तिब्बती इतिहास का अनुसंधान

2018-04-03 09:18:39
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तिब्बती इतिहास का अनुसंधान


28 मार्च को तिब्बत में जनवादी रुपांतर चलाने और तिब्बती भू-दासों की मुक्ति का दिवस होता है। यह दिवस मनाने के लिए चीन के तिब्बती अध्ययन केन्द्र ने एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया। मौके पर उपस्थित विद्वानों ने अपने अनुसंधान के माध्यम से यह साबित कर दिया कि तिब्बत प्राचीन काल से ही चीनी प्रादेशिक भूमि का एक अंक होता है और तिब्बती जाति भी चीनी राष्ट्र में महत्वपूर्ण सदस्य है। तिब्बती परंपरागत संस्कृति को भी चीनी राष्ट्र में बहु सांस्कृतिक घटक के रूप में माना जाना चाहिये।

इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन काल में तिब्बती पठार की संस्कृति कोई पृथक संस्कृति नहीं थी जिस के पीली नदी से केंद्रीय मुख्य भूमि के साथ घनिष्ठ संबंध बने हुए थे। इतिहास के विकास के चलते तिब्बती जाति चीनी राष्ट्र के समुदाय में शामिल हो चुकी थी। सछ्वान विश्वविद्यालय के तिब्बती अध्ययन केन्द्र के प्रधान हो वेई ने कहा,“प्राप्त सामग्रियों से यह साबित किया गया है कि प्राचीन काल से ही तिब्बती संस्कृति कोई पृथक संस्कृति नहीं थी, वह एक ओपन सिस्टम था। प्राचीन काल से ही तिब्बती जाति पीली नदी के क्षेत्रों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाये रखती थी। मिसाल के तौर पर बाजरा जैसे कृषि उत्पाद और जेड से बने यंत्र, सब पीली नदी के सांस्कृतिक मंडल से संबंधित हैं। इसी संदर्भ में बहुत से वैचारिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी सबूत तैयार हैं। तिब्बती संस्कृति और पीली नदी के क्षेत्रों की संस्कृति के बीच में हमेशा घनिष्ठ संपर्क रखे हुए हैं। और यह कनेक्शन आपसी भी है। रेशम, कुछ विशेष कलात्मक पैटर्न, और पेपर-मेकिंग तकनीक आदि तिब्बती पठार में प्रचलित हो गयी थी, उधर भीतरी इलाकों के लोगों ने भी तिब्बती पठार से सोने व चांदी यंत्र बनाने की स्किल और ड्रेसिंग स्टाइल आदि सीख लिया था।”

संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों का विचार है कि वर्ष 2015 में प्रकाशित तिब्बत का सामान्य इतिहास में तिब्बती संस्कृति के प्रति किये गये अनुसंधान कार्यों की मुख्य उपलब्धियां दर्शाई जा रही हैं। यह पुस्तक संग्रह कुल 8 संस्करणों के 13 खंडों तथा 85 लाख शब्दों से गठित है। इस पुस्तक के अनुसंधान और लेखन में कुल दस साल समय लगाया गया था। विद्वानों ने सांस्कृतिक अवशेषों, पुरातात्विक सामग्रियों तथा बहु-भाषीय ऐतिहासिक रिकॉर्डों के माध्यम से पाषाण युग से अब तक के तिब्बती राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था, वैचारिक और सांस्कृतिक तत्व, धर्म, सैन्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, परिवहन, और जातीय संबंधों का पूर्ण रूप से अनुसंधान किया और अपने कार्यों के आधार पर तिब्बत का सामान्य इतिहास का प्रकाशन किया। चीन के तिब्बती अध्ययन केन्द्र के प्रधान आन छी ई ने कहा,“तिब्बत का सामान्य इतिहास  में ठोस ऐतिहासिक साक्ष्यों से स्पष्ट तौर पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि तिब्बत प्राचीन काल से ही चीन का अखंडनीय भाग होता रहा है। तिब्बती जाति चीनी राष्ट्र के परिवार का एक सदस्य है और तिब्बत की परंपरागत संस्कृति को चीनी राष्ट्र में बहु सांस्कृतिक घटक के रूप में मानना चाहिये।”

तिब्बत का सामान्य इतिहास यह पुस्तक तिब्बत के इतिहास और संस्कृति के बारे में प्रथम ऐसी पुस्तक है जिसमें व्यापक, व्यवस्थित, यथार्थवादी और निष्पक्षीय तौर पर तिब्बती इतिहास की वास्तविक प्रकृति का वर्णन किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय तिब्बती अध्ययन के संदर्भ में इस पुस्तक का अद्वितीय अकादमिक महत्व प्राप्त है। चीनी केंद्रीय जातीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शेसराब न्यीमा ने कहा कि तिब्बत का सामान्य इतिहास इस पुस्तक में केवल ऐतिहासिक सामग्रियों का ढेर नहीं है, इसमें तिब्बत के इतिहास पर पूरे समाज की जिज्ञासा को पूरा किया जा सकेगा। और इस पुस्तक के प्रकाशन में बहुत से जवान अनुसंधानकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया है। उन्हों ने कहा,“तिब्बत का हजारों वर्षों का इतिहास है और हमें इतिहास की वास्तविक जानकारी प्राप्त होना चाहिये। देश में सभी जातीयों के लोगों को इतिहास की व्यापक, व्यवस्थित, वास्तविक और निष्पक्षीय जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता है। खुशी की बात है कि अनेक जवान विद्वानों ने तिब्बत का सामान्य इतिहास इस पुस्तक के प्रकाशन से अपनी अकादमिक स्तर को उन्नत किया है।”

सछ्वान विश्वविद्यालय के तिब्बती अध्ययन केन्द्र के प्रधान हो वेई ने कहा,“तिब्बत को विश्व में विभिन्न सभ्यताओं के आदान-प्रदान का एक 'क्रोस रोड' माना जाता है। प्राचीन काल में तिब्बत अपने पूर्व में स्थित थांग राजवंश, सिल्क रोड, अपने दक्षिण में स्थित दक्षिणी एशिया, तथा अपने पश्चिम में स्थित फारसी सभ्यता के साथ घनिष्ठ संबंध बनाये रखता था। पर अंततः तिब्बत इस्लामी और दक्षिण एशियाई संस्कृति के सिस्टम में शामिल नहीं हुआ था। इसके विपरीत तिब्बत ने थांग राजवंश के साथ अतयंत घनिष्ठ संबंध बनाये रखा था। तिब्बती संस्कृति के विकास के चलते इसके चीनीकरण की प्रक्रिया भी दर्शायी जा रही थी।”

 

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