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ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर ल्हासा का संरक्षण

2020-01-13 09:43:17
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तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की राजधानी ल्हासा शहर का 1300 साल पुराना इतिहास है। ल्हासा शहर का समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधन मौजूद है, इन में पोताला पैलेस, नोरबुलिंगका पार्क और जोखांग मंदिर जैसे सुप्रसिद्ध विश्व सांस्कृतिक विरासत हैं। इस सांस्कृतिक शहर का अच्छी तरह संरक्षण करने के लिए ल्हासा शहर की सरकार ने हाल में "ल्हासा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर संरक्षण योजना" जारी की।

ल्हासा शहर का क्षेत्रफल लगभग 29518 वर्ग किलोमीटर है। पर इस का खास नगर छोटा होता है। पुराने नगर लगभग 6.74 वर्ग किलोमीटर विशाल है। सरकार की योजना है कि ल्हासा शहर के पुराने नगर में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासतों का अच्छी तरह संरक्षण किया जाएगा। ताकि इस नगर में ऐतिहासिक संस्कृति के संरक्षण को सामाजिक और आर्थिक विकास के साथ जोड़ा जाए। और ऐतिहासिक नगर के मूल्य और क्षमका को उन्नत किया जाए। संरक्षण योजना के अनुसार ल्हासा शहर में यातायात सुविधा में सुधार लाया जाएगा, जनसंख्या का संरचनात्मक समायोजन किया जाएगा, तथा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संसाधनों का एकीकृत उपयोग किया जाएगा। "ल्हासा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर संरक्षण योजना" के प्रकाशन से ल्हासा इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर के प्रबंधन में सुधार लाया जाएगा औरल्हासा शहर संरक्षण के लिए मार्गदर्शन भी तैयार है। योजना के मुताबिक ल्हासा पुराने नगर के बाहर 35.3 वर्ग किलोमीटर विशाल पर्यावरण समन्वय क्षेत्र स्थापित किया जाएगा, ताकि ऐतिहासिक जिले के एकीकृत संरक्षण की गारंटी की जाए। सरकार की योजना में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि ल्हासा नगर में पुरानी इमारतों को विध्वंस करना और आधुनिक मकानों का निर्माण करना मना है, पारंपरिक स्टाइल और परिदृश्य को बनाये रखना है, और इमारतों की शैली और ऊंचाई को भी कड़ाई से नियंत्रित करना है। ताकि सांस्कृतिक इकाइयों, अचल सांस्कृतिक अवशेषों और ऐतिहासिक इमारतों का अच्छी तरह संरक्षण किया जाए।

ल्हासा शहर में पोटला पैलेस, बारखोर स्ट्रीट, नोरबुलिंगका पार्क, जोखांग मंदिर और रामोछे गॉनबा आदि अनेक सांस्कृतिक अवशेष हैं। "संरक्षण योजना" के मुताबिक ऐतिहासिक सड़कों की चौड़ाई को बहाल करना चाहिये और इन्हें अधिक चौड़ा या संकुचित करना भी मना है। सड़कों के दोनों किनारों पर निर्मित नई इमारतों की ऊंचाई पारंपरिक स्टाइल के अनुरूप होनी चाहिए। और नई इमारतों को आसपास की ऐतिहासिक विशेषताओं के साथ तालमेल बिठाना चाहिये। नयी इमारतों की ऊंचाई 15 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिये और जो ऐतिहासिक स्टाइल को नष्ट करते हैं, इन्हें पुनःनिर्माण किया जाना चाहिये। ल्हासा शहर में बहुत से सार्वजनिक सेवा उपकरण और संस्थान मौजूद हैं, वहां हद से ज्यादा स्थायी जनसंख्या और अस्थायी जनसंख्या होने से विरासतों के संरक्षण पर प्रभाव पड़ता है। योजनानुसार पुराने नगर में थोक बाजार, प्रशासनिक क्षेत्र और औद्योगिक व भंडारण क्षेत्रों को बाहर चलाया जाएगा और पुराने नगर में जनसंख्या और इमारतों की मात्रा को भी नियंत्रित किया जाएगा। अंत में बारखोर स्ट्रीट में जनसंख्या को 310 लोग प्रति हैक्टर से 280 तक कम किया जाएगा, और ऐतिहासिक जिले में 250 से 200 तक कम किया जाएगा। साथ ही ऐतिहासिक शैली को बनाए रखने और सांस्कृतिक मूल्य को नष्ट न करने की शर्तों पर उन क्षतिग्रस्त और जर्जर ऐतिहासिक इमारतों की मरम्मत की जाएगी। इसी के आधार पर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जिलों में सेवा की सुविधाओं में सुधार लाया जाएगा ताकि वहां पर निवासियों की खुशी, उपलब्धी और सुरक्षा की भावना को बढ़ाया जाए।


