24 सितंबर 2020

2020-09-24 17:18:58
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अनिलः दोस्तो, सड़क के किनारे लगे पेड़ों पर आपने अकसर देखा होगा कि जड़ों के ऊपर सफेद और लाल रंग से पेंट किया होता है। पेड़ों के निचले हिस्से में पेंट करने का यह तरीका काफी पुराना है। लेकिन क्या कभी आपने इसके बारे में सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? दरअसल, इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं, जिसके बारे में शायद ही आप जानते होंगे।

पेड़ों के निचले हिस्से में पेंट करने का यह तरीका काफी पुराना है। दरअसल, इसके पीछे यही उद्येश्य होता है कि हरे-भरे पेड़ों को और ज्यादा मजबूती देना। आपने ये देखा होगा कि पेड़ों में दरारें आ जाती हैं और उनकी छाल निकलने लगती है, जिसकी वजह से पेड़ कमजोर होने लगते हैं। ऐसे में उन्हें मजबूत करने के लिए पेंट कर दिया जाता है। पेंट करने से पेड़ों की उम्र भी बढ़ जाती है।

इसके साथ ही पेड़ों को पेंट करने के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि उनमें दीमक या कीड़े नहीं लगते हैं। क्योंकि ये कीड़े किसी भी पेड़ को अंदर से खोखला कर देते हैं, लेकिन पेंट करने की वजह से पेड़ों में कीड़े नहीं लगते हैं। पेड़ों को पेंट करने से उन्हें कीड़ों से भी सुरक्षा मिलती है।

नीलमः बताया जाता है कि पेड़ों को पेंट करने से उनकी सुरक्षा में भी सुधार होता है। यह इस बात का संकेत होता है कि वो पेड़ वन विभाग की नजर में हैं और उनकी कटाई नहीं की जा सकती है। कुछ जगहों पर पेड़ों को रंगने के लिए केवल सफेद पेंट का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन कई जगहों पर लाल और नीले रंगों का भी उपयोग किया जाता है।

राष्ट्रीय राजमार्ग की सड़क के किनारे लगे पेड़ों को भी सफेद रंग से रंगा जाता है, ताकि रात के अंधेरे में भी ये पेड़ अपनी चमक के कारण आसानी से देखे जा सकते हैं।

अनिलः अब अगली जानकारी। हमने कई तरह के म्यूजियम के बारे में सुना और देखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी चॉकलेट म्यूजियम के बारे में सुना है। जी हां, चॉकलेट प्रेमियों के लिए खुशखबरी है कि चॉकलेट का भी म्यूजियम खुल गया है। इस अनोखे म्यूजियम की शुरुआत 13 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख शहर में हुई है।

65,000 वर्ग फीट के क्षेत्रफल में फैले इस म्यूजियम का नाम लिंट होम ऑफ चॉकलेट है। इस अनोखे म्यूजियम के अंदर जाते ही हर चीज चॉकलेट से बनी नजर आएगी। इतना ही नहीं, इस म्यूजियम में 30 फीट की ऊंचाई वाला फाउंटेन भी है, जिसे आकर्षण का प्रमुख केंद्र माना जा रहा है। यह म्यूजियम अपने आप में अनूठा है। इसमें दुनिया की सबसे बड़ी लिंट चॉकलेट शॉप भी है, जिसका उद्घाटन दुनिया के महान टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर ने किया है।

दुनियाभर में ज्यूरिख शहर को चॉकलेट की राजधानी कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस शहर में उत्पादित होने वाला चॉकलेट सबसे बेहतर क्वालिटी और टेस्ट वाली होती है। स्विस चॉकलेट मेकिंग का इतिहास जानने के लिए यह म्यूजियम एकदम परफेक्ट जगह है।

नीलमः इस अनोखे म्यूजियम में आने वाले विजिटर्स अपने साथ कुछ गिफ्ट भी घर ले जा सकते हैं। इसके साथ ही यहां मौजूद चॉकलेटेरिया में लोगों को खुद अपने हाथ से चॉकलेट बनाने का मौका मिलेगा। इस म्यूजियम में कोको बीन्स के उत्पादन की शुरुआत, शुरुआती चॉकलेट उत्पादन का इतिहास और इसकी समूची सांस्कृतिक विरासत के इतिहास की झलक भी देखने को मिलेगी।

'लिंट होम ऑफ चॉकलेट' में कैफेटेरिया की तर्ज पर चॉकलेटेरिया भी होगा, जहां कॉफी की तरह लोग अपने पसंद की चॉकलेट बनाकर स्वाद ले सकेंगे।

अनिलः हमारे श्रोता सुरेश अग्रवाल जी ने दिल को छू लेने वाली एक स्टोरी भेजी है..

