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तिब्बत में प्राचीन काल के इतिहास और संस्कृति का अनुसंधान

2019-07-15 19:46:05
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इधर के वर्षों में चीन में तिब्बत अध्ययन एक गर्मागर्म विषय बन गया है। चीन के अनेक विश्वविद्यालयों में या तिब्बती अध्ययन विभाग और विशेष प्रोफेसर तिब्बत के बारे में अनुसंधान कर रहे हैं। चीन के छींगह्वा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शेन वेई रूंग का मानना है कि प्राचीन काल के थांग राजवंश और युआन राजवंश के ऐतिहासिक फ़ाइल में तिब्बत अध्ययन करने के लिए बहुत से मूल्यवान सामग्रियां मौजूद हैं। प्रोफेसर शेन वेई रूंग और उन के दल ने चार वर्षों के प्रयासों से तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के अभिलेखागार में संरक्षित मान जातीय और मंगोलियाई जातीय भाषाओं से लिखित सामग्रियों का संकलन प्रकाशित किया। प्रोफेसर शेन ने कहा कि इन ऐतिहासिक सामग्रियों से प्राचीन काल में तिब्बत और केंद्रीय सत्ता के बीच संबंधों की सच्चाई दिखती रही है। इस संकलन में 1394 दस्तावेज़ शामिल हैं और इन के अनुवाद के शब्दों की मात्रा पाँच लाख तक जा पहुंची है। सामग्रियों का अधिकांश भाग ताजा है।

प्रोफेसर शेन का मानना है कि तिब्बत का अध्ययन करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है इतिहास। तिब्बत के इतिहास के बारे में सबसे अधिक ऐतिहासिक सामग्रियां चीन में ही रहती हैं और उन में हान और तिब्बती जातीय भाषा के सिवा मान जाति और मंगोलियाई जातीय भाषा की सामग्रियां भी शामिल हैं। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के अभिलेखागार में बड़ी मात्रा वाले ऐतिहासिक फ़ाइल संरक्षित हैं, लेकिन अभी तक इन का अनुसंधान करने का कार्य काफी नहीं है। संकलन के प्रकाशन में देश में बहुत से विद्वानों का योगदान भी शामिल है। प्रोफेसर शेन के अनुसार चीनी केंद्रीय जातीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दालीथाबू ने अपने अनुसंधान से यह निषकर्ष निकाला है कि छींग राजवंश के शासन काल में बहुत से मंगोलियाई लोगों ने अपनी आय के अधिकांश भाग का तिब्बत में धार्मिक दान प्रदान में प्रयोग किया था। मंगोलिया और तिब्बत के लोगों के राजनीतिक और धार्मिक संबंध बहुत घनिष्ठ हुए थे। प्रोफेसर दालीथाबू ने चीन के प्रथम ऐतिहासिक अभिलेखागार की सामग्रियों से अपना अनुसंधान किया। उधर तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के अभिलेखागार में संरक्षित मान और मंगोलियाई ऐतिहासिक फ़ाइल का संकलन प्रकाशित होने से अनुसंधान कर्मियों के लिए बड़ी मात्रा की ताजा सामग्रियां तैयार हो गयी हैं। और फ़ाइल संकलन का प्रकाशन फोटोकॉपी के माध्यम से किया जाता है, जिस के तहत कोई टिप्पणी नहीं है। इस का मतलब है कि अनुसंधान कर्मी सच्ची और मूल सामग्रियों के जरिये अपना अध्ययन कर सकते हैं। प्रोफेसर शेन ने कहा कि विदेशी अनुसंधानकर्मियों का कहना है कि केवल युआन राजवंश और छींग राजवंश ने तिब्बत का शासन किया था, पर मींग राजवंश नहीं। यह बिल्कुल गलत है। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के अभिलेखागार में मींग राजवंश के काल में तिब्बत और केंद्रीय सत्ता के बीच आदान प्रदान करने के बहुत से फ़ाइल संरक्षित हैं। जिन के अध्ययन से इतिहास के इस भाग की सफाई की जाएगी। मिसाल के तौर पर तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के अभिलेखागार के प्रधान द्रोकर ने अपने एक आलेख में कहा कि अभिलेखागार में मींग राजवंश के काल के दस हजार अध्यादेश या पत्र आदि संरक्षित हैं। प्रोफेसर शेन ने इन फ़ाइलों का अनुसंधान किया। इन के अनुसंधान यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि मींग राजवंश के शासन काल में केंद्रीय सत्ता और तिब्बत के बीच भी घनिष्ठ संबंध बने हुए थे।

