उत्तरी तिब्बत:उच्च ऊंचाई क्षेत्रों से चरवाहों का स्थानांतरण

2018-12-17 08:47:54
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उत्तरी तिब्बत:उच्च ऊंचाई क्षेत्रों से चरवाहों का स्थानांतरण

चरवाहों का नया निवास

हाल ही में चीन के तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के उत्तर स्थित नाग्छु में कुछ चरवाहों को पाँच हजार मीटर ऊँचाई क्षेत्र से प्रदेश की राजधानी ल्हासा शहर तक स्थानांतरित किया गया है। ल्हासा शहर की ऊँचाई समुद्र तल से 3700 मीटर है, जहां इन चरवाहों का अच्छी तरह निवास किया गया है।

तिब्बती पठार के उत्तरी क्षेत्र की ऊँचाई समुद्र तल से चार पाँच हजार मीटर तक रहती है। प्राकृतिक शर्तों की वजह से यहां रहने वालों का जीवन भी बहुत मुश्किल है। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के गरीबी उन्मूलन कार्यालय के उप प्रधान लू ह्वा तुंग ने कहा कि उच्च ऊंचाई क्षेत्रों में प्राकृतिक पर्यावरण भी बहुत खराब है। इन क्षेत्रों में चिकित्सा और शिक्षा आदि सार्वजनिक सुविधाओं का अभाव पड़ता है और आर्थिक विकास करने की शर्तें भी बहुत कम है। इसलिए गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य साकार करना कोई आसान काम नहीं है। वर्ष 2017 के अप्रैल में स्वायत्त प्रदेश ने तिब्बत के उच्च ऊंचाई क्षेत्रों में से लोगों को स्थानांतरित करने की दस्तावेज़ पास कर नाग्छु क्षेत्र में यह काम शुरू करने का फैसला किया। इस क्षेत्र में स्थित निम्मा काउंटी के रूंमा कस्बे में दो गांवों के 262 परिवार रहते हैं। उन में 81 गरीब परिवार भी हैं। इस क्षेत्र में प्राकृतिक वातावरण बहुत खराब है। अत्यंत सर्दी और ऑक्सीजन का अभाव होने के कारण यहां मानव निवास के लिए उपयुक्त नहीं है। रूंमा कस्बे में बहुत से लोग संधिशोथ और हृदय रोग से ग्रस्त हैं। लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा 60 साल से कम है। प्राइमरी स्कूल में केवल एक से तीन ग्रेड होते हैं और निवासियों के लिए सब्जियों की आपूर्ति करना भी बहुत कठिन है। साथ ही यहां राष्ट्र स्तरीय प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र भी है, बड़ी मात्रा के तिब्बती एंटीलोप और जंगली याक जैसे जानवर रहते हैं। प्राकृतिक वातावरण संरक्षण करने की बड़ी भी जरूरत है। बड़े शहर से दूर रहने की वजह से मोबाइल फोन का संचार नहीं चलता है और चिकित्सा की सेवा भी बहुत लिमिटित है। लोगों का कहना है कि यह क्षेत्र जंगली जानवर के लिए है, आदमी नहीं।

49 वर्षीय चरवाहा रिगज़िन रूंमा कस्बे में पशुपालन करते हैं। घर का मकान पुराना है और घर में एक टीवी के अलावा कोई आधुनिक संयंत्र नहीं है। फोन और वेब साइट की सेवा नहीं मिलती है और यहां तक कि पानी का आपूर्ति भी मुश्किल है। रिगज़िन ने अनेक बार इस मुश्किल जगह को छोड़कर शहरों में अपना जीवन शुरू करने पर सोचा था। कुछ महीने पहले अधिकारियों ने उन से ल्हासा के उपनगर में स्थानांतरित करने की इच्छा पूछी। यह खबर सुनकर रिगज़िन को बहुत खुशी हुई। लेकिन उन्हें फिर भी चिन्ता है। क्योंकि उनके पास कई भेड़ें हैं और बड़े शहर में काम करने की कौशल नहीं प्राप्त है। पशुपालन करने को छोड़कर कोई और काम नहीं कर सकते हैं। ल्हासा जैसे बड़े शहर में हम क्या कर सकेंगे। संदेह लगने के कारण रिगज़िन और दूसरे गांव वासियों ने स्थानांतरण पर सहमत नहीं किया। प्रदेश की सरकार ने बताया कि स्थानांतरित करेंगे या नहीं करेंगे, यह बिल्कुल लोगों की स्वेच्छा के अनुसार किया जाएगा। कुछ दिनों के बाद सरकार के कर्मचारियों ने एक बार फिर गांव में आकर लोगों को यह बता दिया कि स्थानांतरण के लिए मकान बनाने, शिक्षा लेने और स्वास्थ्य गारंटी आदि का खर्च सब सरकार के पक्ष में है, और पशुओं का पालन भी पुराने स्थान में किया जा सकता है। इस के बाद सभी गांव वासियों ने स्थानांतरण की दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किये।

