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(इंटरव्यू) चीन व भारत के बीच तैयार हुआ विश्वास का माहौल-अतुल जोशी

2019-06-19 19:27:52
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भारत सरकार की आने वाले समय में प्राथमिकता, चीन के साथ संबंधों और अमेरिका द्वारा जबरन पैदा किए गए व्यापारिक विवाद पर सीआरआई ने जाने-माने थिंक टैंक व इंडियन ऑइस्टर कैपिटल के संस्थापक व सीईओ अतुल जोशी के साथ विस्तार से बातचीत की। इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले पूर्ण बजट और नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन से उम्मीदों को लेकर भी अतुल जोशी से सवाल किए गए।

अतुल जोशी भारत के दूसरे सबसे बड़े बैंक आईसीआईसीआई में अहम पद पर काम कर चुके हैं। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई हैं। जिसमें दुनिया की प्रमुख रेटिंग एजेंसी फिच के प्रबंध निदेशक और सीईओ की जिम्मेदारी भी शामिल है।

मोदी सरकार की निकट भविष्य में क्या प्राथमिकता होगी, इस सवाल के जवाब में अतुल कहते हैं कि सरकार चार या पांच एजेंडो पर काम करेगी। जिनमें अर्थव्यवस्था में आयी सुस्ती को बेहतर करने की दिशा में काम किया जाएगा। साल 2017-18 की बात करें तो हमारी जीडीपी 7.2 प्रतिशत थी। जबकि इस साल कुछ गिरावट के साथ 6.8 फीसदी रही है। सरकार चाहेगी कि अर्थव्यवस्था में कुछ तेजी लायी जाय। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात इंफ्रास्ट्रक्चर को विस्तार देना होगा, क्योंकि निजी क्षेत्र से जिस निवेश की उम्मीद है उतना निवेश नहीं आ रहा है। इस दिशा में सरकार को ध्यान देना है। इसके साथ ही वित्तीय क्षेत्र को आज स्थिरता की जरूरत है। भारतीय बैंकों का नॉन परफार्मिंग एसेट यानी एनपीए लगभग 9 फीसदी है। उसमें कैसे कमी की जाय, बैंकों को फिर से कैसे रिकैपिटलाइज किया जाय। और संचालन संबंधी माहौल को कैसे बेहतर बनाया जाय, ताकि हम एनपीए को कम कर सकें या उसे काबू में ला सकें।

वहीं सरकार का फोकस रोजगार के मौके पैदा करने पर भी होगा। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है। यह पिछले चार दशकों में यह ऊंची दर है। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार चाहेगी कि इस दर को औसत स्तर जो कि 3.3 फीसदी के आसपास है, तक कम किया जाय। इसके लिए कृषि और स्किल डिवेलपमेंट को लेकर विशेष ध्यान दिया जाने वाला है।

इसके अलावा मोदी सरकार ने ‘सबका-साथ, सबका-विकास’ का जो नारा दिया है, इससे समग्र ग्रोथ की तरफ ध्यान दिया जाएगा। जिसके तहत निचले वर्ग को टैक्स में कुछ छूट के साथ-साथ लाभकारी योजनाएं लागू किए जाने की संभावना है।

चीन-भारत रिश्तों को लेकर अतुल का मानना है कि चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच वार्ताएं हुई हैं वह बहुत ही अभूतपूर्व व दोस्ताना माहौल में हुई हैं। कई वर्षों से हम देखते आ रहे थे कि दोनों पक्षों के बीच जो संवाद होना चाहिए था वह नहीं हो पा रहा था। लेकिन मोदी और शी एक-दूसरे से कई बार विभिन्न जगहों पर मिले हैं। इसकी वजह से दोनों नेताओं के बीच में एक बहुत अच्छी समझदारी कायम हो चुकी है। अगर नेताओं के बीच में समझदारी होती है तो वह सरकारों के नीति-निर्धारण में भी झलकता है। आज की तारीख में बात करें तो चीन और भारत के मध्य विश्वास का एक वातावरण तैयार हुआ है। इसका श्रेय दोनों नेताओं को देना होगा कि उन्होंने बहुत ही अच्छे ढंग से काम किया है। पहले ऐसा माहौल था जिसमें संवाद की कमी थी, उससे हटकर बातचीत चालू की गयी। इसके साथ ही व्यापार को भी प्राथमिकता देते हुए द्विपक्षीय बिजनेस को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