प्रोफेसर शेन ने कहा कि अमेरिका में कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि चीन में अनुसंधानकर्मी सिर्फ चीनी भाषा की सामग्रियों के माध्यम से अपना निष्कर्ष निकालते हैं। लेकिन वास्तव में चीनी अनुसंधानकर्मी बहुभाषीय सामग्रियों के सहारे से अपना अध्ययन करते रहे हैं। और तिब्बती अभिलेखागार में संरक्षित मान और मंगोलियाई ऐतिहासिक फ़ाइल का संकलन प्रकाशित होने से चीनी अनुसंधानकर्मियों के पास और अधिक मूल सामग्रियां प्राप्त हो सकती हैं। प्रोफेसर शेन का मानना है कि ऐतिहासिक सामग्रियों के प्रकाशन से चीन और दूसरे देशों के अनुसंधान कर्मियों को तिब्बती इतिहास की मूल सामग्रियां प्राप्त करने का मौका मिल पाएगा। चीनी विद्वान भी अपने ऐतिहासिक शोध में इन फ़ाइलों का उपयोग कर आवाज़ बोलने का अधिकार कायम कर सकेंगे।


प्रोफेसर शेन वेई रूंग का अनुसंधान

चीन के छींगह्वा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शेन वेई रूंग ने दीर्घकाल तक तिब्बत का अनुसंधान किया। हाल ही में उन्होंने पश्चिमी लोगों में फैली हुई शांग्री-ला भावना के प्रति अपना विचार प्रकट किया।

लगभग बीस साल पहले अमेरिका के अनुसंधान कर्मी डोनाल्ड एस लोपेज़ (Donald S. Lopez) ने अपनी किताब “शांगरी-ला के कैदी” प्रकाशित कर पोस्ट-उपनिवेशवाद का विचार प्रकट किया। इस किताब के प्रकाशन से पश्चिमी लोकमतों में सनसनी पैदा की गयी। इस की प्रशंसा करने के साथ-साथ दूसरे लोगों ने इस का आरोप भी लगाया। प्रोफेसर शेन ने कहा कि शांग्री-ला के कैदी का जो विचार किया गया है, इस के पीछे पश्चिमी लोगों की तिब्बत समझने की पृष्ठभूमि ही है। पिछली शताब्दी में अमेरिका में कुछ विद्वानों ने यूरोप के पीछे चढ़कर तिब्बत का अनुसंधान करना शुरू किया। और उन की दृष्टि भी यूरोपीय विद्वानों की जैसी होती है। सन 1950 के दशक में गाशी वानग्याल नामक एक लामा ने अमेरिका में तिब्बती बौद्ध मंदिर की स्थापना की। इस के बाद कुछ अमेरिकी व्यक्ति इन के पास इकट्ठे हुए। जिनमें शामिल थे रोबर्ट थूरमन (Robert Thurman)और जेफ्री होप्किन्स(Jeffery Hopkins)आदि। उन्हों ने तिब्बती बौद्ध धर्म का अध्ययन कर अमेरिका में धार्मिक प्रसार करना शुरू किया। और उन्होंने अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों में तिब्बती अनुसंधान का आधार रख दिया। उन के छात्र लोपेज़ ने अमेरिका में प्रथम पीढ़ी तिब्बती अनुसंधान कर्मियों की आलोचना की। और अमेरिका में तिब्बती अनुसंधान को एक नये स्तर पर पहुंचाया। सन 1960 और 1970 के दशकों में पश्चिमी विद्वानों ने तिब्बत को देवीकरण की स्थिति पर उन्नत किया। कुछ पश्चिमी व्यक्तियों ने गलतफहमी और कल्पना के आधार पर तिब्बत से प्यार करना शुरू किया। पश्चिमी लोगों की कल्पना में जो तिब्बत है, वह सचमुच तिब्बत नहीं है, वह है उन की दिमाग में मौजूद स्वप्नलोक। फिर सन 1990 के दशक में पश्चिमी अकादमी में तिब्बत के देवकरण की आलोचना की गयी। लोपेज़ ने खुद भी यह विचार प्रकट किया कि अमेरिका के तिब्बती अध्ययन तथा तिब्बती बौद्ध धर्म के निर्माण का ढ़ांचा सही नहीं था। दूसरे तिब्बती विद्वानों ने भी अपने लेख में कहा कि तिब्बत के इतिहास में धार्मिक युद्ध भी किया गया था।

