29 अक्तूबर 2020

2020-10-29 10:56:28
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अनिलः दोस्तो कहते हैं मौत हर किसी की निश्चित है। फिर चाहे वो इंसान हो या जानवर। मोटे तौर पर अंदाजे और रिसर्च के आधार पर किसी भी जानवर की उम्र का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। जानवरों की उम्र इंसान से कम होती है। इंसान के मुकाबले वो तेजी से बूढ़े होते हैं और खत्म हो जाते हैं।

अगर कोई पालतू कुत्ता दस साल जी ले तो माना जाता है कि उसने इंसानी जिंदगी के 70 साल जी लिए। माना जाता है कि कुत्ता एक साल में इंसान की जिंदगी के सात साल जीता है। लेकिन नई रिसर्च कहती हैं कि पालतू कुत्तों की उम्र के बारे में समझना इतना आसान नहीं है।

उदाहरण के लिए कुत्तों की ज्यादातर नस्लों में शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा 6 से 12 साल की उम्र में पैदा होने लगती हैं। वहीं बहुत सी नस्ल के कुत्ते 20 साल तक जीते हैं। ऐसे में अगर माना जाए कि कुत्ता एक साल में इंसानी जिंदगी के सात साल के बराबर जीता है तो कुछ नस्ल के कुत्तों की उम्र 120 साल हुई।

यानी इंसानी जिंदगी से दो गुना ज्यादा। ऐसा नहीं है कि सभी नस्ल के कुत्ते एक समान उम्र जीते हैं। उनकी उम्र उनकी नस्ल पर निर्भर करती है। मिसाल के लिए छोटे कुत्ते ज्यादा लंबी उम्र जीते हैं और बड़े कुत्तों के मुकाबले धीमी गति से बूढ़े होते हैं।

अब सवाल पैदा होता है कि उम्र से हमारी इच्छा क्या है। कोई भी जानवर पैदा होने से मरने तक जितना समय जीवित रहता है वो उम्र कहलाती है। लेकिन ये उम्र की कालानुक्रमिक परिभाषा है। उम्र की एक जैविक परिभाषा भी है। जिसका पैमाना सेहत की गुणवत्ता के आधार पर होता है। यानी अगर किसी की उम्र 20 साल है, लेकिन उसकी सेहत खराब रहती है तो जाहिर है उसका शरीर तेजी से कमजोर हो रहा है और वो बुढ़ापे की ओर बढ़ रहा है। इसके लिए फ्रेलिटी इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत किसी व्यक्ति की बीमारियां, उसके दिन भर के कामकाज का ब्यौरा, और उसकी समझ को परखा जाता है। फिर इसे दो स्तर पर बांटा जाता है। पहला है जीन का स्तर।

जीन शरीर में प्रोटीन पैदा करते हैं। और ये उम्र के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग स्तर पर पैदा होते हैं। दूसरा है शरीर में प्रतिरोधक क्षमता वाली कोशिकाओं की मात्रा। जिस तेजी से जैविक आयु बढ़ती है उसमें कई वंशानुगत कारक, इंसान की दिनचर्या और उसकी मानसिक सेहत पर बहुत असर डालती है।

मिसाल के लिए अगर कोई संतुलित आहार नहीं लेता, सिगरेट ज्यादा पीता है, एक्सरसाइज नहीं करता है तो जाहिर ऐसे इंसान की जैविक आयु उसकी कालानुक्रमिक आयु से ज्यादा हो जाएगी। यानी आप 40 की उम्र में 60 साल की उम्र गुजार लेंगे। वहीं अगर आप अपनी दिनचर्या और खानपान सही रखते हैं तो आप 60 की उम्र में भी 40 की ही जिंदगी गुजारेंगे। यानी ऐसे लोगों की क्वालिटी लाइफ ज्यादा होती है।

अगर जानवरों की सभी प्रजातियों की उम्र का अध्य्यन किया जाए तो उनकी जैविक आयु की परिभाषा, कालानुक्रमिक परिभाषा से ज्यादा कारगर है। रिसर्चर कहते हैं कि जैविक आयु मापना एक मुश्किल काम है। सभी स्तनधारियों के डीएनए में समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं।

डीएनए मिथाइलेशन से भी उम्र का सही अंदाजा लगाने में मदद मिलती है। डीएनए एक जैविक प्रक्रिया है जिसमें कई मिथाइल ग्रुप जुड़े होते हैं। यानी एक कार्बन एटम के साथ तीन हाईड्रोजन एटम जुड़े होते हैं। मिथाइलेशन डीएनए के क्रम में छेड़छाड़ के बग़ैर उसे प्रभावित कर सकता है।

