तिब्बती पठार पर कूंग थाशी की कहानी

2020-05-19 14:15:57
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तिब्बती पठार पर कूंग थाशी की कहानी बहुत लोकप्रिय है। पचास साल पहले डामश्यूंग काउंटी के घास के मैदान पर एक ऐसा आदमी था जो तिब्बती कोट पहनते, तिब्बती ज़बान बोलते और एक चिकित्सा बॉक्स लेकर इधर उधर चरवाहों और उन के पशुओं का उपचार करते दिखते रहे थे। वहां के चरवाहे प्यार से उन्हें "कूंग थाशी" पुकारते थे। लोगों की आंखों में वह बिल्कुल तिब्बती युवा था, लेकिन वास्तव में वह भीतरी इलाके से गये एक हान जातीय डॉक्टर थे, जो डामश्यूंग काउंटी के पशुचिकित्सा स्टेशन में काम करते थे। उन का हान जातीय नाम था कूंग ता शी।

सन 1950 के दशक में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी के आग्रह के अनुसार बहुत से युवा तकनीशियनों ने तिब्बती पठार पर काम करना शुरू किया। युवा कूंग ता शी भी उनमें से एक था। वह पूर्वी चीन के शांघाई शहर से समुद्र तल से 4,200 मीटर की ऊँचाई पर डामश्यूंग काउंटी के घास के मैदान पर पशु चिकित्सा का काम करने गये। लेकिन शुरू में उनका काम ठीक ठाक से नहीं चल सका। मिसाल के तौर पर यह खबर आयी कि नींगजूंग जिले में बहुत से पशु मर गये थे। खबर सुनने के तुरंत बाद कूंग ता शी चिकित्सा बॉक्स लेकर गांव गये थे। लेकिन चरवाहे इस युवक पर विश्वास नहीं करते थे और उन्हें बीमार पशुओं का इलाज देने से इजाजत नहीं करते थे। दूसरे दिन कूंग ता शी चरवाहे के साथ साथ घास के मैदान पर गये और वहां उन्हों ने अत्यंत बीमार हुए पशुओं का इलाज किया। उन का दवा खाने के बाद बीमार मवेशी फिर से घास मैदान पर दौड़ने लगे। "यह डॉक्टर ठीक है" की खबर बहुत जल्दी से डामश्यूंग काउंटी के घास के मैदान पर चलने लगी थी। इस के बाद बहुत से चरवाहों ने अपने बीमार पशु डॉक्टर कूंग ता शी के वहां ले लिये थे। और कूंग ता शी भी एक एक गांव में जाकर चरवाहों को चिकित्सा सेवा तैयार करने के साथ साथ उन्हें पार्टी और सरकार की नीतियों का प्रसार किया था। इस के बाद स्थानीय चरवाहों ने उन्हें यह तिब्बती नाम थाशी दिया और उन्हें "कूंग थाशी" पुकारना शुरू किया था।

पर कूंग थाशी ने सोचा था कि तिब्बती लोगों की अच्छी तरह सेवा करने के लिए जरूर ही तिब्बती भाषा सीखनी पड़ती थी। इसलिए काम करने के साथ साथ कूंग थाशी ने बहुत मेहनती से तिब्बती भाषा सीखना शुरू किया था। दिन रात अभ्यास करने के माध्यम से कूंग थाशी ने एक साल में ही तिब्बती बोली सीख पायी थी और केवल तीन सालों के भीतर ही उन की तिब्बती भाषा काफी धाराप्रवाह बनने लगी थी।

पूर्व में उन्हों ने जो सीखा था वह पशु चिकित्सा होता था। उन्हों ने आदमी का इलाज करने का प्रशिक्षण नहीं ले लिया था। लेकिन घास के मैदान पर चरवाहे अकसर मरीज़ से ग्रस्त रहते थे। चरवाहों ने भी अकसर उन के पास जाकर इलाज लेने की मांग की थी। चरवाहों की सेवा करने के लिए कूंग थाशी अकसर अपने अवकाश के समय में काउंटी अस्पताल में आधुनिक चिकित्सा और एक्यूपंक्चर सहित पारंपरिक चिकित्सा सीखने गये थे। उन्हों ने बहुत सारी मेडिकल किताबें पढ़ी थीं। बाद में उन्हों ने चरवाहों के लिए चिकित्सा सेवा करना शुरू किया था और और घास के मैदान पर गठिया और जठरांत्र की बीमारियों के उपचार में उनका कौशल बहुत मशहूर माना जाता था।