तिब्बत में प्राचीन पुस्तकों का डिजिटल संरक्षण

तिब्बत स्वायत स्वायत्त प्रदेश की सरकार से प्राप्त खबर के अनुसार वर्ष 2019 से पोताला पैलेस में संरक्षित प्राचीन पुस्तकों का डिजिटल तकनीक से संरक्षण करने के लिए तीस करोड़ युआन की पूंजी डाली जाएगी। पोताला पैलेस चीनी हान, तिब्बती, मान, मंगोलिया और भारत की संस्कृति जैसी अनेक भाषीय प्राचीन पुस्तकें संरक्षित की गयी हैं। इन प्राचीन पुस्तकों की संख्या चालीस हजार तक जा पहुंची है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक के प्रयोग से सांस्कृतिक विरासतों का दीर्घकालिक संरक्षण करने के लिए मददगार है। पोताला पैलेस में संरक्षित प्राचीन पुस्तकों में धार्मिक ग्रंथ के अलावा चिकित्सा पद्धति, इतिहास और नाटक आदि भी शामिल हैं। हाल ही में उत्तर पूर्वी चीन के फूशिन शहर में आयोजित तिब्बती प्राचीन पुस्तक अनुसंधान मंच में प्राप्त खबर है कि तिब्बती प्राचीन पुस्तकें राष्ट्र की पारंपरिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। तिब्बती प्राचीन पुस्तकों के अनुसंधान में देश के विभिन्न पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, मंदिरों और लोक संग्राहकों जैसे संस्थानों के बीच आदान-प्रदान को बढ़ाया जाएगा। क्योंकि तिब्बती प्राचीन पुस्तकें सिर्फ तिब्बत में नहीं, बल्कि देश के दूसरे क्षेत्रों के पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों में भी संरक्षित हैं। मिसाल के तौर पर फूशिन शहर में भी चार हजार तिब्बती प्राचीन पुस्तकें संरक्षित हैं। जो चिकित्सा, खगोल विज्ञान और पंचांग आदि से संबंधित हैं। उत्तर पूर्वी चीन स्थित फूशिन शहर को तिब्बती बौद्ध संस्कृति के प्रसार का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। पेइचिंग में स्थित राष्ट्रीय पुस्तकालय में कुल तीन हजार प्रकार की तिब्बती प्राचीन पुस्तकें संरक्षित हैं। इन पुस्तकों को लगातार तापमान एवं आर्द्रता और अग्निशमन शर्तों के वातावरण में संरक्षित किया जा रहा है। हाल के वर्षों में राष्ट्रीय पुस्तकालय ने इन के डिजिटल संरक्षण के लिए जनशक्ति और संसाधनों का निवेश किया है और इस तरह अनुसंधान के लिए पूरी शर्तें तैयार की गयी हैं। और मंच में यह भी चर्चित है कि इतिहास में चीनी हान जातीय साधुओं ने भी कुछ बौद्ध धर्म के ग्रंथ बनाये थे। इन ग्रंथों का तिब्बती भाषा में भी अनुवाद किया गया था। तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुसंधान में यह भी एक विषय बना है। उधर मंच में कानसू प्रांत और भीतरी मंगोलिया प्रदेश से गये प्रतिनिधियों ने भी अपने यहां संरक्षित तिब्बती प्राचीन पुस्तकों के अनुसंधान पर रिपोर्ट पेश की। उन्होंने यह सुझाव भी पेश किया कि संरक्षण और अनुसंधान के आधार पर इन प्राचीन पुस्तकों का प्रयोग किया जाना चाहिये।

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