लोपेज़ (Donald S. Lopez) ने इसी स्थिति में अपनी किताब “शांगरी-ला के कैदी”प्रकाशित की। लेकिन इस किताब के प्रकाशन के बाद पश्चिम में अनेक लोगों ने लोपेज़ की आलोचना की। प्रोफेसर शेन वेई रूंग का कहना है कि लोपेज़ की यह किताब “शांगरी-ला के कैदी”पढ़ने योग्य है। किताब का मुख्य राग प्रशंसनीय है। क्योंकि किताब में यह चर्चित है कि पश्चिम में बहुत से विद्वानों का तिब्बत के प्रति जो विचार है, वह तथ्यों से आधारित नहीं है। इसके पीछे पश्चिमी देशों के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का प्रतीक है। प्रोफेसर शेन वेई रूंग का कहना है कि पश्चिमी साम्राज्यवाद के रूप विविध हैं। विकासमान देशों के खिलाफ सीधे युद्ध करना या शोषण व उत्पीड़न करना वह साम्राज्यवाद है। उन की अपनी कल्पना से पूर्वी जातियों का स्वरूप दिखाना या उन्हें बदनाम देना, वह भी साम्राज्यवाद है। लोपेज़ ने विशेष रूप से ब्रिटिश लेखक जेम्स हिल्टन के उपन्यास लॉस्ट हॉरिजन की आलोचना की। क्योंकि उसने शांगरी-ला की मिथक से तिब्बत की सच्चाई को छिपा दिया है।

लेकिन लोपेज़ की किताब “शांगरी-ला के कैदी”के प्रकाशन से पश्चिम में व्यापक प्रभाव पैदा किया गया। उधर बहुत से पश्चिमी विद्वानों ने इस किताब की आलोचना की। उन का कहना है कि लोपेज़ की किताब पढ़ने के बाद तिब्बत के प्रति लोगों की प्यारभरा भावना खत्म होने लगी। उन्होंने यह आलोचना भी की कि लोपेज़ की किताब ने पश्चिमी विद्वानों द्वारा तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रति स्थापित किये गये विचारधारा ढ़ांचे को तोड़ दिया है, लेकिन उस ने तिब्बत की जानकारी लेने की नयी दृष्टि तैयार नहीं की है। प्रोफेसर शेन वेई रूंग ने अपने अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला है कि बीस साल पहले की तुलना में तिब्बत या शांगरी-ला मिथक के बारे में पश्चिमी विचार की मुख्यधारा में वास्तव में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन इधर के वर्षों में पश्चिमी देशों की सरकारों ने अकसर तिब्बत का राजनीतिक मुद्दा उठाया है, जबकि आम आदमियों की तिब्बत के प्रति रुचि कम होने लगी है। लेकिन इधर के वर्षों में चीन में ही अनेक लोगों ने अपने खुद को“शांगरी-ला के कैदी”बना दिया है। और यह भी चर्चित है कि ऐसे कैदियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। प्रोफेसर शेन ने कहा कि मींग राजवंश के शासन काल राजधानी पेइचिंग के नगर में कुल दो हजार लामा रहते थे, जो बहुत ज्यादा रहे। लेकिन आज पेइचिंग शहर में दो लाख जीवित बौद्ध होना बताया जा रहा है। यह अत्यंत निराधार है। इस के पीछे तिब्बती बौद्ध धर्म के दैवीकरण का रुझान होता है। इस का मतलब यही है कि चीन में कुछ लोगों ने पश्चिमी पूर्वाग्रह की नकल करना शुरू किया है। उदाहरण के लिए किसी ने दक्षिणी चीन के यूननान प्रांत में एक काउंटी के नाम को शांगरी-ला बदल दिया। किसी ने पूरे तिब्बती पठार को नेशनल पार्क बनाने का रुख प्रकट किया। प्रोफेसर शेन ने कहा कि शांगरी-ला तिब्बत में मौजूद स्वर्ग नहीं है, वह केवल पश्चिमी आदमियों की स्वप्न में मौजूद है। शांगरी-ला का प्रभाव पश्चिम से विश्व के दूसरे क्षेत्रों के लोगों को प्रभावित होता रहा है। इसी से कुछ लोगों के विचार को बदला गया है, लेकिन व्यापक तिब्बती जनता की उपेक्षा की गयी है। और यहां तक कि शांग्री-ला की मिथक से तिब्बती बौद्ध धर्म की सच्चाई को भी छिपाया जाएगा।

प्रोफेसर शेन ने कहा कि इधर दस सालों में विद्वानों ने युवान, मींग और छींग राजवंशों के ऐतिहासिक फ़ाइलों में तिब्बती बौद्ध धर्म के बारे में बहुत सी मूल्यवान सामग्रियों का पता लगाया है। बौद्ध धर्म के इतिहास का आधुनिक अनुसंधान करने में बाह्य प्रभाव को दूर करना चाहिये। और इसमें बौद्ध धर्म के विचारों के प्रभाव से भी वंचित करना चाहिये। बौद्ध धर्म का अनुसंधान ऐतिहासिक सामग्रियों और सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिये।

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