20170926

2017-09-27 10:01:16
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हैया- दोस्तो, आज के हमारे विशेष सेगमेंट में आपको बताने जा रहे हैं चीन में कृषि विज्ञान तकनीक योजना के बारे में

अखिल- दोस्तो, कृषि क्षेत्र में चीन की विज्ञान तकनीक योजना का नाम चिनगारी परियोजना है। इस योजना के लिए चिनगारी शब्द के प्रयोग से चीन ने यह उम्मीद जाहिर है कि कृषि क्षेत्र में विज्ञान व तकनीक चिनगारी की भांति देश भर में फैल कर रौशन करेगा। चिनगारी परियोजना वर्ष 1986 में शुरू हुई, जिस का लक्ष्य है कि कृषि उत्पादन को लाभ पहुंचाने वाले विज्ञान व तकनीकों का विकास किया जाएगा। इन तकनीकों को ग्रामीण क्षेत्रों में लोकप्रिय किया जाएगा, करोड़ों किसानों को विज्ञान तकनीक के सहारे ग्रामीण अर्थतंत्र को बढ़ाने में मार्गदर्शन दिया जाएगा, ग्रामीण उद्योगों की वैज्ञानिक तकनीकी प्रगति उन्नत की जाएगी, किसानों की सकल गुणवत्ता उन्नत की जाएगी तथा कृषि व ग्रामीण अर्थतंत्र के निरंतर, तेज व स्वस्थ विकास को गति दिया जाएगा।

चिनगारी परियोजना को अमल में लाए हुए दसेक साल गुजर चुके हैं,। इसके दौरान चीनी वैज्ञानिकों ने उच्च पैमाने पर कृषि  विज्ञान व तकनीकों का विकास किया, उच्च पैदावार वाली फसल,  बढिया व अच्छा लाभ देने वाले कृषि उपजों का विकास किया, ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सेवा व्यवस्था के निर्माण और निश्चित पैमाने वाली अर्थव्यवस्था के विकास को बढ़ावा दिया, बहुत से ऐसे मिसाली कारोबार स्थापित किए, जिनमें समुन्नत व उपयोगी तकनीकों व कृषि संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। ग्रामीण उद्योगों व ग्रामीण व कस्बाई उद्योगों के उत्पाद ढांचे में फेरबदल के लिए मार्गदर्शक मिसाल खड़ी कर दी, बड़ी संख्या में ग्रामीण तकनीशियन, प्रबंधक और किसान उद्यमी प्रशिक्षित किए।

चिनगारी परियोजना के तहत विभिन्न वैज्ञानिक तकनीकी मुद्दों को मूर्त रूप दिए जाने के परिणामस्वरूप ग्रामीण कृषि व्यवसायीकरण, बड़े पैमाने वाले आधुनिक उत्पादन के विकास को गति मिली। इसके परिणामस्वरूप किसानों की आमदनी बढ़ी, किसानों में विज्ञान तकनीक के बल पर संपत्ति बढ़ाने की चेतना बढ़ गई, उसे व्यापक किसानों से समर्थन व स्वागत मिला। विदेशी मित्रों ने  चिनगारी परियोजना को चीनी किसानों की समृद्धि संवर्द्धन योजना करार दी है।

हैया- अब बात करते हैं उच्च व नव तकनीकी उपलब्धि प्रसार योजना के बारे में

अखिल- दोस्तों, चीन की उच्च व नव तकनीकी उपलब्धि प्रसार योजना का नाम मशाल परियोजना है। मशाल परियोजना देश में उच्च व नव तकनीकों से जुड़े उद्योगों के विकास को निर्देशन देने वाली योजना है। इस परियोजना का लक्ष्य, चीन की अपनी विज्ञान तकनीक श्रेष्ठता व निहित शक्ति को विकसित करते हुए बाजार की मांग के अनुसार उच्च व नव तकनीकों की उपलब्धियों को तिजारती माल का रूप देना, उच्च व नव तकनीकों का औद्योगिकीकरण तथा उन का अन्तरराष्ट्रीकरण करना है। यह योजना वर्ष 1988 में शुरू किया गया। इस योजना के अन्तर्गत विकास के प्रमुख क्षेत्र में इलेक्ट्रोनिक व सूचना, जैविक तकनीक, नई सामग्री, ऑपेटिक विद्युत मशीनरी का एकीकरण, नई किस्मों के ऊर्जा, उच्च क्षमता व कम ऊर्जा खपत वाला उत्पाद तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे शामिल हैं।

वर्तमान में चीन के विभिन्न स्थानों में राष्ट्रीय स्तर के दर्जनों उच्च व नव तकनीक विकास क्षेत्र कायम हुए हैं। वर्ष 1991 से अब तक इन विकास क्षेत्रों का मुख्य आर्थिक सूचकांक बराबर 40 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ता जा रहा है। वे चीन में उच्च व नव तकनीकों के विकास तथा राष्ट्रीय आर्थिक ढांचे को बेहतर बनाने वाली अहम शक्ति बन गए हैं।

