हर बच्चे को वांगड्राक के बारिश के जूते चाहिये

2018-04-05 15:33:55
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दोस्तो, हाल ही में आयोजित 68वें बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म दिवस पर युवा तिब्बती फ़िल्म निदेशक लहापाल ग्या की पहली फिल्म《वांगड्राक के बारिश के जूते》नयी पीढ़ी की प्रतिस्पर्द्धा इकाई में शामिल की गयी। यह तिब्बती भाषा वाली फ़िल्म इस बार के फ़िल्म दिवस पर कुल चार बार प्रदर्शित की गयी। जिसने कई छोटे व बड़े दर्शकों को आकर्षित किया। बहुत स्थानीय मिडिल व प्राइमरी स्कूलों ने सामूहिक रूप से यह देखी।

यह फ़िल्म लेखक छाएलांग तुङचू की छोटी कहानी《वांगड्राक के बारिश के जूते》से बनायी गयी। कहानी ऐसी है कि तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के एक गांव में रहने वाला एक छोटे लड़के को लगातार तीव्र इच्छा से बारिश के जूते चाहिये। बहुत मुश्किल से यह सपना पूरा करने के बाद वह हर दिन बारिश होने की प्रार्थना करता है। हर बार फ़िल्म प्रदर्शित करने के बाद इस की क्रिएटिव टीम ने दर्शकों के साथ आदान-प्रदान किया। निदेशक लहापाल ने संवाददाता को इन्टरव्यू देते समय कहा कि मुझे बहुत खुशी हुई कि मैंने साइट पर पूछताछ से यह महसूस किया कि लोगों ने मेरी फ़िल्म पर ध्यान दिया और सकारात्मक प्रतिक्रिया की। उन्होंने कहा, यह मेरी पहली फिल्म है। इसलिये इसे प्रतिस्पर्द्धा में शामिल होने से मुझे बड़ा प्रोत्साहन मिला। सभी बच्चों का स्वभाव एक ही तरह का होता है। हालांकि यह कहानी तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की है, और सामान्य बारिश के जूते की कहानी बतायी गयी। लेकिन सभी बच्चे यह कहानी अच्छी तरह से समझ सकते हैं। अभी अभी मैंने मंच पर बच्चों से यह सवाल पूछा कि क्या आप लोगों के पास ऐसा अनुभव है?तो एक जर्मन लड़की ने कहा कि उन्हें हमेशा एक छोटा कुत्ता चाहिये। यह इच्छा बहुत तीव्र है। मुझे लगता है कि वयस्कों को भी ज़रूर ऐसा अनुभव होता है।

दर्शक टीलेरमान ने अपनी सात वर्षीय बेटी के साथ यह फिल्म देखी। उन्होंने संवाददाता से कहा कि हर वर्ष वे बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म दिवस पर जारी फ़िल्मों को देखते हैं। पर इस वर्ष उन्होंने पहली बार बेटी के साथ बाल फिल्म देखी। उन के अनुसार,

टीलेरमान:फिल्म में तुम्हें सब से पसंदीदा भाग कहां लगा?

बेटी:वांगड्राक के पास बहुत अच्छे दोस्त होते हैं। और अंत में उन्हें अपने पसंदीदा बारिश के जूते भी मिलते हैं। मुझे यह बहुत अच्छा लगा।

टीलेरमान:संपूर्ण रूप से कहा जाए, तो बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म दिवस क्यों मुझे आकर्षित कर सकता है?क्योंकि इस दिवस पर मैं ऐसे देशों या क्षेत्रों की फिल्म देख सकता हूं, जो सिनेमा व टीवी में नहीं आती। यह फ़िल्म मुझे बहुत पसंद है। क्योंकि निदेशक ने शांत तरीके से एक कहानी हमें बतायी। फिल्म में दिखाये गये प्राकृतिक दृश्य बहुत सुन्दर हैं। इस फिल्म से मैं अलग संस्कृति व रीति-रिवाज़ों को जान पाया।

