रंगमंच प्रभाव का हल कैसे किया जाए

2017-12-14 18:23:31
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थिएटर में सभी लोग बैठते हुए नाटक देख रहे थे। एक दर्शक ज्यादा स्पष्ट रूप से देखने के लिये खड़े हुए हैं। उसी समय थिएटर में कोई प्रबंधक नहीं थे। फिर इस दर्शक के पीछे बैठते हुए दर्शकों को भी नाटक देखने के लिये खड़े होना पड़ेगा। अंत में थिएटर के सभी दर्शक खड़े होकर नाटक देखते थे। इसे रंगमंच का प्रभाव कहा जाता है। 30 नवंबर की सुबह पेइचिंग में उद्घाटित 16वें राष्ट्रीय बुनियादी शिक्षा मंच यानी वर्ष 2017 चीनी शिक्षा मिंगडे मंच में पेइचिंग सदी मिंगडे के बोर्ड अध्यक्ष वांग श्वेएह्वेई ने भाषण देते समय रंगमंच प्रभाव का उदाहरण लेकर शिक्षा क्षेत्र में एक ध्यानाकर्षक सवाल पेश किया। बच्चों के प्रति ज्यादा से ज्यादा लंबा क्लास टाइम, ज्यादा से ज्यादा अतिरिक्त पाठ्यचर्या कक्षाएं, और ज्यादा से ज्यादा होमवर्क...... ऐसा लगता है कि सभी लोग रंगमंच के प्रभाव में फंस गये हैं। और कोई भी नहीं रुक सकता। वांग श्वेएह्वेई ने बताया कि अभिभावक, विद्यार्थी, शिक्षक व कुलपति सभी को बहुत थकान आती है, और असहाय हैं। पर सभी असंतुलित इंतिज़ाम के नुकसान पहुंचाने वाले होने के साथ इस के शिकार भी बने।

तो शिक्षा के रंगमंच प्रभाव का समाधान कैसे किया जाए?क्या हमें सब से पहले बैठना चाहिये, या थिएटर से चला जाना चाहिये?इस की चर्चा करने के लिये 30 नवंबर से 2 दिसंबर तक चीन के छिंगह्वा यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग ने पेइचिंग सदी मिगडे की सहायता से पेइचिंग में 16वें राष्ट्रीय बुनियादी शिक्षा मंच यानी वर्ष 2017 चीनी शिक्षा मिंगडे मंच आयोजित किया। चीनी राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा की स्थाई कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष, पूर्व शिक्षा मंत्री छन चीली, उप शिक्षा मंत्री, छिंगह्वा यूनिवर्सिटी के पूर्व उप कुलपति चो य्वेनछिंग समेत चीन के विभिन्न क्षेत्रों के शिक्षा विभागों के लगभग चार हजार नेता, मध्य व प्राइमरी स्कूलों के कुलपति व शिक्षक, और प्रसिद्ध विद्वान व लेखक इस मंच में उपस्थित हुए। उन के अलावा अमेरिका, रूस, ब्रिटन, कनाडा, फिनलैंड व जापान आदि देशों तथा चीन के थाइवान क्षेत्र की बुनियादी शिक्षा संभालने वाले अधिकारियों, कुलपतियों, शिक्षकों व प्रबंधकों ने भी इस मंच में भाग लिया। उपस्थितों ने एक साथ नये युग में शिक्षा से जुड़े मामलों का विचार-विमर्श किया।

प्रसिद्ध विद्वान व लेखक ई चोंगथ्येन ने अपनी भाषण में एक उदाहरण बताया। एक अध्यापक ने विद्यार्थियों से यह सवाल पूछा कि क्या तुम लोगों ने अन्य देशों में मौजूद अनाज की कमी की समस्या का विचार किया था? सभी बच्चों ने सिर हिलाया। ऐसा क्यों?क्योंकि अफ़्रीकी बच्चे अनाज को नहीं जानते। यूरोपीय बच्चे कमी को नहीं समझते। अमेरिकी बच्चे अन्य देशों को नहीं जानते। और चीनी बच्चे विचार करने को नहीं जानते। ई चोंगथ्येन ने कहा कि क्यों चीनी बच्चे विचार करने को नहीं समझते?क्योंकि हमारी शिक्षा में विचार-विमर्श करने का प्रेरणा बहुत कम है। विद्यार्थी केवल समाधान का परिणाम जानते हैं, लेकिन समस्या के हल के दौरान तरीके व उपाय नहीं समझते। सभी परीक्षा के लिये एक मानक उत्तर चाहिये, अगर कोई बच्चे का उत्तर अलग हो, तो गलती मानी जाती है। ई चोंगथ्येन के ख्याल से हमें बच्चों को शिक्षा देने के दौरान उन की ऐसी क्षमता को उन्नत करना चाहिये। यानी सवाल खोजने, सवाल पूछने, सवाल का विश्लेषण करने और सवाल का समाधान करने की क्षमता।