कूंग थाशी की श्रेष्ठ कार्यों की व्यापक प्रशंसा की गयी थी। पार्टी और सरकार ने भी उन्हें उच्च गौरव सौंप दिया। सन 1970 के दशक में उन्हें डामश्यूंग काउंटी में पार्टी कमेटी का सचिव निर्वाचित किया गया और सन 1980 में उन्हें तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के पशुपालन विभाग के उप प्रधान नियुक्त किया गया। सन 1985 के दिसंबर में उन्हें स्वायत्त प्रदेश के उपाध्यक्ष निर्वाचित किये गये। रिटायरमेंट होने के बाद वे अपनी जन्मभूमि शांघाई शहर नहीं वापस जा सके। क्योंकि उन का दिमाग और शरीर दोनों तिब्बती जैसा बन गया है। कूंग थाशी तिब्बत इस पवित्र पठार से हमेशा से नहीं छोड़ सकेंगे। अपनी आप-बीती की याद करते हुए कूंग थाशी ने कहा कि सन 1959 में जब वे पहली बार तिब्बत गये थे, तब ल्हासा एक बहुत पिछड़ा हुआ छोटा नगर था। लेकिन आज वह एक बहुत आधुनिक शहर बना है। तिब्बत में सभी ऐतिहासिक सवालों का समाधान आर्थिक और सामाजिक विकास के जरिये ही किया जा सकेगा। सन 1990 से केंद्र ने पूरी शक्ति से तिब्बत के विकास की सहायता दी। तिब्बत में लोगों को भी महसूस हुआ कि विकास सब कुछ का आधार ही है। तिब्बत का अपना समृद्ध संसाधन है जिस के प्रयोग से आर्थिक विकास का लक्ष्य साकार हो सकेगा। कूंग थाशी आठ सालों के लिए स्वायत्त प्रदेश की सरकार के उपाध्यक्ष का पद संभाला था। इसी दौरान उन्हों ने तिब्बत की लगभग सभी काउंटियों का दौरा किया था। उन की दृष्टि में मौजूदा संसाधनों का उचित विकास करने और वैज्ञानिक उपयोग करने से तिब्बत के सतत विकास का उज्जवल भविष्य साबित हो जाएगा।

डामश्यूंग काउंटी का संक्षिप्त परिचय

डामश्यूंग काउंटी तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के मध्यम भाग में स्थित है जिसका क्षेत्रफल लगभग दस हजार वर्ग किलोमीटर विशाल होता है और जनसंख्या केवल चालीस हजार होती है। निवासियों में तिब्बती के अलावा ह्वेई, मंगोलियाई और हान जातीय लोग भी हैं।

चीन के प्राचील काल में युवान राजवंश के दौरान डामश्यूंग का शासन किया गया था। सन 1751 में छींग राजवंश के दौरान इस क्षेत्र का शासन केंद्र सरकार के तिब्बत स्थित मंत्री के अधीन रखा गया था। सन 1956 में डामश्यूंग को ल्हासा शहर के शासन में रखा गया और सन 1959 में डामश्यूंग की अपनी काउंटी सरकार स्थापित हुई। डामश्यूंग काउंटी की औसत ऊंचाई 4200 मीटर होती है। तीस प्रतिशत क्षेत्रफल घास के मैदान है। झीलों और नदियों का समृद्ध संसाधन मौजूद है और मशहूर नाम्मू झील में जल भंडारण 22.8 अरब क्यूबिक मीटर जा पहुंचता है। सन 1980 में डामश्यूंग काउंटी में प्रथम जियोथर्मल पावर स्टेशन यानी यांग-पा-चिंग पावर स्टेशन का निर्माण किया गया। आज इस की वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता सौ मिलियन किलोवाट जा पहुंची है जहां से राजधानी ल्हासा को भी बिजली की आपूर्ति हो रही है।

डामश्यूंग काउंटी के अपनी सेवा कारोबार स्थापित हैं। पर पर्यटन इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण उद्योग माना जाता है। शिक्षा के विकास को विशेष महत्व दिया जाता है। सरकार के 20 प्रतिशत खर्च शिक्षा के विकास में रखा जाता है। सभी गरीब परिवारों के छात्रों को वित्तीय सहायता मिलती है। बच्चों की प्राइमरी और मिडिल स्कूल के लिए नामांकन दर 99%, हाई स्कल के लिए 56.5% तक जा पहुंची है।

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