सूचना:चाइना मीडिया ग्रुप में भर्ती

04 अगस्त 2019

2019-08-04 21:31:08
शेयर
शेयर Close
Messenger Messenger Pinterest LinkedIn


पेइचिंग में शिनच्यांग के गैर-भौतिक सांस्कृतिक विरासतों का प्रदर्शन

शिनच्यांग वेवुर स्वायत्त प्रदेश चीन के पश्चिमोत्तर में स्थित है, जहां कई जातियां बसी हुई हैं और विविधतापूर्ण संस्कृतियां हैं। हाल में शिनच्यांग के कुछ गैर-भौतिक सांस्कृतिक विरासतों की प्रदर्शनी चीनी राज्य परिषद के सूचना कार्यालय के न्यूज़ ब्रीफिंग हॉल में आयोजित हुई, जिससे शिनच्यांग की रंगबिरंगी जातीय संस्कृतियों को दर्शाया गया।

बलिमति नुज़कली अपने गुरु के साथ महाकाव्य“मानस”गाते हुए

बलिमति नुज़कली अपने गुरु के साथ महाकाव्य“मानस”गाते हुए

महाकाव्य“मानस”शिनच्यांग में किरगिज़ जाति का लोक साहित्य है, जिसमें बहादुर मानस और उसकी सात पीढ़ी संतानों के किरगिज़ प्रजा को लेकर बाहरी आक्रमणकारी दुश्मनों और शक्तियों के साथ संघर्ष की कहानी सुनाई जाती है। किरगिज़ जाति का महाकाव्य“मानस”, तिब्बती जाति का महाकाव्य“केसार”और मंगोलिया जाति का महाकाव्य“बंगेल”चीनी अल्पसंख्यक जातियों के सुप्रसिद्ध तीन महाकाव्य हैं। साल 2006 में महाकाव्य“मानस”को चीनी राष्ट्रीय गैर-भौतिक सांस्कृतिक विरासतों की सूची में शामिल किया गया। मौजूदा प्रदर्शनी में शिनच्यांग के किज़िल्सू किरगिज़ स्वायत्त प्रिफेक्चर की ऊछ्या कांउटी में बलिमति नुज़कली ने अपने गुरु के साथ महाकाव्य मानस का कुछ भाग गाकर सुनाया। वर्तमान में बलिमति नुज़कली मीडिल स्कूल में पढ़ता है, लेकिन वह अपने गुरु से तीन साल में महाकाव्य मानस का गायन सीख चुका है। उसने कहा कि अपनी जातीय संस्कृति को विरासत में लेते हुए आगे विकास करना चाहता है। इस तरह उसे जरूर अच्छी तरह सीखना चाहिए। बलिमति नुज़कली ने कहा:“एक बार कांउटी में दस हज़ार व्यक्तियों की भागीदारी वाला मानस सम्मेलन आयोजित हुआ। उस समय से ही मुझे इसकी रुचि हुई और सीखने लगा। मैं जरूर अच्छी तरह से सीखूंगा, ताकि हमारे मानस को विरासत के रुप में आगे विकास किया जा सके।”

शिनच्यांग राष्ट्रीय पेंटिंग इंस्टीट्यूट के महासचिव वेइ पाओशान चित्रित करते हुए

शिनच्यांग राष्ट्रीय पेंटिंग इंस्टीट्यूट के महासचिव वेइ पाओशान चित्रित करते हुए

वेवुर जाति के सांगफी काग़ज़ स्थानीय शहतूत पेड़ की छाल से बनाया गया एक किस्म की काग़ज़ है, जिसे साल 2006 में राष्ट्र स्तरीय गैर-भौतिक सांस्कृतिक विरासतों की सूची में शामिल किया गया। शिनच्यांग के भीतर और मध्य व पश्चिमी एशियाई क्षेत्र में कई प्राचीन सांस्कृतिक पुरातात्विक खोज में बड़ी मात्रा में सांगफी काग़ज़ वाले ग्रंथों को पता लगाया गया। लम्बे समय में सांगफी काग़ज़ के प्रसार कार्य में जुटे हुए शिनच्यांग राष्ट्रीय पेंटिंग इंस्टीट्यूट के महासचिव वेइ पाओशान ने कहा कि सांगफी काग़ज़ की तीन विशेषताएं हैं, जिसने ऐतिहासिक संस्कृति के संरक्षण के लिए बड़ा योगदान दिया। उन्होंने परिचय देते हुए कहा:“प्राचीन काल में इस प्रकार के काग़ज़ का प्रयोग मुख्य तौर पर हस्तलिपि, चित्र और दरबारी दस्तावेज़ में प्रयोग किया जाता था। उसकी तीन सबसे बड़ी विशेषताएं हैं। पहला, इस काग़ज़ पर लिपि लिखने और चित्रित करने के हज़ार वर्ष बाद भी रंग नहीं उड़ता। दूसरा, यह काग़ज़ कीड़ों से नष्ट नहीं होता। तीसरा, इस काग़ज़ में नमी नहीं आती और फफूंदी भी नहीं लगती। इस वजह से इतिहास में बड़ी मात्रा में मूल्यवान हस्तलिपि और चित्र इस काग़ज़ से अच्छी तरह सुरक्षित हैं। वह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विकास की साक्षी बन गई है।”

शिनच्यांग के थाछंग क्षेत्र में अर्मिन काउंटी की नुरदाना एडलरहन चानशओ कढ़ाई करते हुए

शिनच्यांग के थाछंग क्षेत्र में अर्मिन काउंटी की नुरदाना एडलरहन चानशओ कढ़ाई करते हुए

कजाक जाति की चानशओ कढ़ाई और बूशओ कढ़ाई का प्रयोग मुख्य तौर पर पर्दे, रज़ाई, वस्त्र, टोपी, जूते आदि वस्तुओं में किया जाता है। साल 2008 में इसे राष्ट्र स्तरीय गैर-भौतिक सांस्कृतिक विरासतों की सूची में शामिल किया गया। शिनच्यांग के थाछंग क्षेत्र में अर्मिन काउंटी की नुरदाना एडलरहन ने 9 साल की उम्र से ही चानशओ कढ़ाई से सीखना शुरु किया। उसने कहा कि कज़ाक जाति की चानशओ कढाई इस जाति के घुमंतू जीवन से संबंधित है। वह अपने पूर्वजों के इस तकनीक का अच्छी तरह उत्तराधिकार करेगी। उसने कहा:“इसकी कच्ची सामग्री ऊन है, जिसमें न तो नमी लगती और न ही गंदी होती। इसकी किनारी डिज़ाइन हमारी जाति का प्रतिनिधित्व है। मैं इसे मेरे दादा-दादी को भेंट करूंगी। यह हमारी जाति के सौ वर्ष पूराने वाली तकनीक है। हमें इसे अच्छी तरह संरक्षण करना चाहिए।”

शेयर

सबसे लोकप्रिय

Related stories