अलग-अलग तरह की प्रजातियों में कई तरह के शारीरिक विकास एक समान होते हैं जैसे दांतों का निकलना। लिहाजा इंसान और लेबरेडोर कुत्ते की मिथाइलेशन स्तर का मिलान करते हुए रिसर्चरों ने एक फॉर्मूला तैयार किया है जिसकी बुनियाद पर कुत्तों की सही उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नीलमः अब एक और जानकारी। पेड़ पौधे इंसान के लिए उतने ही जरूरी हैं जितने हवा और पानी, लेकिन इंसानी बस्तियां इन्हें काटकर ही बसाई जाती हैं। इंसान इसकी भारी कीमत चुका भी रहा है। उसे प्रदूषण के साथ जीना पड़ रहा है। अनगिनत बीमारियां गले पड़ रही हैं, लेकिन अब इंसान को अपनी गलती का अहसास हो गया है। नए पेड़-पौधे लगाकर वो अब कुदरत का कर्ज उतार रहा है। साथ ही शहरों का प्रदूषण कम करने का प्रयास भी किया जा रहा है। दिल्ली हो, लंदन हो या पेरिस, दुनिया के तमाम शहरों में हरियाली बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

लेकिन सभी पेड़ या पौधे एक समान स्तर पर प्रदूषण खत्म नहीं करते। इसके लिए पहले ये जानना जरूरी है कि कहां किस स्तर का प्रदूषण है और फिर उसके मुताबिक ही वहां पेड़ लगाए जाएं। साथ ही ये समझना भी जरूरी है कि पेड़ हवा की गुणवत्ता बेहतर करते हैं, न कि हवा को पूरी तरह साफ करते हैं। हवा स्वच्छ बनाने के लिए जरूरी है कि कार्बन उत्सर्जन कम से कम किया जाए।

पौधे वातावरण के लिए फेफड़ों का काम करते हैं। ये ऑक्सीजन छोड़ते हैं और वातावरण से कार्बन डाईऑक्साइड सोख कर हवा को शुद्ध बनाते हैं। पौधों की पत्तियां भी सल्फर डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड जैसे खतरनाक तत्व अपने में समा लेती हैं और हवा को साफ बनाती हैं। यही नहीं, कई तरह के प्रदूषित तत्व पौधों की मखमली टहनियों और पत्तियों पर चिपक जाते हैं और पानी पड़ने पर धुल कर बह जाते हैं।

रिहाइशी इलाकों की तुलना में सड़कों पर प्रदूषण ज्यादा होता है। लिहाजा यहां ज्यादा घने और चौड़ी पत्तियों वाले पेड़ लगाने चाहिए। पत्तियां जितनी ज्यादा चौड़ी और घनी होंगी, उतना ही ज्यादा प्रदूषण सोखने में सक्षम होंगी। एक रिसर्च बताती है कि छोटे रेशे वाली पत्तियों के पौधे भी PM नियंत्रित करने में अहम रोल निभाते हैं। जैसे देवदार और साइप्रस जैसे पेड़ अच्छे एयर प्यूरिफायर का काम करते हैं। रिसर्च में पाया गया है कि इन पेड़ों की पत्तियों में PM 2.5 के जहरीले तत्व सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा होती है।

देवदार की एक खासियत ये भी है कि ये सदाबहार पेड़ है। इसलिए ये हर समय हवा साफ करने का काम करता रहता है। वहीं जानकार ये भी कहते हैं कि बर्फ वाली जगहों के लिए देवदार अच्छा विकल्प नहीं है। चूंकि ये पेड़ बहुत ज्यादा घने होते हैं। लिहाजा सूरज की रोशनी जमीन तक सीधे नहीं पहुंचने देते। इससे बर्फ पिघलने में समय लगता है। साथ ही बर्फ पिघलाने के लिए बहुत से इलाकों में नमक का इस्तेमाल होता है जो कि देवदार के लिए उचित नहीं है।