आप भी सुनिए।

परम सिध्द सन्त रामदास जी जब प्रार्थना करते थे तो कभी उनके होंठ नही हिलते थे !

शिष्यों ने पूछा - हम प्रार्थना करते हैं, तो होंठ हिलते हैं।

आपके होंठ नहीं हिलते ? आप पत्थर की मूर्ति की तरह खडे़ हो जाते हैं। आप कहते क्या है अन्दर से ?

क्योंकि अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे, तो होंठो पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है। चहेरे पर बोलने का भाव आ जाता है।लेकिन वह भाव भी नहीं आता !

सन्त रामदास जी ने कहा - मैं एक बार राजधानी से गुजरा और राजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खडे़ देखा, और एक भिखारी को भी खडे़ देखा !

वह भिखारी बस खड़ा था। फटे--चीथडे़ थे शरीर पर। जीर्ण - जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनो से भोजन न मिला हो !

शरीर सूख कर कांटा हो गया। बस आंखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थी। बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो !

वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था। लगता था अब गिरा -तब गिरा !

सम्राट उससे बोला - बोलो क्या चाहते हो

उस भिखारी ने कहा - अगर मेरे आपके द्वार पर खडे़ होने से, मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं !

क्या कहना है और ? मै द्वार पर खड़ा हूं, मुझे देख लो। मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है। "

सन्त रामदास जी ने कहा -उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी। मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूं। वह देख लेगें । मैं क्या कहूं

*अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे *

*अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते, तो मेरे शब्दों को क्या समझेंगे*

*अतः भाव व दृढ विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है यहाँ कुछ मांगना शेष नही रहता ! आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है।

नीलमः अब समय हो गया है एक और जानकारी का। आयरलैंड के डबलिन में एक नौकरी के लिए दुनियाभर से 50 हजार आवेदन आए थे। इस नौकरी के लिए एक स्थानीय कपल को चुना जाता है और कहा जाता है कि आपने हजारों आवेदकों को हराकर इस नौकरी को जीता है। बता दें कि इस नौकरी के लिए केयर टेकर के रूप में आयरलैंड के एक सुनसान टापू 'ग्रेट ब्लास्केट आइलैंड' पर भेजा जाता है।

सबसे मजेदार बात ये है कि इस सुनसान टापू पर ना ही बिजली है, ना ही इंटरनेट है और ना ही कोई आधुनिक सुविधा है। लेकिन खाने-पीने और रहने के लिए बहुत ही उत्तम व्यवस्था है। इस टापू पर रहना एक तरह से स्वर्ग के समान है। इस अनोखी नौकरी के लिए एक कपल ने अपनी वर्तमान नौकरी छोड़ दी और घर भी बेच दिया। हाल ही में इस कपल ने नौकरी की दास्तान शेयर की है।

दरअसल, एनी बर्नी और इयोन बॉयल को वेलेंटाइन-डे के दिन कॉल आया कि आप विजेता बन गए हैं और आपको ये नौकरी दी जाती है। इस नौकरी को आपको मार्च में ज्वाइन करना है। कपल ने कहा कि उन्हें ये पता नहीं था दुनिया से कटे इस टापू पर आधुनिक सुविधा के बिना कैसे जीवन संभव होगा। कपल ने इसके लिए अपनी वर्तमान नौकरी छोड़ दिया था और घर भी बेच दिया था, लेकिन इसी बीच लॉकडाउन हो गया। ऐसे में जून में इस आइलैंड पर जाना संभव हुआ।

अनिलः इस नौकरी के लिए आए विज्ञापन में बताया गया था कि आइलैंड पर बगैर बिजली और इंटरनेट के फुल टाइम रहना है। बर्नी और बॉयल इस विज्ञापन को पढ़कर नई लाइफ के सपने देखने लगे कि कितना अच्छा होगा, जब बिजी लाइफ ना हो और ना ही कोई भगदौड़ हो। बिना टेंशन के दिन में काम करो, खाओ-पियो और आराम करो। जून के अंत में इन्हें आइलैंड पर आने का मौका मिला। बर्नी और बॉयल को यहां तीन कॉटेज का ध्यान रखना होता है। सुबह 9 बजे दिन शुरू होता है, जिसमें गेस्ट के लिए कॉटेज तैयार करना, सफाई के बाद भोजन का प्रबंध करना आदि काम शामिल हैं

बॉयल ने बताया कि इस सुनसान टापू पर रहने का मतलब है कि आधुनिक सुविधाओं से दूर रहना। बिना फ्रिज के भोजन रखना, बिना बिजली के घर का काम करना। ना ही टीवी है और ना ही इंटरनेट है। बॉयल ने बताया कि इन सब कामों में जीवन का अलग ही आनंद है। इस आइलैंड पर छोटी-छोटी चीजों के महत्व के बारे में पता चला। बता दें कि ये कपल इस आइलैंड पर सितंबर के अंत तक रहने वाला है।