स्थानांतरण करने से सभी गांववासियों का भाग्य भी बदल गया है। रवाना होने से एक दिन पहले ही रिगज़िन ने अंतिम तौर पर झील के पास पशुपालन किया। उन्होंने कहा कि हम पीढ़ी दर पीढ़ी घास के मैदान पर पशुपालन करते रहे हैं। अब इधर से छोड़कर चल जाना है, तो दिल में कुछ न कुछ उदास लगता है। कुछ दिनों के बाद रिगज़िन और दूसरे गांव वासी बस से ल्हासा की ओर रवाना हुए। यात्रा के दौरान रिगज़िन ने संवाददाता को बताया कि वे बहुत गंभीर गठिया से ग्रस्त हैं। पर रूंमा कस्बे में इलाज लेना मुश्किल है। ल्हासा शहर में चिकित्सा उपचार लेने की बड़ी सुविधा है। रिगज़िन की पत्नी गर्भवती है। पर इससे पहले खराब शर्तों की वजह से रिगज़िन के छह बच्चों की मौत हुई थी। रिगज़िन को विश्वास है कि ल्हासा शहर की आधुनिक शर्तों में उन का यह बच्चा सही सलामत हो सकेगा।

रूंमा कस्बे के पास राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र होता है। जिस का क्षेत्रफल लगभग तीन लाख वर्ग किलोमीटर है। इस क्षेत्र की ऊँचाई पाँच हजार मीटर से भी अधिक है, जहां तिब्बती एंटीलोप और जंगली याक आदि जानवर रहते हैं। निम्मा काउंटी के वानिकी ब्यूरो के एक पदाधिकारी के अनुसार पशुपालन की वजह से घास के मैदान पर लोहे के तार से विशाल बाड़ बनायी गयी थी।जिससे जंगली पशुओं के प्रवासन को रोका गया था, और यहां तक कि कुछ तिब्बती एंटीलोप बाड़ से उलझ कर मर गये थे। चरवाहों के स्थानांतरण के बाद घास के मैदान पर बनायी गयी बाड़ों को हटाया गया है और जंगली जानवरों को बेहतर वातावरण मिल पाएगा।

दो दिनों की यात्रा समाप्त करने के बाद रिगज़िन और उन के सहपाठी ल्हासा शहर के उपनगर में स्थित नये गांव --- गाछूंग गांव तक पहुंच गये। स्थानीय लोगों ने नये पड़ोसियों के स्वागत में भव्य समारोह का आयोजन किया। यह नया गांव ल्हासा शहर के केंद्र से सिर्फ 27 किलोमीटर दूर है, जिसकी ऊँचाई 3800 मीटर है। इस क्षेत्र के आसपास वातावरण सुंदर है और नजदीक में एक औद्योगिक क्षेत्र भी मौजूद है। सरकार ने गाछूं गांव के निर्माण में 22.6 करोड़ युआन की पूंजी डाली। रिहायशी निवास के अलावा किंडर गार्डन और गांव केंद्र इमारत आदि भी निर्मित हो चुकी है। रिगज़िन और दूसरे गांव वासियों को क्रमशः 80 से 180 वर्ग मीटर विशाल मकान दिये गये हैं। सरकार ने मकान का निर्माण करने वाले खर्च का 90 प्रतिशत उठाया है। गांव वासियों को केवल 10 प्रतिशत खर्च उठाना है। और गांव वासियों में जो गरीब है, उन्हें निःशुल्क तौर पर मकान वितरित किया गया है। रिगज़िन का मकान 150 वर्ग मीटर बड़ा है। मकान में रसोई, नल-पानी आदि आधुनिक उपकरण सब उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि घास के मैदान पर स्नान लेना मुश्किल था। यहां सब कुछ हो सकता है। हम पार्टी की सही नीतियों के प्रति बहुत आभार हैं।

स्थानीय सरकार ने यह वचन दिया है कि रूंमा कस्बे में छोड़े गये पशुओं का पालन करवाने के लिए एक सहकारी स्थापित की जाएगी। जबकि ल्हासा के नये गांव में रहने वालों को आसपास के कारोबार में रोजगार का प्रबंध किया जाएगा। देश की 13वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान तिब्बती प्रदेश में कुल 6910 परिवारों के 27880 लोगों का स्थानांतरण किया जाएगा।  स्वायत्त प्रदेश के उपाध्यक्ष च्यांग पाई ने कहा कि स्थानांतरण करने का उद्देश्य उन गरीब चरवाहों का जीवन उन्नत करना है। और साथ ही इन क्षेत्रों में प्राकृतिक वातावरण का अच्छी तरह संरक्षण किया जाएगा।

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