पेट्रा काएस्टेर्न बर्लिन की एक प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका हैं। उनके स्कूल के विद्यार्थी हर साल बर्लिन फ़िल्म दिवस की नयी पीढ़ी की प्रतिस्पर्द्धा इकाई में शामिल फ़िल्मों को देखते हैं। क्योंकि इस इकाई में शामिल सभी फ़िल्में बच्चों और युवाओं के लिए बनायी गयीं। उन फिल्मों को देखना स्कूल की एक परंपरा बन गयी। इस वर्ष उन की कक्षा में एक बच्चे की मां ने उन्हें 《वांगड्राक के बारिश के जूते》की सिफ़ारिश की। पेट्रा ने कहा, फिल्म देखने से पहले बच्चों ने इस कहानी का सारांश पढ़ा। यह फ़िल्म वर्तमान में हमारी कक्षा के विषय से मेल खाती है। हाल ही में हमारा ध्यान इस बात पर केंद्रित हुआ है कि विश्व के अन्य देशों के बच्चे कैसी जीवन बिताते हैं?संयोग से हमारी कक्षा में भी एक चीनी विद्यार्थी पढ़ता है, जो डेढ़ साल  पहले हमारी कक्षा में आया है।

पेट्रा की कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थी फ़िल्म देखने के बाद आयोजित इंटरएक्टिव गतिविधि में बहुत सक्रिय थे। उन्होंने रंगारंग सवाल पूछे हैं। उदाहरण के लिये क्या चीनी बच्चे स्कूल से वापस लौटकर बहुत होमवर्क करते हैं?क्या ओलों को हटाने वाले जादूगर सचमुच होते हैं?फ़िल्म का अंत क्यों ओपन तरीके से समाप्त हुआ?क्योंकि सभी लोग वांगड्राक को बारिश में अपने पसंदीदा जूते पहनने को देखना चाहते हैं। फ़िल्म को देखकर प्राप्त अनुभव की चर्चा में बच्चों ने संवाददाता से कहा कि,

लड़का क:मुझे लगता है कि यह एक बहुत अच्छी फ़िल्म है। जब बारिश के जूते न होने के कारण अन्य बच्चों ने वांगड्राक को धब्बा लगाया, तो उसी समय मेरे दिल में दर्द हुआ।

लड़का ख:मेरे ख्याल से इस फ़िल्म का सबसे प्रभावित करने वाला विषय यह है कि वांगड्राक को बारिश के जूते चाहिये होते हैं, और अंत में उसका सपना पूरा हो जाता है।

लड़का ग:मेरे ख्याल से फ़िल्म में सब से उदास विषय यह है कि अन्य बच्चों ने वांगड्राक की हंसी उड़ायी, क्योंकि बारिश के जूते पहनने से उन के पैर बदबूदार हो गये।

लड़की घ:संपूर्ण लिहाज से कहा जाए, तो मुझे यह फ़िल्म पसंद है। लेकिन वांगड्राक के पिता जी ने वांगड्राक को मारा, क्योंकि वह स्कूल नहीं गया। मैं इस पिटाई से नफ़रत करती हूं। मां-बाप को किसी स्थिति में अपने बच्चे को नहीं मारना चाहिये। इसे मैं स्वीकार नहीं कर सकती।

इसके अलावा दर्शकों में कुछ चीनी लोग भी थे, जो जर्मनी में काम करते हैं या रहते हैं। बर्लिन में अध्ययन कर रहे विजिटिंग विद्वान ये य्वेनछून ने अपनी पाँच वर्षीय बेटी के साथ यह फ़िल्म देखी। फ़िल्म देखने के बाद उन्होंने अन्य उत्साहपूर्ण दर्शकों के साथ क्रिएटिव स्टाफ से हस्ताक्षर मांगे। उन के अनुसार, मुझे बहुत खुशी हुई कि हम बर्लिन में चीन से आई फ़िल्म देख सकते हैं। यह एक बहुत गौरव की बात है। आशा है कि भविष्य में ज्यादा से ज्यादा चीनी फ़िल्में बर्लिन फ़िल्म दिवस में दिखाई जाएंगी। 

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