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तिब्बती पठार पर झीलों का निरंतर विस्तार जारी

2020-01-28 18:33:53
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चीन के वैज्ञानिकों ने बीते पचास सालों के लिए सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग डेटा का विश्लेषण करने से यह पता लगाया कि छींगहाई-तिब्बत पठार पर झीलों का निरंतर विस्तार किया जा रहा है। 1 वर्ग किलोमीटर से बड़ी झीलों की संख्या 1970 के दशक में 1080 से बढ़कर 2018 में 1424 तक पहुंच गयी है। झीलों का क्षेत्रफल चालीस हजार से बढ़कर पचास हजार वर्ग किलोमीटर तक विस्तृत हो गया है। और वैज्ञानिकों के मुताबिक तिब्बती पठार पर झीलों का विस्तार जारी रहेगा। वैज्ञानिकों ने चीनी तिब्बती पठार वैज्ञानिक डेटा केंद्र में अपना निष्कर्ष प्रकाशित और साझा किया है। तिब्बती पठार पर झीलों का विस्तार जलवायु, जल संसाधन, पारिस्थितिक परिवर्तन और राष्ट्रीय पठारी पार्क के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।

चीनी विज्ञान अकादमी के तहत छींगहाई-तिब्बत पठार अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ता चांग क्वो छींग ने बताया कि झील केवल महत्वपूर्ण जल संसाधन नहीं, बल्कि जल चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। तिब्बती पठार पर झीलों का विस्तार जलवायु का गर्म और आर्द्र बदलने का परीणाम है। वैज्ञानिकों ने बीते पचास सालों में सैटेलाइट अवलोकन डेटा के मुताबिक तिब्बती पठार पर 1 वर्ग किलोमीटर से बड़ी सभी झीलों का विश्लेषण किया। और यह पता लगाया कि तिब्बती पठार पर झीलों का बड़ी तेज़ी से विस्तार हुआ है और होता रहेगा। उनमें सलीन झील वर्ष 2001 से नामू झील का स्थान लेकर तिब्बत में सबसे बड़ी झील बन गयी है। बीते चालीस सालों में सलीन झील के क्षेत्रफल में 46 प्रतिशत बढ़ा है। चांग ने बताया कि तिब्बती पठार पर झीलों का परिवर्तन जटिल है। सन 1970 से 1995 तक इन झीलों की स्थिति सिकुड़ी हुई थी। लेकिन वर्ष 1995 के बाद तमाम छींगहाई-तिब्बत पठार पर झीलों का क्षेत्रफल लगातार बढ़ता रहा। और इन झीलों के क्षेत्रफल में जो परिवर्तन हुआ, वह वर्षा के परिवर्तन के अनुरूप है। पूर्वानुमान है कि यह रुझान वर्ष 2035 तक जारी रहने की संभावना है। दूसरी तरफ झीलों पर ग्लेशियर के परिवर्तन का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। लेकिन इसी संदर्भ में काफी अनुसंधान नहीं किया गया है। भविष्य में चीनी विज्ञान अकादमी रिमोट सेंसिंग से झील के परिवर्तन और पानी संतुलन के बीच संबंधों का आगे अनुसंधान करेगा।

ल्हासा शहर के उत्तर लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर नामू झील प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र स्थित है। तिब्बती भाषा में इस झील का नाम है नामत्सो। त्सो का मतलब है झील। नामू झील की ऊंचाई समुद्र तल से 4718 मीटर है। झील के पास विशाल घास के मैदान और ऊंचे ऊंचे पर्वत है। यहां वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए प्राकृतिक प्रयोगशाला माना जाता है और झील के पास चीनी विज्ञान अकादमी का व्यापक अवलोकन और अनुसंधानशाला रखा हुआ है। अनुसंधानशाले के प्रधान वांग च्वन पो ने कहा कि 19 अगस्त, 2017 को द्वितीय छींगहाई-तिब्बत पठार वैज्ञानिक सर्वेक्षण ल्हासा शहर में शुरू हुआ। इस वैज्ञानिक अभियान का उद्देश्य पिछले 50 वर्षों में मानव समाज के प्रति तिब्बती पठार पर हुए पर्यावरण परिवर्तन और इसके प्रभाव का अध्ययन करना है। क्योंकि छींगहाई-तिब्बत पठार के पर्यावरण और जलवायु के परिवर्तन से पूरे देश और आसपास क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ेगा। छींगहाई-तिब्बत पठार पर सबसे व्यापक ग्लेशियर वितरित हैं। एशिया में कई महा नदियाँ जैसे यांग्त्ज़ी नदी, पीली नदी और यालुजांबू नदी की उत्पत्ति भी यहाँ होती है, और इस क्षेत्र का उपनाम है "एशियन वॉटर टॉवर"। वांग च्वन पो ने कहा कि छींहगाई-तिब्बत पठार पर ग्लेशियर, झीलें और नदियाँ मिलकर "एशियन वॉटर टॉवर" बना है। ग्लेशियर, झीलों और नदियों की मात्रा को अलग-अलग मापने से "एशियन वॉटर टॉवर" में पानी की कुल मात्रा का मूल्यांकन किया जा सकेगा।