अनिलः जानकारों के मुताबिक पतझड़ वाले पेड़ों के कई नुकसान भी हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में चिनार और ब्लैक गम ट्री बड़ी संख्या में लगाए जाते हैं। ये पेड़ बड़ी मात्रा में वोलेटाइल ऑर्गेनिक कम्पाउंड (VOCs) छोड़ते हैं। बेहतर यही है कि जिस इलाके में कुदरती तौर पर जो पेड़ पौधे उगते हैं वही रहने दिए जाएं। जबकि बहुत से जानकारों का कहना है कि जरूरत के मुताबिक अन्य इलाकों के पौधे लगाने में भी कोई हर्ज नहीं हैं। लेकिन जो भी पौधे लगाए जाएं वो नियोजित तरीके से लगाए जाएं।

साथ ही रिसर्चर ये भी कहते हैं कि सड़क किनारे ऐसे पेड़-पौधे लगाए जाएं जिनकी उम्र ज्यादा हो और देखभाल की जरूरत कम हो। इसके अलावा एक ही जगह पर एक ही नस्ल के बहुत सारे पौधे ना लगाए जाएं। किस इलाके में कौन सा पेड़ या पौधा बेहतर रहेगा इसका आकलन करना एक चुनौती भरा काम है। वैज्ञानिक ऐसे उपकरण तैयार कर रहे हैं जिनसे इस चुनौती पर जीत हासिल की जा सकती है।

दोस्तो, एक और जानकारी......

पिछले नौ वर्षों में कामरान ने 50 हजार किलोमीटर साइकिल चलाकर 43 देशों की यात्रा की है। आज कल कोविड-19 के कारण पाकिस्तान में रुके हुए हैं और इंतजार कर रहे हैं कि कब उन्हें हरी झंडी मिले और वो अपनी साइकिल के पैडल पर पैर रखें। हालांकि, इस समय भी वह खाली नहीं बैठे हैं। अपनी पिछली यात्राओं में ली गई अनगिनत तस्वीरों में से, अच्छी तस्वीरों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर करते रहते हैं और उनके बारे में ब्लॉग लिखते रहते हैं। यानी यात्रा अभी भी नहीं रुकी है और 'पिक्चर अभी बाकी है, मेरे दोस्त।'

वे कहते हैं मेरा जन्म दक्षिण पंजाब के शहर लेह में हुआ था। मेरे पिताजी की पुराने टायरों की एक दुकान थी, जहां वे टायर में पंक्चर लगाने का काम करते थे। मैं भी दुकान पर उनका हाथ बंटाता था। मेरे पिता चाहते थे कि मैं पढ़ लिख जाऊं और उनकी तरह पंक्चर बनाने का काम न करूं। इसलिए मैंने लेह से ही इंटरमीडिएट किया और फिर मुल्तान चला गया, जहां मैंने बहाउद्दीन जकरिया विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में बीएससी और फिर एमएससी की। उसके बाद जर्मनी में मेरा एडमिशन हो गया। वहां जाकर मैंने मास्टर्स की और पीएचडी पूरी की।

नीलमः कामरान कहते हैं कि बचपन में जब मैं 12 या 13 साल का था, तो मैं एक बार अपने एक दोस्त के साथ साइकिल से 12 रबी-उल-अव्वल (अरबी महीना, इस दिन पैगंबर मोहम्मद का जन्म हुआ था और उनकी मृत्यु भी इसी दिन हुई थी) के दिन चौक आजम गया। यह लेह से 26 किलोमीटर दूर एक छोटी सी जगह है। वहां 12 रबी-उल-अव्वल का एक प्रोग्राम हो रहा था। इस यात्रा में एक और क्लासमेट भी शामिल हो गए। एक आगे बैठा और एक पीछे और मैं 12 साल की उम्र में दो लड़कों को साइकिल पर बिठा कर निकल पड़ा।

रास्ते में हम नहरों पर रुके, फल तोड़ कर खाए, बहुत मजा आया। इस तरह, मेरी पहली साइकिल यात्रा 52 किलोमीटर की थी, जिसमें आना और जाना शामिल था। इससे मुझे एक अजीब सा आनंद आया और कहते हैं न कि, 'जैसे पर लग जाते हैं' मुझे भी ऐसा ही लगा। उसके बाद मैंने घर वालों से छिप-छिप कर लेह से मुल्तान की यात्रा की, जो कि 150 या 160 किमी दूर था। उसके बाद मैं लेह से लाहौर भी गया जो दो दिन की यात्रा थी। हर एक यात्रा के बाद जब परिवार को पता चलता था तो मार भी पड़ती थी कि मैं पढ़ने के बजाय क्या कर रहा हूं। उसके बाद मैंने बताना ही बंद कर दिया। वो कहते थे कि आपको अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए, हम आप पर इतना पैसा खर्च कर रहे हैं और आप यह कर रहे हैं। सीधे हो जाओ नहीं तो, फिर दुकान पर ही बिठा देंगे।