चीनी मीडिया विश्वविद्यालय के शिक्षक, सीसीटीवी के पूर्व होस्ट छूए योंगय्वेन ने अपनी भाषण में कहा कि मैं शिक्षकों की मुश्किलों को खूब समझता हूं। एक बार मैंने हनश्वेई मीडिल स्कूल के बारे में एक कार्यक्रम बनाया। मैंने भी इस मीडिल स्कूल का दौरा किया था। इस स्कूल में शिक्षक व बच्चे दोनों कड़ी मेहनत हैं। हालांकि बहुत विद्वान इस स्कूल की कार्रवाई से स्वीकार नहीं करते। लेकिन हनश्वेई मीडिल स्कूल के कुलपति ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि शहर में ऊंची-ऊंची इमारतों व विलाओं में रहने वाले इस बात को नहीं जानते हैं कि हमारे यहां के बच्चे अगर विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं करते, तो वे गांव के बाहर नहीं जा सकेंगे। यह सही है कि इस स्कूल की कार्रवाई बच्चों के शारीरिक व मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य के लिये कुप्रभाव डालती है, लेकिन यह भी सही है कि यहां के विद्यार्थी अगर विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं कर सकते, तो वे शहर में जाकर केवल किसान मजदूर बनकर सरल श्रम कर सकते हैं। इस समस्या का समाधान कैसे किया जाए, किसी के पास जवाब नहीं है। मुझे विश्वास नहीं है कि हर स्कूल के कुलपति अपने विद्यार्थियों की प्रवेश दर पर चिंता न करते। लेकिन क्या हम प्रवेश दर को उन्नत करने के साथ बच्चों के शारीरिक व मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे?जैसे:बच्चों का भविष्य, बच्चों की नज़र व बच्चों की भावना।

छिंगह्वा यूनिवर्सिटी के सामाजिक विज्ञान कॉलेज के प्रधान प्रोफेसर फंग खाईफिंग के ख्याल से सामाजिक विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए, तो शिक्षा में मौजूद रंगमंच प्रभाव एक भीड़ का व्यवहार है। क्योंकि भीड़ में लोग आसानी से सुरक्षा, सुनिश्चितता व संसाधन प्राप्त कर सकते हैं। वह एक आत्मरक्षा की व्यवस्था है। रंगमंच प्रभाव की रोकथाम करने में तीन नीति-नियम होती हैं। पहले, आत्म जागरूकता को मजबूत करना। जब लोगों के पास पर्याप्त आत्मइज्ज़त, तर्कसंगत, शांति व सक्रियता होते हैं, तो वे भीड़ व्यवहार से मुक्त होंगे। जब थिएटर में कोई व्यक्ति खड़ा हुआ है, तो उसी समय तुम्हें इस का विचार करना चाहिये कि क्यों तुम यह देखते हो?क्या तुम सचमुच यह नाटक पसंद करते हो?और क्या अन्य चुनाव हो सकेगा?दूसरे, स्वतंत्र चेतना। तुम बैठकर किताब पढ़ने, विचार करने या लेख लिखने को चुन सकते हो, या तुम भी थिएटर से चला जा सकते हो। तुम्हें तरह तरह चुनाव पैदा करना चाहिये। तीसरे, मेक्रो जागरूकता, यानी अन्य दृष्टि से इस मामले को देखना। अगर सभी लोग खड़े हुए हैं, तो क्या तुम एक और महान कार्य कर सकते हो? जैसे और एक प्रस्तुति का प्रबंध करना या अन्य मैच का आयोजन करना।

इस युग में शिक्षा को सक्रिय मनोविज्ञान चाहिये। सक्रिय मनोविज्ञान में बच्चे सुन्दर भविष्य रचने की क्षमता, आत्म अनुशासन की क्षमता, विश्व की सौंदर्य खोजने की क्षमता, अन्य से आदान-प्रदान करने की क्षमता आदि प्राप्त कर सकते हैं। सक्रिय मनोविज्ञान के अनुसार सुन्दर जीवन के चार मतलब हैं। पहले, प्रेम होना चाहिये। इस में रिश्तेदारों, मित्रों, देश व राष्ट्र आदि के प्रति प्रेम शामिल हैं। दूसरे, खुशी से जीवन बिताना चाहिये। तीसरे, जीवन में मूल्य, योगदान व अन्य की सेवा देनी चाहिये। और चौथे, जिन्दगी में लक्ष्य व अर्थ होना चाहिये। रंगमंच प्रभाव के सामने हमें नागरिकों की जिम्मेदारी उठानी चाहिये। ताकि अनुचित स्थिति को बदला जा सके।

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