वहीं सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि दोनों देशों के लोगों के बीच एक सेतु तैयार हो सके। बड़े स्तर पर बनी समझदारी को आगे ले जाना है। एक-दूसरे की संस्कृति को समझना बहुत जरुरी है। इसके लिए दोनों तरफ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अच्छा वातावरण तैयार किया गया है।

आगे चलकर हम देखेंगे कि निवेश के प्रति कदम बढ़ाए जाएंगे। चीनी बैंकों आईसीबीसी और बैंक ऑफ चाइना ने भारत में अपना संचालन शुरू किया है। कहना होगा कि दोनों तरफ से बहुत ही सकारात्मक और दूरगामी सोच वाले कदम उठाए गए हैं।

चीन-अमेरिका व्यापारिक समस्या की पृष्ठभूमि में चीन-भारत के बीच व्यापार की संभावनाओं पर अतुल का मानना है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक ज्यादा हैं, प्रतिस्पर्धी कम। ऐसे में व्यापार को मजबूती व बढ़ावा देने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय लग रहा है। चीन की बात करें तो उसके पास तकनीक है, चीन के पास उत्पाद हैं, जिसकी भारत को जरूरत है। जबकि चीन के पास निवेश के लिए फंड है, वहीं भारत के पास बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार है। हमारे देश में मध्यम वर्ग 19 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो आने वाले सात वर्षों में 19 फीसदी से बढ़कर 33 प्रतिशत हो जाएगा। भारत का मध्यम वर्ग तमाम उत्पादों को इस्तेमाल करना चाहता है। इसमें तकनीक से लेकर सभी तरह के नवीन उत्पाद शामिल हैं। वहीं भारत को निवेश की आवश्यकता भी है। देखा जाय तो चीन की जो जरूरत है, वो भारत के पास है और जो भारत को चाहिए वह चीन दे सकता है।

बकौल अतुल अमेरिका ने आज विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) को लगभग नजरअंदाज कर दिया है। जैसा कि हम जानते हैं कि डब्लूटीओ तमाम देशों के बीच होने वाले द्विपक्षीय व्यापार को रेगुलेट करने का काम करता है। लेकिन हाल में अमेरिका ने जो फैसला किया है वह डब्लूटीओ के खिलाफ है। इसमें तमाम तरह के समझौतों को दरकिनार करना भी शामिल है। चाहे आप अमेरिका-कनाडा या अमेरिका-मैक्सिको संधि को ही ले लीजिए या फिर अमेरिका-ब्रिटेन संधि को। अमेरिका ने जो कदम उठाए हैं या तो इस संधि को किनारे पर रखकर उठाए हैं या फिर संधि ही रद्द कर दी है। इसके बाद ट्रंप प्रशासन नए तरीके और नई शर्तें लगा रहा है।

भारत के लिहाज से देखें तो भारत का जो लगभग पचास फीसदी यानी आधा निर्यात सिर्फ एशियाई देशों में हो रहा है। हम आगे इसका कैसे फायदा ले सकें, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। वहीं अमेरिका ने भारत से भी फेवर्ड नेशन का दर्जा हटा दिया है। भारत के कई उत्पादों पर भी ड्यूटी लगा रखी है। जबकि चीन के भी तमाम उत्पादों को अमेरिका ने निशाने पर रखा है। ऐसी स्थिति में भारत और चीन को प्रत्येक उत्पाद को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी चाहिए। इसके साथ ही अमेरिका की जगह कैसे चीन ले सके या कैसे भारत ले सके। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि चीन के उत्पाद और तकनीक दुनिया भर में निर्यात हो रही है।

अगर अमेरिका द्वारा लगायी गयी पाबंदी से चीन के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर कुछ असर पड़ रहा है तो चीनी कंपियां भारत में आकर भारत को बेस बनाकर दुनिया को तकनीकी उत्पाद निर्यात कर सकती हैं।

इसके अलावा अमेरिका ने चीन को निर्यात होने वाले सोयाबीन पर टैक्स बढ़ा दिया है। ऐसे में चीन भारत के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर समझौता कर सकता है।

इस तरह कहा जा सकता है कि भारत और चीन के बीच व्यापार के क्षेत्र में विकास की व्यापक संभावना है।

(अनिल आजाद पांडेय)

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