अनिलः एक और रोचक जानकारी। कहा जाता है कि मध्य प्रदेश के रतलाम में मां दुर्गा के मंदिर में एक ऐसा अनोखा पत्थर है, जिसको बजाने पर घंटी की तरह आवाज निकलती है। इस पत्थर से निकलने वाली आवाजों के सुनकर लोग हैरत में पड़ जाते हैं। कई लोग इसे दैवीय चमत्कार भी मानते हैं। बता दें कि इस पत्थर पर किसी भी अन्य पत्थर के टकराने से धातु की तरह आवाज आती है।

रतलाम से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर बेरछा गांव के पास प्राचीन पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर अंबे माता के मंदिर के तौर पर जाना जाता है। इस पहाड़ी पर मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक अनोखा पत्थर भी है। इस पत्थर पर किसी अन्य पत्थर से पीटने पर धातु की तरह आवाज निकलती है। पत्थर से निकलने वाली ये आवाज घंटी की तरह सुनाई देती है, जिसे ग्रामीण चमत्कारी पत्थर मानते हैं।

बता दें कि इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। इस मंदिर को सबसे पहले एक ग्रामीण ने देखा था। उस समय यहां आने के लिए रास्ता भी नहीं था। बाद में ग्रामीणों के द्वारा यहां आने के लिये एक कच्चा सकरा रास्ता बनाया गया ताकि मंदिर तक आवश्यक पूजा व अन्य सामग्री ले जाई जा सके।

अब समय हो गया है पत्र शामिल करने का।

नीलमः पहला पत्र हमें भेजा है, खुर्जा यूपी से तिलक राज अरोड़ा ने। लिखते हैं सादर प्रणाम।

टी टाइम प्रोग्राम की जितनी भी प्रंशसा की जाए उतनी कम है। पिछला कार्यक्रम सुना और पसंद आया। कार्यक्रम में बिस्किट खाइए और 40 लाख रुपये सालाना कमाइए वाली जानकारी सुनकर बहुत मज़ा आया।

जीव विज्ञान के मुताबिक इंसान में होमो वंश की बहुत सारी प्रजातियां होती है इसी के अंतर्गत होपो सेपिन्यस के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी ज्ञानवर्धक लगी।

ऑपरेशन के समय डॉक्टर हरे या नीले रंग के कपड़े ही पहनते हैं वाली जानकारी की जितनी भी प्रंशसा की जाए उतनी ही कम है। वहीं कार्यक्रम में बृहस्पति ग्रह के बारे में जानकारी काबिले तारीफ लगी। जबकि फिल्मी गीत तुझे देखा तो जाना सनम भी बहुत ही शानदार लगा। साथ ह��� श्रोताओ के पत्र भी सुने और पसंद आये। कार्यक्रम में जोक्स ने भी दिल खोलकर हंसाया।

बेहतरीन कार्यक्रम शानदार प्रस्तुति में सुनवाने के लिये भाई अनिल पांडेय जी और बहन नीलम जी का दिल से शुक्रिया।

अरोड़ा, जी आपका भी बहुत-बहुत शुक्रिया, पत्र भेजने के लिए।

अनिलः अब पेश करते हैं अगला पत्र, जिसे भेजा है खंडवा मध्यप्रदेश से दुर्गेश नागनपुरे ने। लिखते हैं सादर नमस्कार, आदाब और शुभ संध्या। लिखते हैं मुझे आपके सभी कार्यक्रम बहुत ही मनभावन लगते हैं। हम प्रतिदिन आपके कार्यक्रमों को रेडियो पर तो सुनते ही हैं, साथ ही आपकी वेबसाइट पर भी जाकर आपके कार्यक्रमों को हमे बड़े इत्मिनान से सुनते हैं।

वहीं पिछले कार्यक्रम की बात करें तो उसमें स्कॉटलैंड की बिस्किट निर्माता कंपनी " बार्डर बिस्किट " के बारे में आपने यह बताया कि यह कंपनी लोगों को सिर्फ अपनी कंपनी के बिस्किट खाने के लिए नौकरी दे रही है , यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई , यदि मैं स्कॉटलैंड में रहता तो तुरंत ही इस ऑफर को लपकने की पूरी कोशिश करता।

