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चीन और पाकिस्तान के बीच काराकोरम मार्ग के निर्माण की कहानी

2019-12-02 15:27:53
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चीन और पाकिस्तान के बीच काराकोरम मार्ग विश्व में सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित सीमा पार मार्ग है। वह विश्व में सबसे कठिन निर्माण वाले मार्गों में से भी एक है। चीन और पाकिस्तान ने संयुक्त रूप से वर्ष 1968 में इसका निर्माण शुरू किया और वर्ष 1979 में यह महान परियोजना पूरी की। इस मार्ग की कुल लंबाई 1224 किलोमीटर है। लभभग 700 लोगों ने इस के निर्माण के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था ।यह मार्ग चीन और पाकिस्तान के बीच लोगों और वस्तुओं की आवाजाही के लिए बड़ी सुविधा देता है। आज वह चीन-पाक आर्थिक गलियारे का शुरूआती स्थल है, जो दोनों देशों के संबंधों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चालू साल काराकोरम मार्ग का निर्माण पूरा होने की 40वीं वर्षगांठ है। पाकिस्तान स्थित सीआरआई संवाददाता हाल ही में फिर इस रास्ते पर चले और उन्होंने कई रिपोर्टें भेजीं। आज हम इस मार्ग के निर्माण की कहानी प्रस्तुत करेंगे।

काराकोरम मार्ग के निर्माण से पहले चीन से लगा पाकिस्तान का गिलगित बाल्टीस्तान एक उजाड़ क्षेत्र था। पाकिस्तान मार्ग ब्यूरो के पूर्व उपनिदेशक अब्दुलाह जान बचपन में वहां रहते थे।

उन्होंने याद करते हुए बताया ,काराकोरम मार्ग के निर्माण से पहले गिलगित-बाल्टीस्थान और पाकिस्तान के अन्य इलाकों और चीन के बीच मार्ग नहीं था। स्थानीय लोग घोड़ों और गधों से व्यापार करते थे। हर साल वे एक बार बाहर जाते थे ।वे पशुओं से स्थान विशेष वस्तुओं को रावलपिंडी पहुंचाकर बेचते थे, फिर वहां की वस्तुएं वापस लाकर बेचते थे।

पिछली सदी की 60 वाले दशक में पाकिस्तान ने चीन से दोनों देशों के बीच सीमा पार काराकोरम मार्ग बनाने की मांग की ,जिसे चीन सरकार का समर्थन मिला। वर्ष 1966 में दोनों देशों के बीच संपन्न हुए काराकोरम मार्ग निर्माण समझौते के अनुसार चीन और पाकिस्तान अपनी अपनी भूमि में इस मार्ग का निर्माण करेंगे। लेकिन बाद में पाकिस्तान में इस मार्ग का निर्माण बहुत कठिन था और पाकिस्तान के पास खुद इसके निर्माण करने की दक्षता नहीं थी ।उसने चीन से सहायता मांगी। चीन सरकार ने फिर हाथ बंटाया।

पाकिस्तान स्थित चीनी मार्ग और पुल कॉर्पोरेशन कार्यालय के महाप्रबंधक ली चीहवाई ने सीआरआई के संवाददता को उस समय चीन की सहायता की कहानी सुनायी ।

उन्होंने बताया ,उस समय चीन सरकार ने काराकोरम मार्ग के निर्माण के लिए पाकिस्तान को मदद दी। होंगछीलापू से थाकोट तक 616 किलोमीटर मार्ग के निर्माण में 11 साल लगे। वर्ष 1968 से 1979 तक कुल 22000 लोगों ने इस परियोजना में भाग लिया ।यह एक आर्थिक सहायता परियोजना थी ।चीनी यातायात मंत्रालय ने इस मार्ग का डिज़ाइन और निर्माण योजना बनायी।

