20190113

2019-01-13 21:11:00
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20190113

ईरानी शख्स मसूद जाफ़री वूशू का अभ्यास करते हुए

रिपोर्ट: ईरानी वूशू-प्रेमी मसूद जाफरी की कहानी

ईरान की 8 करोड़ जनसंख्या में पाँच सालों तक चीनी वूशू यानी मार्शल आर्ट का अभ्यास करने वालों की संख्या 55 हज़ार है। इनमें एक वूशू प्रेमी मसूद जाफ़री का नाम उल्लेखनीय है। वूशू का अभ्यास करते-करते 3 दशक से अधिक का समय बीत चुका है। उन्होंने ईरान में कई लोगों को वूशू की ट्रेनिंग दी है और चीनी वूशू संस्कृति और ड्रैगन नृत्य व शेर नृत्य का प्रसार करने का संगठन भी स्थापित किया।

मसूद जाफ़री का चीनी नाम है यून श्याओलोंग। बचपन से ही मार्शल आर्ट के प्रति उसे शौकीन था। 9 वर्ष की उम्र से उसने चीनी वूशू सीखना शुरु किया। यून श्याओलोंग ने कहा कि ब्रुस ली और जैकी चेन की कुंगफ़ु वाली फिल्मों से प्रभावित होकर उसकी वूशू वाली रुचि बढ़ गई। यून श्याओ लोंग ने कहा:“बचपन में मैं कुंगफु फिल्में देखा करता था, जिसकी वजह से चीनी कुंगफु को पसंद करने लगा। उस समय ज्यादातर लोग इस तरीके से चीनी कुंगफु की जानकारी ली थी। मेरा बड़ा भाई एक जिम्नास्टिक कोच है। शुरु में मैंने उसके यहां जिम्नास्टिक का अभ्यास किया। 12 साल की उम्र में मैंने अपने पहले गुरु से 12 सालों तक वूशू सीखा। फिर मैंने जन्मस्थान से विदा लेकर तेहरान आया और प्रशिक्षण कक्षा शुरू की। अभी मैं विभिन्न शहरों में वूशू सिखाता हूँ।”

उस समय ईरान में कई सालों में वूशू का अभ्यास किया और कुछ उपलब्धियां भी हासिल कीं। लेकिन यून शाओलोंग चीनी कुंगफु के उद्गम स्थल शाओलिन मठ का दौरा करना चाहता था। साल 2006 में वह पहली बार मध्य चीन के हनान प्रांत के सोंगशान पर्वत पर स्थित शाओलिन मठ आया और 3 महीने तक प्रशिक्षण किया। उसने शाओलिन मठ द्वारा प्रस्तुत श्यांगशिंग-मुट्ठी प्रमाण पत्र प्राप्त किया। यहां बता दें की श्यांगशिंग-मुट्ठी चीनी कुंगफु का एक हिस्सा है, जो विभिन्न जानवरों की विशेषता और आकार नकल करने वाली मुक्केबाज़ी है। ईरानी शख्स मसूद जाफ़री यानी यून श्याओलोंग ने कहा कि जब वह पहली बार शाओलिन मठ गया था, तब उसे चीनी और अंग्रेज़ी भाषा नहीं आती था, आर्थिक स्थिति भी खराब थी। लेकिन चीनी वूशू की जड़ की खोज करने और अपने सपना को साकार करने के लिए वह चीन आया। शाओलिन मठ में पहुंचने की पहली रात की याद यून श्याओलोंग के लिए अभी-अभी ताज़ा है। उसने कहा:“शाओलिन मठ जाना मेरा बचपन का सपना था। उस समय मैं चीन जाना चाहता था। उस दिन रात को दो बजे मैं शाओलिन मठ पहुंचा। सुबह 4-5 बजे, मठ में घंटी बजायी गई। मैं बाहर आया और देखा कि बहुत से शाओलिंग मठ के प्रशिक्षु दौड़ लगा रहे थे। मैंने भी उनके साथ दौड़ लगाना शुरू कर दिया। यह शाओलिन मठ में मेरा पहला अभ्यास था। इसके बाद तीन महीनों में मैंने बहुत कुछ सीखा। मैंने कुछ चीनी भाषा सीखी और चीनी खान-पान और पर्यावरण के प्रति जानकारी प्राप्त की। मुझे याद है कि वह बहुत ठंडे वाले दिन थे। चीन में भारी बर्फ़वारी हुई थी। यह मेरे लिए अविस्मरणीय यादें हैं।”