कार्यक्रम टी टाइम में अन्य जानकारियां जैसे कि अस्पतालों में डाक्टर हरे या नीले रंग के कपड़ों का ही इस्तेमाल क्यों करते हैं को लेकर भी बहुत अच्छी जानकारी हासिल हुई। वहीं विज्ञान से जुड़ी जानकारी और ग्रहों के बारे में दी जाने वाली जानकारी बहुत ज्ञानवर्धक लगी।

वही सुरेश अग्रवाल जी द्वारा प्रेषित प्रेरक कहानी भी बहुत शिक्षाप्रद लगी ।

साथ ही मनोरंजन के खंड में हिन्दी गीत और आपके द्वारा पेश मजेदार चुटकुले बहुत ही आनंददायक लगे । धन्यवाद। साथ ही हमारी ओर से आप सभी को शरद पूर्णिमा के पावन पर्व की अनंत शुभकामनायें।

पत्र भेजने और तारीफ करने के लिए शुक्रिया। आपको भी शरद पूर्णिमा की शुभकामनाएं।

अनिलः अब पेश है पंतनगर, उत्तराखंड से वीरेंद्र मेहता का पत्र। लिखते हैं टी टाइम प्रोग्राम का नया अंक सुना - जिसमें सबसे पहले हमने स्कॉटलैंड की "बॉर्डर बिस्कुट" कंपनी द्वारा निकाली गई वैकेंसी के बारे में सुना खबर सचमुच रोचक लगी । और वहीं नीलम जी द्वारा संक्षिप्त में दी गई जानकारी कि इंसान से जुड़ी बहुत सारी प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और इसका कारण जलवायु परिवर्तन बताया गया, जानकारी आश्चर्यजनक थी । वहीं अस्पताल में लगे पर्दे व अस्पताल के सभी कर्मचारियों की ड्रेस के रंगों के पीछे का फैक्ट बताया गया, बहुत ज्ञानवर्धक थी । और जुपिटर से संबंधित दी गई जानकारी भी अच्छी लगी , जैसा कि हम सब जानते हैं कि हमारे सौरमंडल में नौ ग्रह हैं । जिनको एक लाइन में याद किया जा सकता है वह लाइन इस तरह से है -

My Very Educated Mother Just Served Us Nine Pizzas - Mercury, Venus, Earth, Mars, Jupiter, Saturn, Uranus, Neptune, and Pluto .

प्लूटो का साइज लगभग चंद्रमा के साइज का दो तिहाई के बराबर है व इसकी सूर्य से औसत दूरी लगभग 3.5 बिलियन मील है । सूर्य से इतन�� दूर होने के कारण इसका तापमान -226 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है । यहां पर नाइट्रोजन व मिथेन गैस जमी हुई होती है , इतनी ठंड के कारण । ग्रहों की परिभाषा में ना आने के कारण प्लूटो को 2006 में आइ.ए. यू (अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ) ने ग्रहों की सदस्यता से बाहर रख दिया क्योंकि यह बौने ग्रह में गिना जाता है । तो अब हमारे सौरमंडल में केवल 8 ग्रह ही आते हैं । धन्यवाद सुंदर प्रोग्राम की प्रस्तुति के लिए !!

वीरेंद्र जी ग्रहों के बारे में इतने अच्छे ढंग से समझाने के लिए आपका दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। धन्यवाद।

नीलमः अब पेश करते हैं केसिंगा उड़ीसा से हमारे पुराने श्रोता सुरेश अग्रवाल का पत्र।

लिखते हैं, 22 अक्तूबर का "टी टाइम" भी चाव से सुना एवं तमाम जानकारी को अत्यंत महत्वपूर्ण पाया। स्कॉटलैंड की बिस्किट निर्माता कंपनी 'बॉर्डर बिस्किट' द्वारा 'मास्टर बिस्किटर' के लिये मांगे गये आवेदन की शर्तें काफी आकर्षक लगीं। यदि कम्पनी भारत में होती, तो मैं भी अवश्य आवेदन कर अपनी किस्मत आज़माइश करता। जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से बदले तापमान के कारण प्रजातियों की विलुप्त होने की कहानी एक वास्तविकता है। अफ़सोस तो इस बात का है कि इन्सान सब कुछ जानते हुये भी प्रकृति से खिलवाड़ कर अपने पैरों स्वयं कुल्हाड़ी मार रहा है।