नामू झील अनुसंधान स्टेशन का एक दूसरा काम है झील के नीचे तल पर जमा तलछट इकट्ठा करना। ताकि नामत्सो क्षेत्र में बीते एक दो लाख वर्षों में जलवायु परिवर्तन का विश्लेषण करें। अनुसंधान कर्मियों के लिए यह काम काफी मुश्किल है। उन्हें दिन भर झील में काम करने में प्रयत्न करना पड़ता है। बीते 50 सालों में छींगहाई-तिब्बत पठार ग्लोबल वार्मिंग की पृष्ठभूमि में एक ऐसा क्षेत्र बना है जहां की पर्यावरणीय अनिश्चितता सबसे बड़ी है। यहां के पर्यावरण परिवर्तन से बेल्ट एंड रोड से जुड़े बीसेक देशों और तीन अरब लोगों पर भारी प्रभाव पड़ेगा। इधर के वर्षों में छींगहाई-तिब्बत पठार गर्म और गीला बनता जा रहा है। और इस के तापमान की वृद्धि दर वैश्विक औसत की दोगुनी है। तापमान और पानी अधिक होने से "एशियन वॉटर टॉवर" असंतुलित हो गई है और इसके साथ ही लगातार नई आपदाएँ भी सामने आ रही हैं। वांग च्वन पो ने कहा कि आम तौर पर तिब्बत के उत्तर में अधिकांश झीलों का विस्तार नजर आ रहा है। और इन का कारण मुख्य रूप से वर्षा ही है। लेकिन तिब्बत के दक्षिण में स्थितियां अलग हैं। सरकार झीलों के परिवर्तन को महत्व देती है। क्योंकि यह सवाल आदमी, चारागाह और चराई आदि सब के साथ संबंधित है। बढ़ती झील ने चरागाह पर कब्जा कर लिया और इससे जन जीवन पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन वैज्ञानिक कर्मचारियों की जिम्मेदारी यही है कि तिब्बती पठार पर झील के विस्तार के कारण और जल चक्र की प्रक्रिया की जानकारियां प्राप्त करनी चाहिये। ताकि विश्व में अंतिम शुद्ध भूमि की रक्षा कर सकें।

उधर चीनी विज्ञान अकादमी के छींगहाई-तिब्बत पठार अनुसंधान संस्थान के अनुसंधानकर्मी च्यू चैन टिंग ने कहा कि चीनी वैज्ञानिकों ने तिब्बत के शाननान, नाछू और आली तीन क्षेत्रों में दस प्रमुख झीलों का सर्वेक्षण समाप्त किया है। उनमें यांगझुयोंग झील की गहराई 40 मीटर तक रहती है। दूसरी झीलों में कुछ की गहराई अस्सी मीटर तक जा पहुंचती है। यांगझुयोंग झील, नामू झील और मापांगयूंग झील तिब्बत की तीन पवित्र झीलें कहलाती हैं। और यह पहली बार है कि इन तीन झीलों का पूर्ण रूप से सर्वेक्षण किया गया है। योजना है कि तिब्बत में पचास वर्ग किलोमीटर से बड़ी कुल 100 झीलों का सर्वेक्षण किया जाएगा। अभी तक 28 हजार वर्ग किलोमीटर झील की पानी गहराई और पानी की गुणवत्ता मापने का डेटा प्राप्त किया गया है।

द्वितीय तिब्बती पठार वैज्ञानिक सर्वेक्षण में भारी उपलब्धियां हासिल

द्वितीय छींगहाई-तिब्बत पठार वैज्ञानिक सर्वेक्षण वर्ष 2017 की 19 अगस्त को ल्हासा में शुरू हुआ और चीनी वैज्ञानिकों ने तिब्बती पठार पर जल, पारिस्थितिक वातावरण तथा मानव गतिविधियों का अनुसंधान किया। यह चालीस सालों के बाद छींगहाई-तिब्बत पठार पर किया गया दूसरा एकीकृत सर्वेक्षण है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के उद्घाटन समारोह के समक्ष अपने बधाई संदेश में चीनी वैज्ञानिकों को यह आशा जतायी कि आप एकता से कड़ी मेहनत करने की भावना के मुताबिक छींगहाई - तिब्बत पठार पर संसाधनों और पर्यावरण की क्षमता, आपदा जोखिम और हरित विकास रास्ते जैसे का शोध करेंगे। ताकि विश्व की अंतिम शुद्ध भूमि की रक्षा करने, सुंदर छींगहाई - तिब्बत पठार का निर्माण करने और इस पठार पर रहने वाले सभी लोगों के जीवन को और अधिक खुशहाल बनाने के लिए योगदान पेश कर सकें।