शाओलिन मठ से वूशू सीखने के बाद यून श्याओलोंग ईरान वापस लौटा। उसने श्यांगशिंग-मुट्ठी का प्रसार करने का प्रयास किया। अब ईरान के विभिन्न प्रांतों में उसके प्रशिक्षु हैं। उसने चीनी वूशू संस्कृति और ड्रैगन नृत्य व शेर नृत्य के प्रसार के लिए होंगलोंग नामक एक संगठन की स्थापना की। बता दें कि चीनी भाषा में होंग का अर्थ लाल और लोंग का अर्थ ड्रैगन होता है। यून श्याओलोंग ने परिचय देते हुए कहा कि होंगलोंग संगठन ने ईरान के कुछ शहरों में वूशू प्रशिक्षण कक्षा खोली, जिसमें थाईची मुट्ठी और शाओलिन कूंगफ़ू सीखायी जाती है। इस संगठन के पास ड्रैगन नृत्य टीम और शेर नृत्य टीम उपलब्ध हैं, जिन्होंने न केवल ईरान में, बल्कि जॉर्जिया, आर्मेनिया, तुर्की आदि देशों में भी प्रदर्शन किया। पिछले 30 सालों में वूशू सीखने का अनुभव बताते हुए ईरानी शख्स यून श्याओलोंग ने कहा:“वूशू ने कुछ क्षेत्रों में मुझ पर बड़ा प्रभाव डाला। सर्वप्रथम आध्यात्मिक पहलू में मजबूती हुई, मैं अपने क्रोध को कंट्रोल कर शांत हो सकता हूँ। वूशू का आधार और मूल रक्षा करना है, न कि आक्रमण करना। वूशू सीखने के दौरान हमें यह मालूम हुआ। शाओलिन कुंगफु का उदाहरण लें, आम नागरिकों को इसे सीखने से मदद मिलती है। शांति की प्राप्ति, क्रोध पर कंट्रोल, इच्छाशक्ति में वृद्धि और धैर्य की बढ़ोत्तरी आदि। मुझे लगता है कि वूशू शारीरिक गुणवत्ता बढ़ाने के साथ ही जीवन क्षमता भी उन्नत कर सकता है।”

वूशू का अभ्यास करने और प्रशिक्षुओं को सिखाने के अलावा इधर के 3 सालों में यून श्याओलोंग ने 8 बार टीम बनाकर चीनी वूशू संघ द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लिया। वूशू प्रशिक्षण वाले तरीके से वूशू संस्कृति का प्रसार करना सीमित है। यून श्याओलोंग को लगता है कि फिल्म जैसी माध्यम से व्यापक लोगों को वूशू संस्कृति का प्रसार करना चाहिए। साल 2013 से ही उसने“होंगलोंग”और“शाओलिन स्वप्न”दो कुंगफु फिल्में बनाईं, जिनमें“होंगलोंग”नामक फिल्म को साल 2014 में पश्चिमोत्तर चीन के शानशी प्रांत की राजधानी शीआन में आयोजित“पहले रेशम मार्ग अंतरराष्ट्रीय महोत्सव”में“दर्शकों की सबसे लोकप्रिय कहानी वाली फिल्म”का पुरस्कार मिला। अब यून श्याओलोंग अपनी तीसरी फिल्म“श्याओलोंग”की शूटिंग की तैयारी कर रहा है। उसके विचार में कुंगफु वाली फिल्मों से विश्व में अधिक से अधिक लोग वूशू संस्कृति जान सकेंगे। यून श्याओलोंग ने कहा:“यह ही मेरा विचार है। बचपन में मैंने कुंगफु फिल्मों से वूशू दुनिया में प्रवेश किया। मुझे आशा है कि वूशू दुनिया से कुंगफु फिल्मों में प्रवेश कर सकूंगा। यह यिन और यांग का चक्र है। कुंगफु फिल्मों के माध्यम से हमारी प्रभाव शक्ति बढ़ेगी। वूशू शिक्षा देने से हम इस प्रकार का लक्ष्य भी प्राप्त कर सकेंगे। लेकिन वूशू शिक्षा की परिसिमन है। लेकिन फिल्मों के जरिए हम वूशू के प्रभाव को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा सकते हैं।”

ईरानी शख्स मसूद जाफ़री यानी यून श्याओलोंग ने कहा कि पिछले 30 सालों में वूशू सीखने और सिखाने के दौरान उन्हें कुछ न कुछ आशंका भी पैदा हुई। कई मित्रों ने उससे वूशू को छोड़कर बिजनेस करने का सुझाव दिया। लेकिन वूशू कार्य के विकास के प्रति उसका पक्का इरादा है। यून श्याओलोंग ने कहा:“अगर मुझे दूसरा जन्म भी लेना पड़े, तो मैं फिर भी यह कार्य करूंगा। मैं वूशू को प्यार करता हूँ। बीते सालों में कई लोगों ने मुझे यह छोड़कर व्यापार करने या दूसरे व्यवसाय करने का सुझाव दिया। मेरा जवाब था:नहीं। यह मेरा जीवन है, मैं इसे नहीं छोड़ूंगा। भविष्य में मैं दो तरफ़ों में आगे विकास करूंगा। पहला, पेशेवर रास्ते पर आगे बढ़ते हुए वूशू के श्रेष्ठ सुयोग्य व्यक्तियों का प्रशिक्षण करूंगा। दूसरा, व्यक्तिगत वूशू प्रशिक्षण और अभिनय का रास्ता। मसलन् लोगों को थाईची-मुट्ठी और शाओलिन कुंगफु का प्रसार करूंगा, साथ ही साथ वूशू अभिनय टीमों का प्रशिक्षण करूंगा।”

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