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इतिहास का सिंहावलोकन --- तिब्बत की ओर जन मुक्ति सेना का अभियान

2019-08-08 13:55:07
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तिब्बत प्राचीन काल से ही चीन का अखंडनीय भाग होता रहा है। सन 1949 में नये चीन की स्थापना के बाद देश के अधिकांश भागों की मुक्ति संपन्न हो चुकी थी। पर तिब्बत केंद्र शासन के बाहर रहा था। चीनी कम्मुनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी और अध्यक्ष माऔ त्से तुंग ने विश्व और देश की स्थितियों का समीक्षा करने के बाद तिब्बत की मुक्ति करने का फैसला कर लिया।

सन 1949 की 4 फरवरी को अध्यक्ष माऔ ने हपेइ प्रांत के शिपाईपो में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय पोलिट ब्यूरो के प्रतिनिधि से भेंट के दौरान कहा कि तिब्बत सवाल का समाधान करना कोई कठिन काम नहीं है। लेकिन इसमें धैर्य की आवश्यकता भी चाहिये। क्योंकि तिब्बत जाने के लिए यातायात की विशेष कठिनाइयां मौजूद हैं और हमें अल्पसंख्यक जाति और उन के धर्म के सवालों पर विचार करना पड़ता है। उसी वर्ष की 6 अगस्त को अध्यक्ष माऔ ने चीनी जन मुक्ति सेना के वरिष्ठ नेता जनरल फंग त ह्वाई के समक्ष एक पत्र में बताया कि पंचन लामा लैनचाओ शहर में आ पहुंचे हैं। इस शहर में सैनिक कार्यवाही करते समय जरूर ही पंचन लामा के संरक्षण पर ध्यान देना चाहिये ताकि तिब्बत सवाल के समाधान की तैयारी की जाए। एक महीने के बाद चीनी जन मुक्ति सेना के जनरल कमांडर जू त ने चीनी जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन में दावा दिया कि चीनी राष्ट्र के पुनरेकीकरण में तिब्बत की मुक्ति होना अनिवार्य है।

सन 1949 की 1 अक्तूबर को चीन लोक गणराज्य की स्थापना घोषित की गयी। चीनी जन मुक्ति सेना के कमान ने सभी सैनिकों को आदेश दिया कि देश में सभी क्षेत्रों की मुक्ति की जाएगी। 13 अक्तूबर को अध्यक्ष माऔ ने तिब्बत की ओर अभियान करने वाले सैनिकों का विन्यास किया। इससे पहले चीन के उत्तर पश्चिमी भाग के छींगहाई और शिनच्यांग आदि प्रदेशों को मुक्त कराया गया था। इसलिए अध्यक्ष माऔ ने उत्तर पश्चिमी दिशा से तिब्बत की ओर अभियान करने का फैसला लिया। लेकिन यातायात की स्थितियां अत्यंत मुश्किल थीं। उत्तर पश्चिम से तिब्बत की ओर मार्चिंग करने के लिए कम से कम दो सालों की तैयारियां करनी पड़ती थीं। संबंधित रिपोर्ट पढ़ने के बाद केंद्रीय कमेटी और अध्यक्ष माऔ ने तिब्बत की मुक्ति करने का मिशन दक्षिण पश्चिमी भाग में तैनात मुक्ति सेना को सौंप दिया। उन्होंने स्थानीय नेताओं के समक्ष समर्पित अपने एक पत्र में कहा कि तिब्बत का महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हमें इस की मुक्ति करना और इसे जन लोकतंत्रिक क्षेत्र बनाना चाहिये। तिब्बत की ओर मार्चिंग करना हमारी पार्टी और हमारी सेना के लिए गौरवान्वित मिशन है। और सैनिक कार्यवाहियों की स्पीड में तेज़ी लानी चाहिये।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के दक्षिण पश्चिमी ब्यूरो के नेताओं ने गंभीरता से सोच करने के बाद तिब्बत की मुक्ति करने का काम चीनी जन मुक्ति सेना के अधीन नम्बर 18 सेना को सौंप दिया। इस सेना के कमांडर, 36 वर्षीय चांग क्वोह्वा ने चीनी जन मुक्ति सेना और स्थानीय सत्ता में नेतृत्व का काम किया था। देश की मुक्ति करने वाले युद्ध के दौरान उन्होंने बार बार विजय प्राप्त किया था और अद्भुत कारनामा जीता था। नेताओं ने नम्बर 18 सेना को तिब्बत की मुक्ति करने की जिम्मेदारी सौंपने और जनरल चांग क्वो ह्वा को इस सेना के कमांडर नियुक्त करने का फैसला लिया। नम्बर 18 सेना के सभी सैनिकों ने आदेश मिलने के बाद अपनी तैयारियां शुरू कीं। लेकिन केंद्र ने सैनिक अभियान करने से पहले तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति संपन्न करने की भरसक कोशिश की। पार्टी की केंद्रीय कमेटी ने दक्षिण पश्चिमी ब्यूरो को यह बताया कि हमारी सेना की तिब्बत की ओर अभियान करने की योजना अविचल है। पर हमें दलाई लामा के साथ वार्ता के जरिये समाधान करने की हर संभव कोशिश करनी चाहिये। इसी उद्देश्य में पार्टी की केंद्रीय कमेटी और स्थानीय नेतृत्वकारी विभागों ने विभिन्न ढ़ंग से तिब्बत की स्थानीय सत्ता के साथ संपर्क रखने का प्रयास किया। कुछ जीवित बुद्धों ने छींगहाई और गैनत्सी आदि क्षेत्रों से ल्हासा जाकर दलाई लामा को समझाने-बुझाने का काम किया। उन में कुछ देशभक्त जीवित बुद्धों ने अपनी जान भी बलिदान की।

