यान-आन जातीय कालेज में तिब्बती छात्र

2020-05-13 11:18:54
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चीन की राजधानी पेइचिंग में स्थित केंद्रीय जातीय विश्वविद्यालय को लाल जीन और गौरवशाली मिशन प्राप्त है। पार्टी और सरकार हमेशा इसे महत्व देती हैं। इस का पूर्ववर्ती यान-आन जातीय कालेज ही है। आज चीन के केंद्रीय जातीय विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों में तिब्बती छात्र भी शामिल हैं।

क्रांतिकारी युद्ध के काल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी और अध्यक्ष माऔ त्से तुंग ने क्रांतिकारी स्थिति के विकास की जरूरतों के अनुसार यान-आन जातीय कालेज की स्थापना की थी। अध्यक्ष माऔ ने बड़ी मात्रा के अल्प जातीय कम्युनिस्ट लीडर को प्रशिक्षित करने का आग्रह किया। यही था यान-आन जातीय कालेज का मिशन। क्रांतिकारी कार्य और चीनी राष्ट्र की मुक्ति की आवश्यकता के अनुसार यान-आन जातीय कालेज की स्थापना की गयी थी। पार्टी की केंद्रीय कमेटी का मानना था कि अल्पसंख्यक जातीयों के विकास और मुक्ति के बिना चीनी राष्ट्र की मुक्ति भी नहीं हो सकेगी। इसी उद्देश्य में यान-आन जातीय कालेज स्थापित किया गया था। क्योंकि अल्पसंख्यक जातीयों की मुक्ति के लिए इन जातीयों के स्वयं के लीडरों को प्रशिक्षित करना होगा। इसलिए चीनी क्रांति के तीर्थस्थल यान-आन में मौजूद "केंद्रीय पार्टी स्कूल के अल्पसंख्यक जातीय वर्ग", "उत्तरी शानक्सी कॉलेज के जातीय विभाग" तथा “जापानी आक्रमण विरोधी सैन्य और राजनीतिक विश्वविद्यालय के जातीय वर्ग" के आधार पर यान-आन अल्पसंख्यक जातीय कालेज़ की स्थापना की गयी थी।

अमेरिकी लेखक एडगर स्नो ने अपनी किताब रेड स्टार ऑवर चाइना यह लिखता था कि रेड आर्मी ने तिब्बती बहुल क्षेत्रों में से गुजरते हुए स्थानीय लोगों के साथ मित्रता स्थापित की थी और उन लोगों में कुछ तिब्बती युवाओं ने रेड आर्मी में हिस्सा लिया था। मुक्ति के बाद तिब्बती जातीय लेखक च्यांगप्यैन गात्से ने अपनी किताब में भी लिखा कि तिब्बती जातीय सैनिकों ने रेड आर्मी के साथ मशहूर लांग मार्च समाप्त किया और उनमें कुछ ने यान-आन में स्थापित "केंद्रीय पार्टी स्कूल के अल्पसंख्यक जातीय वर्ग" में भाग लिया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता माऔ त्से तुंग, चाऊ एन लाई और जू ड आदि भी अकसर पार्टी स्कूल में अध्ययन करने जाते थे। एक दिन अध्यक्ष माऔ ने पार्टी स्कूल में छात्रों को व्याख्यान दिया और इस स्कूल के तिब्बती छात्र संजय रेशी के साथ बातचीत की। अध्यक्ष माऔ ने छात्रों को बताया कि आप सब लोग हमारी पार्टी और रेड आर्मी की मूल्यवान संपत्ति हैं। तिब्बती लोगों ने हमारे लांग मार्च की विजय के लिए भारी योगदान दिया था। इस के बाद अध्यक्ष माऔ ने संजय रेशी को एक हान जातीय नाम थिएनपाओ दिया। दूसरी तिब्बती सिपाही थासी वांगशू ने बुजुर्ग नेता कामरेड ह लूंग के समझाने बुझाने में पार्टी स्कूल में पढ़ने गये थे। कामरेड ह लूंग ने थाशी को बताया कि पार्टी की केंद्रीय कमेटी अल्पसंख्यक जातीय लीडर के प्रशिक्षण को बहुत महत्व देती है। क्योंकि क्रांति की विजय होने के बाद हमें बहुत से अल्पसंख्यक जातीय कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होगी। थासी वांगशू ने याद करते हुए कहा कि यान-आन के पार्टी स्कूल में कुल आठ तिब्बती छात्र पढ़ते थे। स्कूल के अल्पसंख्यक जातीय वर्ग में तिब्बती के अलावा मंगोलिया और ई, ह्वेई आदि अल्पजातीयों के छात्र भी थे। विभिन्न अल्पसंख्यक जातीयों के छात्र सौहार्दपूर्ण रूप से साथ साथ पढ़ते और जीवन बिताथे थे। सन 1941 के सितंबर में यान-आन जातीय कालेज की स्थापना हुई। जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा स्थापित प्रथम अल्पसंख्यक जातीय कार्यकर्ता स्कूल था। अध्यक्ष माऔ त्से तुंग ने कॉलेज के लिए "एकता" शिलालेख लिखा। नये चीन की स्थापना से पहले इस स्कूल में सैकड़ों अल्पसंख्यक जातीय कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण किया गया था। छात्रों ने अपने स्कूल में अकसर यह गाना गाये थे,