इसी जानकारी के साथ संपन्न होता है आज के प्रोग्राम में जानकारी देने का सिलसिला।

अब बारी है श्रोताओं के पत्रों की।

नीलमः पहला पत्र हमें भेजा है, पंतनगर उत्तराखंड से वीरेंद्र मेहता ने। लिखते हैं,

नमस्कार , नी हाउ -

पिछले दो हफ्तों से ही सी आर आई की वेबसाइट ठीक से चल नहीं रही थी , इसमें अपलोड किए गए प्रोग्राम रुक-रुक के या ना के बराबर चल रहे थे । जिससे मैं प्रोग्राम को ठीक से सुन नहीं पाया और श्रोता बंधुओं के पत्र से ही जाना पिछले प्रोग्रामों के बारे में । पर फिलहाल सी आर आई की वेबसाइट अच्छी चल रही है। टी टाइम प्रोग्राम का नया अंक सुना, जिसमें एस्टोनिया देश के बारे में जाना जहां पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट व सन 2000 से यहां के देश में इंटरनेट की सेवा सभी स्कूलों व कॉलेजों में फ्री है जानकारी अच्छी लगी । पर भारत में तो कुछ स्कूलों व कॉलेजों तक इंटरनेट की सुविधा पहुंची भी नहीं है । यही नहीं छोटे-छोटे शहर या गांव में तो इंटरनेट ठीक से चलता भी नहीं , आज भी गांव में नेटवर्क को सर्च करने के लिए , इंटरनेट चलाने या बात करने के लिए घर से बाहर खुली जगह पर जाना पड़ता है । वही नीलम जी द्वारा चीन में स्थित अजीबो गरीब साइलेंट रेस्टोरेंट के बारे में बताया गया जहां लोग बोल कर नहीं बल्कि इशारों में खाने का आर्डर करते हैं पर मन में एक जिज्ञासा हुई क्या खाते वक्त भी यहां लोग बात नहीं करते होंगे ।अगर ऐसा हो तो सचमुच लोग यहां पर खाने का तो भरपूर आनंद लेते ही होंगे । और शुक्र ग्रहपर दी गई जानकारीअच्छी लगी वही पुणे की रहने वाली मेघा बाफना के बारे में बताया गया जानकारी बेहद प्रेरणादायक लगी । जिन्होंने साल 2017 में अपने सलाद का बिजनेस शुरू किया । सुंदर प्रोग्राम की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद !!

वीरेंद्र पत्र भेजने के लिए शुक्रिया।

अनिलः अब पेश है खुर्जा यूपी से तिलक राज अरोड़ा का पत्र। लिखते हैं भाई अनिल पांडेय जी बहन नीलम जी, सप्रेम नमस्ते। कार्यक्रम टी टाइम 17 सितंबर का सुनकर दिल खुशी से झूम उठा। कार्यक्रम में सुनवायी जानकारियां बहुत ही पसंद आयी।

यूरोप के एस्टोनिया में इंटरनेट सबसे तेज और मुफ्त चलता है और इसी शहर से संबंधित अन्य जानकारियां सुनी, वाकई अच्छी लगी।

चीन के एक शहर क्वांगचों में एक रेस्टोरेंट ऐसा भी है जहाँ पर बोल कर नही बल्कि इशारों में खाने का ऑर्डर देना पड़ता है। सचमुच यह रेस्टोरेंट शांति प्रिय लोगों के लिये बहुत ही सुंदर रेस्टोरेंट है जहाँ आराम से शांति पूर्वक खा सकते हैं। इस जानकारी की जितनी भी प्रंशसा की जाये उतनी ही कम है।

जबकि पुणे की रहने वाली मेघा बाफना ने सलाद को बेच कर अच्छा मुनाफा कमाया वाली जानकारी तारीफ योग्य है। हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि मेघा बाफना अपने इस व्यवसाय से इतनी ज्यादा सफलता प्राप्त करें कि पूरे भारत में उनका नाम हो। शुक्र ग्रह के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी भी सराहनीय योग्य लगी।

फिल्मी गीत दीदी तेरा देवर दीवाना भी सुना और पसंद आया।

कार्यक्रम में श्रोताओं के पत्र भी तारीफ योग्य लगे।

कार्यक्रम में चुटकलों ने दिल खोल कर हंसाया।

बेहतरीन कार्यक्रम टी टाइम सुनवाने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।

अरोड़ा जी पत्र भेजने के लिए शुक्रिया।

नीलमः अब बारी है केसिंगा उड़ीसा से सुरेश अग्रवाल के पत्र की। लिखते हैं पिछला "टी टाइम" अंक सुना, जो कि हर बार की तरह महत्वपूर्ण एवं दिलचस्प जानकारियों से लबरेज़ था।भारत में इंटरनेट की वास्तविक स्थिति पर दी गयी जानकारी अत्यंत सूचनाप्रद लगी, जिसे सुन कर हमारा यह भ्रम भी टूट गया कि यहाँ इंटरनेट विश्व में सबसे सस्ता है। 'काश' हमारा देश भी एस्टोनिया जैसा आदर्श स्थापित कर पाता !