अस्पतालों में डॉक्टरों द्वारा हमेशा हरे या नीले रंग का कपड़ा पहनने का रहस्य समझाने का भी शुक्रिया। हमारे सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति अथवा गुरू पर दी गयी जानकारी भी काफी ज्ञानवर्धक लगी। विज्ञान भले ही इसकी व्याख्या गैसों के पिण्ड के रूप करता हो, हम भारतीय तो बृहस्पति की एक देवता के रूप में पूजा करते आये हैं एवं यह हमारी आस्था का प्रतीक है।

आज के अंक में भी मुझ द्वारा प्रेषित प्रेरक कहानी को कार्यक्रम का हिस्सा बनाये जाने पर तहेदिल से आभार।

कार्यक्रम में पेश श्रोता-मित्रों की प्रतिक्रियाएं एवं तीनों जोक्स दिलकश लगे। धन्यवाद फिर एक बेहतरीन प्रस्तुति के लिये। सुरेश जी लगातार हमसे जुड़े रहने और पत्र भेजने के लिए धन्यवाद।

अनिलः अब पेश है आज के प्रोग्राम का आखिरी खत, जिसे भेजा है दरभंगा बिहार से शंकर प्रसाद शंभू ने।

लिखते हैं, पिछला "टी टाईम" ध्यान से सुना, जिसमें बताया गया कि स्कॉटलैंड की बिस्किट निर्माता कंपनी *बॉर्डर बिस्किट* ने 'मास्टर बिस्किटर' यानि अनुभवी बिस्किट टेस्ट करने वाला व्यक्ति को नौकरी का ऑफर दिया है, अरे वाह ! केवल बिस्किट खाने के लिए नौकरी का ऑफर, कमाल की नौकरी है। यह रोचक जानकारी बहुत अच्छी लगी।

वहीं होमो वंश में इंसान की बहुत सारी प्रजातियां विलुप्त होने वाली बात सूचनाप्रद लगी और ज्ञात हुआ कि अब होमो वंश की केवल 'होमो सेपियन्स' प्रजाति ही बची है।

जानकारियों का सिलसिला जारी रखते हुए बताया गया कि हमारी आंखें हरा या नीला रंग ही सबसे अच्छी तरह देख सकती हैं और ये रंग आंखों को आराम देते हैं। इसलिए वर्ष 1914 में एक प्रभावशाली डॉक्टर ने सफेद रंग के पारंपरिक ड्रेस को हरे रंग में बदल दिया।

इसके साथ ही सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति का विश्लेषण किया गया, जिससे हमें ज्ञात हुआ कि बृहस्पति ग्रह पर एक दिन मात्र 9 घंटे और 55 मिनट का ही होता है। इतना ही नहीं पृथ्वी के 11.9 वर्ष के बराबर बृहस्पति ग्रह का 1 वर्ष होता है। गैसों के समूह वाला बृहस्पति ग्रह का अपना शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल है और इसी वजह से इसे सौरमंडल का 'वैक्यूम क्लीनर' भी कहा जाता है।

कालीदास और मां सरस्वती की संवाद रूपी कहानी शिक्षाप्रद लगी। वास्तव में घमंड बुद्धि को क्षीण कर देता है, इसलिए कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए। धन्यवाद शंभू जी।

इसी के साथ आज के प्रोग्राम में श्रोताओं की टिप्पणी यही संपन्न होती है।

अब वक्त हो गया है जोक्स यानी हंसगुल्लों का। जो हमें दुर्गेश नागनपुरे ने भेजे हैं।

पहला जोक

पत्नी पति से: तुम तो कहते थे कि शादी के बाद भी मुझे खूब प्यार करोगे?

पति: सॉरी यार! मुझे क्या पता था कि तुम्हारी शादी मेरे साथ हो जाएगी!

दूसरा जोक

पति- सुतली बम है क्या??

पत्नी- दिवाली खत्म हो गयी अब सुतली बम क्यों चाहिये??

पति- तुम्हारे मायके से आया तिल का लड्डू फोडना है..!!

तीसरा जोक

बच्चा : पापा आपने मम्मी में ऐसा क्या देखा जो शादी कर ली ?

पापा : उसके गाल का चोट सा तिल

बच्चा : कमाल है !!! इतनी सी छोटी चीज के लिए इतनी बड़ी मुसीबत मोल ले ली

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