वैज्ञानिक सर्वेक्षण में भाग लेने वाले सभी अनुसंधानकर्मियों ने राष्ट्रपति के संदेश को याद में रखकर असंख्य कठिनाइयों को दूर कर तिब्बती पठार में ग्लेशियर, झील, जल व मौसम विज्ञान, अल्पाइन पारिस्थितिकी और जैव विविधता तथा भूमि संसाधन परिवर्तन का सर्वेक्षण किया। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की सरकार ने भी वैज्ञानिक सर्वेक्षण के कार्यों को महत्व देकर वैज्ञानिकों की सहायता में सर्विस और गारंटी दल गठित किया। तिब्बत के अपने 115 वैज्ञानिकों ने भी वैज्ञानिक सर्वेक्षण में भाग लिया। वैज्ञानिक सर्वेक्षण में कुल साठ से अधिक विशेष दल भी गठित हुए। उनमें ऐसे दल हैं जो चीनी महा नदियों के स्रोत तथा तिब्बती पठार पर बड़ी झीलों के सर्वेक्षण पर महत्व देते हैं। चीनी विज्ञान अकादमी के जल अनुसंधानशाले के शोधकर्ता चेन ई फ़ंग ने कहा कि मैंने बीस साल पहले भी तिब्बत की सलीन झील का दौरा किया। लेकिन आज यह झील बहुत हद तक विस्तृत हो गयी है। सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 1976 से सलीन झील के क्षेत्रफल में 40% का विस्तार हुआ है जिससे इस झील के आसपास 220 वर्ग किलोमीटर विशाल घास के मैदान को पानी के नीचे डूबाया गया है। चीनी विज्ञान अकादमी के अकादमिशयन याओ थैन तुंग ने कहा कि पिछले पचास सालों में छींगहाई-तिब्बत पठार पर एक वर्ग किलोमीटर से बड़ी झीलों की संख्या 1081 से बढ़कर 1236 तक हो गई है। झीलों का कुल क्षेत्रफल 40 हजार वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 47,400 वर्ग किलोमीटर तक हो गया है। तिब्बती पठार पर बहने वाली सभी महा नदियों के प्रवाह में भी स्पष्ट वृद्धि मापी गयी है।

उधर तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में तीस हजार वर्ग किलोमीटर विशाल ग्लेशियर भी फैलते हैं। जो पूरे देश का 48 प्रतिशत भाग रहता है। ग्लेशियर पृथ्वी की जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ग्लेशियर का जो आइस कोर है वह अतीत में पृथ्वी के पर्यावरण के विकास को रिकॉर्ड करता है। आइस कोर के माध्यम से आठ लाख साल पहले प्राकृतिक पर्यावरण के परिवर्तन का पता लगाना संभव है। चीनी विज्ञान अकादमी के अनुसंधानकर्ता शू पाई छींग ने कहा कि आइस कोर के माध्यम से ग्लेशियर की आयु, मोटाई और संरचना आदि का पता लगाया जा सकता है। तिब्बती पठार पर जलवायु के परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है और इस क्षेत्र में पर्यावरणीय परिवर्तन के अध्ययन के लिए डेटा तैयार होता है। वैज्ञानिकों ने अपने सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला है कि पिछले 50 वर्षों में छींगहाई-तिब्बत पठार पर ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 15% और जमे हुए जमीन 16% तक कम हो गया है। उधर जंगल का क्षेत्रफल बढ़ गया है और तिब्बती पठार अधिक से अधिक तौर पर हरा-भरा बन गया है। वर्ष1980 के बाद से तिब्बती पठार पर वनस्पति के विकास में काफी वृद्धि हुई है, लेकिन 2000 के बाद हरियाली का रूझान धीमा बनने लगा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हरियाली की वृद्धि से उच्च ऊंचाई पर स्थानिक प्रजातियों तथा कृषि पारिस्थितिकी के लिए भी संभावित जोखिम जन्म हो सकेगी।

वैज्ञानिक सर्वेक्षण में भाग लिये अनुसंधानकर्ताओं ने बताया कि राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने बधाई संदेश में कहा कि द्वितीय तिब्बती पठार वैज्ञानिक सर्वेक्षण छींगहाई-तिब्बत पठार के सतत विकास, पारिस्थितिक सभ्यता के निर्माण तथा वैश्विक पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। हम जरूर ही राष्ट्रपति के आदेश के मुताबिक पठार के संरक्षण और आर्थिक व सामाजिक विकास के लिए प्रभावी सेवाएं प्रदान करेंगे, और तिब्बत के पर्यावरणीय वातावरण सुनिश्चित करने के लिए योगदान पेश करेंगे।

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