माओ अपने आप उन संग्रहालयों का   दौरा करती हैं। उन्होंने ध्यान से बच्चों के लिये उचित प्रदर्शनी को चुना। उन के अनुसार केवल वे अपने विद्यार्थियों को सबसे अच्छी तरह जानती हैं। बहुत कोशिश करने के बाद किसी विज्ञापन के प्रसार-प्रचार के बिना उनके विद्यार्थियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ रही है। आज तक लगभग 150 विद्यार्थी उन की संस्थान में पढ़ रहे हैं। वे सारे शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आए हैं। कुछ विद्यार्थी बहुत दूर रहते हैं, लेकिन वे भी विश्वसनीय अध्यापिका माओ के पीछे दौड़ते हैं। साथ ही य्वेएशीथोंग भी दिन-ब-दिन प्रसिद्ध हो रही है। आसपास के किंडरगार्टन ने भी अध्यापिका माओ को शिक्षा देने का आमंत्रण किया। माओ येनशिन ने कहा कि,किंडरगार्टन ने मुझे स्कूल के अध्यापिकाओं को बाल की कला शिक्षा पर प्रशिक्षण देने का आमंत्रण दिया। मैं एक अध्यापिका से एक उद्यमी फिर एक प्रबंधक बन गयी। अब मैं स्कूलों में वापस लौटकर अध्यापकों के साथ मेरे अनुभव साझा करती हूं। यह मेरे लिये हैसियत व भूमिका में एक बड़ा बदलाव है, और मेरे लिए एक बड़ा प्रोत्साहन भी है।

माओ येनशिन चार साल से अपनी संस्था चलाती हैं। बीते समय और भविष्य की योजना की चर्चा में उन्होंने कहा,पहले मेरा इस काम को शुरू करने का लक्ष्य स्पष्ट नहीं था, मैं केवल बच्चों को शिक्षा देना चाहती हूं। जब विद्यार्थियों की संख्या सौ से ज्यादा हो गयी, तो उस समय मुझे पता लगा कि मेरे कला संस्था का प्रबंध करना चाहिये, और अपना ब्रांड बनाना चाहिये। अब विद्यार्थी ज्यादा हैं, और मेरी ज़िम्मेदारी भी ज्यादा बढ़ चुकी हैं। मैं बच्चों को ज्यादा अच्छे क्लास रूम देना चाहती हूं। ताकि वे बेहतर माहौल में कला सीख सकें। हमारा नया क्लास रूम छिंगताओ शहर के समुद्र तट पर स्थित है। क्षेत्रफल भी दुगुना बढ़ चुका है। जहां का वातावरण बहुत सुहावना है। फ़ौरन इसका प्रयोग किया जाएगा।

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