पाकिस्तान में स्थित काराकोरम मार्ग का सेक्टर हिमाचल पहाड़, काराकोरम पहाड़, हिंदुकुश पहाड़ और पामीर पठार से होकर गुज़रता है। वहां ऑक्सीजन का अभाव है ,हिमस्खलन ,भू-स्खलन ,भूकंप, पत्थरों, मिट्टी और कंकड़ों के गिरने जैसी प्राकृतिक आपदाएं निरंतर पैदा होती हैं ।छांग चेनश्यो उस समय काराकोरम मार्ग निर्माण मुख्यालय के एक दुभाषिये थे।

उन्होंने बताया, सीमा पार करने के बाद तो कुछ खतरनाक रॉक हिल हैं। हवा चलने के समय अक्सर पत्थर पहाड़ के ऊपर नीचे गिरते थे। दुर्घटनाएं निरंतर होती थीं।

ऊंचे पहाड़ों के बीच मार्ग निर्माण के लिए मशीनों का परिवहन एक कठिन सवाल था। लेकिन चीनी निर्माणकर्ता इससे नहीं डरे।

छांग चेनश्यो ने बताया ,शुरूआती 400 किलोमीटर में कोई रास्ता नहीं था और बहुत खड़ी चट्टानें थीं। हमारे तकनीशियन और मज़दूर अपने से उपकरण और साज़ो सामान ढोते थे या रस्सी से खींचते थे। बुलडोज़र जैसी बड़ी मशीनों को पृथक कर ले जाकर फिर उनको वापस जोड़ते थे ।खड़ी चट्टानों पर निर्माण करना अत्यंत कठिन था।

आंकड़ों के अनुसार काराकोरम मार्ग के निर्माण में लगभग 700 लोगों ने अपने प्राणों को न्योछावर किया , जिनमें 130 चीनी कर्मचारी थे। प्राण और पसीने से बने काराकोरम मार्ग ने चीन-पाक जनता की मित्रता को मज़बूत किया। स्थानीय नागरिक राज हसाम को अब तक उस समय चीनी निर्माताओं और स्थानीय गांववासियों के बीच गहरी भावना याद है।

उन्होंने बताया ,मैं बहुत से चीनी निर्माणकर्ताओं को जानता था, जिनमें इंजीनियर थे और मजदूर भी ।वे बहुत अच्छे लोग थे ।हमारे लोग उनके साथ काम करते थे ।हम बहुत खुश थे ।जब वे यहां के फल उद्यान आते थे, हम ताजा फल से उनका सत्कार करते थे। रात में हम कभी कभी उनके शिविरों में जाते थे और एक साथ चीनी फिल्म देखते थे। हमारे और चीनी लोगों के संबंध बहुत अच्छे थे।

वर्ष 1979 में काराकोरम मार्ग के होंगछीलाफू-थाकोट सेक्टर का निर्माण पूरा किया गया। इस मार्ग से उत्तर पाकिस्तान बाहरी दुनिया से जुड़ने वाला एक रास्ता खोला गया, जिसने स्थानीय लोगों का जीवन बदल दिया। पाकिस्तान के मार्ग ब्यूरो के पूर्व उपनिदेशक अब्दुलाह जान ने बताया ,काराकोरम मार्ग से स्थानीय सामाजिक और आर्थिक स्तर कई गुणा बढ़ा ।पहले का जीवन बहुत खराब था। मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता। लेकिन अब सब ठीक ठाक है। पहले स्थानीय लोगों को बहुत सारी फल और सब्जियों का पता भी नहीं था। अब चीन से आयातित फल आसानी से गिलगित बाल्टीस्तान क्षेत्र पहुंचाये जाते हैं ।लोग बाज़ार पर पाकिस्तान के अन्य क्षेत्रों के आम, सब्ज़ी और फल खरीद सकते हैं।

चालीस साल जल्दी बीत गये। लेकिन काराकोरम मार्ग के निर्माण की कहानी बनी रहती है और बनी रहेगी।

(वेइतुंग)

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