लेकिन तिब्बत की स्थानीय सत्ता ने विदेशी शक्तियों के समर्थन से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की शांतिपूर्ण मुक्ति योजना को अवरुद्ध और अस्वीकृत किया। उन्होंने वार्ता का द्वार बन्द किया और चिनशा नदी के तट पर तथा छांगतु क्षेत्र में सैनिक विन्यास किया ताकि बल के सहारे जन मुक्ति सेना को रोका जाए। इसी स्थिति में चीनी जन मुक्ति सेना ने लड़ाई लड़कर छांगतु में तैनात तिब्बती स्थानीय सशस्त्र बल को भंग दिया। यह चीनी जन मुक्ति सेना द्वारा अपने राष्ट्रीय भूमि की मुक्ति करने का न्यायसंगत कार्यवाही है। लेकिन विदेशी प्रतिक्रियाशील शक्तियों ने इस कार्यवाही को बदनाम किया। तथ्यों से साबित है कि विदेशी प्रतिक्रियाशील बल हमेशा से दुष्टाचार रुख अपनाते थे। साम्राज्यवाद और विदेशी प्रतिक्रियावादियों के समर्थन से तिब्बत की स्थानीय सरकार ने चिनशा नदी के तट तथा छांगतु क्षेत्र में सात हजार सिपाहियों की तैनाती की। लेकिन चीनी जन मुक्ति सेना के सैनिकों ने पार्टी की केंद्रीय कमेटी के आदेश के मुताबिक उत्तर और दक्षिण दोनों दिशा से तिब्बती सेना को घेरा दिया। लड़ाइयां सन 1950 की 6 से 24 अक्तूबर तक चलीं। 19 दिनों की लड़ाइयों के बाद तिब्बती सेना को हराया गया, कुछ सिपाहियों ने आत्मसमर्पण किया और कुछ ने विद्रोह किया। तिब्बत की ओर मार्चिंग करते समय जन मुक्ति सेना ने कड़े अनुशासन का पालन किया और तिब्बती देशबंधुओं ने उनका हार्दिक स्वागत और समर्थन किया। मिसाल के तौर पर नम्बर 18 सेना के सैनिकों ने भूख से ग्रस्त होने के बावजूद स्थानीय किासनों व चरवाहों से अनाज नहीं मांगा। उन्हों ने चांदी डॉलर के माध्यम से स्थानीय लोगों के यहां से खाद्य चीजें खरीदीं। जन मुक्ति सेना के कड़े अनुशासन के मुताबिक स्थानीय किसानों व चरवाहों के यहां से कोई भी संपत्ति निशुल्क तौर पर लेना सख्त मना था।   

यह खबर मिलने के बाद बहुत से तिब्बती लोगों को यह पता लगा कि जन मुक्ति सेना के सैनिक अच्छे आदमी थे। उन्होंने मुक्ति सेना के लिए गाइडिंग किया, भोजन का परिवहन किया, मुक्ति सेना के घायल व बीमार सिपाहियों की देखभाल में काम किया और तिब्बती सैनिकों को आत्मसमर्पण की सलाह दी। छांगतु युद्ध की समाप्ति के बाद जन मुक्ति सेना ने तिब्बती युद्ध कैदियों को चांदी डॉलर और यहां तक घोड़े भी दिये ताकि वे अपनी जन्मभूमि वापस जा सके। उन्होंने आँखों में आँसू बहते हुए कहा कि वे प्रतिक्रियावादी सत्ता के लिए काम कभी नहीं करेंगे। छांगतु में आपे आवांजिन्मे आति स्थानीय तिब्बती नेताओं ने दलाई लामा और ल्हासा की स्थानीय सत्ता को पत्र भेजा और उन्हें मुक्ति सेना के साथ वार्ता करने की सलाह दी। बाद में उन्होंने केंद्र और तिब्बती स्थानीय सत्ता के बीच "17-अनुच्छेद समझौता" के हस्ताक्षरण के लिए भी भारी योगदान पेश किया। सन 1951 की 23 मई को केंद्र सरकार ने तिब्बती स्थानीय सत्ता के साथ तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति के उपायों पर केंद्रीय सरकार और तिब्बती स्थानीय सरकार के बीच समझौते (यानी कि "17-अनुच्छेद समझौता") पर हस्ताक्षर किये। जिससे तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति संपन्न हुई। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चीनी जन मुक्ति सेना ने तिब्बत की देशभक्त लोगों और सूत्रों की मदद में महान विजय जीत ली। इसके बाद तिब्बती स्थानीय सत्ता के नेताओं और भू-दास मालिकों ने विद्रोह किया। जन मुक्ति सेना ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के मुताबिक विद्रोहियों का दमन किया, साम्राज्यवादी ताकतों को खदेड़ दिया और भू-दास की व्यवस्थाओं को भंग किया। तिब्बत में भारी परिवर्तन आया और तिब्बती जनता इतिहास में प्रथम बार अपनी ज़मीन का मालिक बनी। और इधर के वर्षों के प्रयासों से तिब्बती जनता को सुखमय जीवन प्राप्त हो गया है। आज वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में समाजवादी तिब्बत के निर्माण के रास्ते पर आगे बढ़ रही है।


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