चीन के कंवांगचो में स्थित अजीबोगरीब साइलेंट कैफे के बारे में जान कर तो और भी हैरानी हुई। भला इशारों की भाषा में भी कोई ऑर्डर लिखवाता है ? इसमें चीनी-भाषा न जानने वालों की तो शामत ही आ जाती होगी, और फिर किसी मुझ जैसे शाकाहारी का इशारा वेटर के समझ उल्टा आ गया, तो क्या होगा ? हाँ, राहत की बात यह लगी कि ग्राहक चाहे तो कैफ़े में लिख कर भी अपना ऑर्डर दे सकता है। वैसे सीआरआई के कार्यक्रम सुन कर हमने जाना है कि क्वांगचो में तो बड़ी तादाद में भारतीय कारोबारी रहते हैं।

वहीं पुणे की रहने वाली मेघा बाफना द्वारा साल 2017 में शुरू किये गये सलाद के अपने छोटे से बिजनेस से आज के समय में उनके एक बिजनेस वुमेन बनने तक की कहानी ने हमें काफी प्रेरित किया। किसी ने सच कहा है कि -सच्ची लगन हो तो इन्सान क्या नहीं कर सकता।

जानकारियों के क्रम में वैज्ञानिकों द्वारा शुक्र ग्रह पर जीवन की संभावना जताए जाने पर विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि न केवल शुक्र, अपितु अब तक जिन अन्य ग्रहों पर भी जीवन होने की बात कही गयी है, उसे साबित नहीं किया जा सका है। अतः यह वैज्ञानिकों का एक अनुमान मात्र है।

आज के कार्यक्रम में श्रोताओं की मात्र तीन प्रतिक्रियाएं देख कर निराशा हुई। हां, आज के अंक में पेश तीनों जोक्स उम्दा लगे। आपकी श्रमसाध्य प्रस्तुति के लिये हार्दिक साधुवाद।

सुरेश जी पत्र भेजने के लिए धन्यवाद।

अनिलः अब पेश है आज के प्रोग्राम का आखिरी पत्र, जिसे भेजा है खंड्वा मध्य प्रदेश से दुर्गेश नागनपुरे ने। लिखते हैं कि आपका शुक्रिया कि आपने कार्यक्रम टी टाइम में एक से बढ़कर एक रोचक और शानदार जानकारियां हम सभी श्रोताओ तक पहुंचाई। इसके लिए आपका शुक्रिया।

वहीं लिखते हैं कि हमें कार्यक्रम में इंटरनेट संबंधी जानकारी , चीन के कंवांगचो में स्थित साइलेंट कैफे नामक अजीबोगरीब रेस्टोरेंट के बारे में दी गई रोचक जानकारी , पुणे की रहने वाली बिजनेस वूमेन के नाम से मशहूर मेघा बाफना जी के बारे में दी गई जानकारी बहुत अच्छी लगी। साथ ही शुक्र ग्रह के बारे में जानकर भी बहुत अच्छा लगा। कुल मिलाकर कार्यक्रम टी टाइम में प्रस्तुत जानकारियां बेहद उम्दा लगी ।

दुर्गेश जी टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

इसी के साथ प्रोग्राम में टिप्पणी यही समाप्त होती हैं।

अब बारी जोक्स यानी हंसगुल्लों की।

पहला जोक

भाषा का फर्क देखिए

अगर पत्नी को हिंदी में कहो कि तुम हत्यारिन लग रही हो तो दो दिन तक खाना नहीं मिलेगा। लेकिन अगर आपने उर्दू में कहा कि कातिल लग रही तो शाम की चाय भी पकोड़ों के साथ मिलेगी। और अगर आपने इंग्लिश में कह दिया कि बेबी यू आर लुकिंग किलर तो डिनर भी आपका पसंद का ही बनेगा।

दूसरा जोक

मैरिज ब्यूरो वाला लड़की से–मैडम यह लड़का बहुत

अच्छा कमाता है, लेकिन थोड़ा काला है

लड़की–भाई साहब इसी क्वालिटी में,

थोड़ा दूसरे कलर में दिखाइए ना।

तीसरा जोक

लड़की : तुम्हारा शैक्षिक स्तर क्या है ? हिंदी में बताओ।

लड़का : नेत्र चाय नेत्र।

लड़की : अब, ये क्या है ?

लड़का : आई टी आई!!

लड़की कोमा में!!

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