हैया- चलिए, अब बताते हैं चीन की समानव अंतरिक्ष योजना के बारे में

अखिल- दोस्तों, चीन की समानव अंतरिक्ष यात्रा परियोजना वर्ष 1992 में शुरू हई थी। उसके विकास के तीन चरण तय हुए, पहले चरण में चीनी अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में यात्रा के लिए भेजे जाए। दूसरे चरण में अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यानों को जोड़ने की तकनीकों का समाधान किया जाए व अंतरिक्ष में अल्पकालीन अंतरिक्ष प्रयोगशाला स्थापित किया जाए, जिस में मानव सवार हो  और तीसरे चरण में दीर्घकालीन समानव अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किया जाए और बड़े पैमाने वाले अंतरिक्ष में वैज्ञानिक परीक्षण व प्रयोगी तकनीकों के सवाल को हल किया जाए।  

वर्ष 1999 के अंत में चीन ने सफलतापूर्वक अंतरिक्ष यात्री को ले जाने वाला अपना प्रथम समानव अंतरिक्ष यान --शनचो नम्बर एक छोड़ा और उसे धरती पर वापस लाया। इसके उपरांत चीन ने लगातार तीन बार ऐसी अंतरिक्ष उड़्ड़ान भरी। इस के आधार पर 15 अक्तूबर 2003 को चीन ने स्वनिर्मित प्रथम समानव अंतरिक्ष यान --शनचो नम्बर पांच अंतरिक्ष में छोड़ा, यांग लीवी चीन का प्रथम अंतरिक्ष यात्री बन गया। शनचो नम्बर पांच की सफल यात्रा से यह सिद्ध हुआ है कि चीन रूस और अमरीका के बाद विश्व का तीसरा ऐसा देश हो गया, जो अपनी शक्ति पर स्वतंत्र रूप से समानव अंतरिक्ष यात्रा करने में सक्षम है।

इसके बाद चीन ने क्रमशः 5 बार शनचो श्रृंखला अंतरिक्षयानों का सफल प्रक्षेपण किया है। इसी दौरान अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष यान के बाहर जाने, अंतरिक्ष में यात्रा करने, दो महिला अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में पहुंचाने और अंतरिक्ष में शिक्षा देना जैसे कार्रवाई सफलतापूर्वक पूरी की है।

इसके अलावा चीनी अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण कार्य भी सुव्यवस्तित रुप से आगे चल रहा है। 29 सितम्बर 2011 को च्यो छ्वान उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र में प्रथम चीनी एयरक्राफ्ट और थ्यानकोंग नम्बर एक नामक अंतरिक्ष प्रयोगशाला का प्रक्षेपण किया गया। एयरक्राफ्ट की लम्बाई 10.4 मीटर है और सबसे बड़ा व्यास 3.35 मीटर है। इसके सफल प्रक्षेपण से जाहिर हुआ है कि चीनी अंतरिक्ष विकास दूसरे चरण में प्रवेश हो चुका है। नवम्बर 2011, जून 2012, जून 2013 में चीन द्वारा प्रक्षेपण किए गए शनचो नम्बर 8, शनचो नम्बर 9, शनचो नम्बर 10 अंतरिक्षयान और थ्यानकोंग नम्बर एक के बीच जोड़ा गया।

थ्यानकोंग नम्बर एक के सफल प्रक्षेपण से जाहिर है कि चीन के पास अंतरिक्ष स्टेशन का बुनियादी तौर पर निर्माण करने और अंतरिक्ष स्टेशन की अस्थाई देखभाल करने की क्षमता आ चुकी है। 2015 के पूर्व चीन लगातार थ्यानकोंग नम्बर दो, थ्यानकोंग नम्बर तीन दो अंतरिक्ष प्रयोगशालाओं का प्रक्षेपण करेगा। योजनानुसार चीन का वास्तविक समानव अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण 2020 तक पूरा होगा।

हैया- चीन की चंद्रमा सर्वेक्षण परियोजना के बारे में जानकारी देते हैं...

अखिल- दोस्तों, चीन की चंद्रमा सर्वेक्षण परियोजना तीन चरणों में होगी। पहले चरण में चंद्रमा का परिक्रमा करने वाला सर्वेक्षण उपग्रह छोड़ा जाएगा। दूसरे चरण में चंद्रमा सर्वेक्षण यान चंद्रमा पर उतारा जाएगा और चंद्रमा की सतह का सर्वेक्षण किया जाएगा। तीसरे चरण में चंद्रमा की सतह के सर्वेक्षण और भू नमूना लेने के बाद सर्वेक्षण यान वापस धरती पर लौटाया जाएगा। 

चीन की चंद्रमा परिक्रमा परियोजना का काम वर्ष 2004 की जनवरी में शुरू हुआ, जिसे“छांग अ”परियोजना का नाम दिया गया है। छांग अ परियोजना तीन चरणों में बंटा हुआ है, यानी बिना मानव के चंद्रमा सर्वेक्षण, समानव चंद्रमा की यात्रा और चंद्रमा अड्डा की स्थापना है। छांग अ नम्बर एक और छांग अ नम्बर दो का सफल प्रक्षेपण क्रमशः 24 अक्तूबर 2007 और 1 अक्तूबर 2010 को किया गया। 2013 के उत्तरार्द्ध में छांग अ नम्बर तीन का भी सफल प्रक्षेपण किया गया।

हैया- तो दोस्तों, तो दोस्तों, ये था हमारा विशेष सेगमेंट। चलिए... अभी हम आपको मिलवाते हैं एक चीनी प्रोफेसर ल्यू शूश्योंग से, जो पेइचिंग विश्वविद्यालय में ऊर्दू विभाग के प्रमुख हैं।

(INTERVIEW)

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