"हम भिन्न भिन्न जातीयों के बेटे हैं,

हम चीन के सच्चे स्वामी हैं।

हान, मान, मंगोलियाई, ह्वेई, तिब्बती, मियाओ और ई,

संयुक्त रूप से संघर्ष करें।

साथियों, आइए हाथ मिलाएँ,

राष्ट्रीय क्रांति के बैनर को बुलंद उठाएं,

समानता, खुशी और एकता के नए चीन की ओर अभियान करें।"


उस समय यान-यान में सामानों की आपूर्ति बहुत कठिन हुई थी। लेकिन पार्टी स्कूल में अल्पसंख्यक जातीय छात्रों को विशेष ध्यान रखा गया था। छात्रों को अधिक आटा, कपड़ा और कोट आदि की सप्लाई देती थी। उन के त्योहार भी अल्पसंख्यक जातीय रीति-रिवाज के अनुसार मनाए जाते थे। पार्टी की केंद्रीय कमेटी ने अल्पसंख्यक जातीय छात्रों को यान-आन में अध्ययन करने के लिए यथासंभव शर्तें तैयार की थीं।

सन 1949 में नये चीन की स्थापना के बाद अध्यक्ष माऔ त्से तुंग के आदेश के मुताबिक केंद्रीय जातीय कालेज यानी इस के बाद के केंद्रीय जातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। केंद्र के राजकीय नेताओं ने वहां पढ़ने वाले तिब्बती छात्रों को भी बहुत ध्यान दिया है। उदाहरण के लिए सन 1956 के मई में केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने खुद केंद्रीय जातीय कालेज यानी आज के केंद्रीय जातीय विश्वविद्यालय का दौरा किया और विशेष रूप से वहां पढ़ने वाले तिब्बती छात्रों को देखा। उन्होंने ध्यान से छात्रों के शिक्षण भवन, छात्रावास, पुस्तकालय, चिकित्सा कार्यालय और मनोरंजन व खेल स्थलों का निरीक्षण किया। और छात्रों से अपने अध्ययन और जीवन की स्थितियों के बारे में सवाल पूछे। प्रधानमंत्री ने स्थानीय नेताओं से छात्रों के स्वास्थ्य को विशेष रूप से ध्यान देने और दवा तैयार करने की मांग की। और दूसरे दिन ही चिकित्सा मंत्रालय के डॉक्टरों ने कालेज में जाकर तिब्बती छात्रों की शरीरिक जांच की और उन्हें पठार की बीमारी को रोकने वाले दवा दिये। छात्रों ने भी पार्टी के आदेश के मुताबिक मेहनत से अध्ययन किया और स्नातक होने के बाद देश के विभिन्न क्षेत्रों में जीजान से काम किया। चीनी केंद्रीय जातीय विश्वविद्यालय में से स्नातक होने वाले बड़ी मात्रा के अल्पसंख्यक जातीय कार्यकर्ताओं ने देश के विभिन्न अल्पसंख्यक जातीय क्षेत्रों में महत्वपूर्ण पद संभाले हैं और देश के आर्थिक विकास में भारी योगदान पेश किया है।

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