अमेरिकी मीडियाः भारत की अर्थव्यवस्था को चीन से "अलग रखना" मुश्किल

2020-07-08 17:18:52
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5 जुलाई की रात को चीन और भारत ने हालिया तनावपूर्ण सीमा समस्या के हल के लिए विचार विमर्श किया और सक्रिय सहमति प्राप्त की। लेकिन भारत की ओर से चीन विरोधी कार्रवाई जारी रही। रायटर की 6 जुलाई की रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार एक नई नीति के तहत चीनी उद्यमों के निवेश संबंधी 50 मामलों की जांच करना चाहती है। इससे पहले भारत ने कुछ चीनी एप्स के खिलाफ भेदभावपूर्ण नियंत्रण के कदम भी उठाये, जिसका कारण अस्पष्ट है।

अमेरिकी चैनल सीएनबीसी ने 6 जुलाई को लेख जारी कर कहा कि भारत कम समय में चीन से दूर नहीं रह सकता है। इधर के सालों में भारत में चीन के व्यापार, निवेश और तकनीक का प्रभाव बहुत बड़ा है। इसलिए भारत का चीन से तुरंत अलग होना बहुत मुश्किल होगा।

चीन अमेरिका के बाद भारत का दूसरा बड़ा व्यापारिक साझेदार है। आंकड़े बताते हैं कि 2019 के अप्रैल माह से 2020 के मार्च के बीच भारत ने चीन से 65 अरब मूल्य वाले डॉलर उत्पादों का आयात किया और चीन को करीब 16.6 अरब डॉलर मूल्य के उत्पाद निर्यात किए।

हाल में भारत ने लॉकडाउन को खत्म किया। देश में आर्थिक स्थिति मंदी में है। कोविड-19 के पुष्ट मामलों की संख्या बढ़ रही है। विश्व सप्लाई श्रृंखला से भारत घनिष्ट रूप से नहीं जुड़ रहा है और अन्य देशों का भारत में निवेश करना आसान बात नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि इधर के वर्षों में भारत के उद्यमों में चीनी पूंजी से स्थिर विकास हुआ है।

भारत के मशहूर थिंक टैंक गेटवे हाउस द्वारा कुछ समय पहले जारी एक रिपोर्ट से जाहिर होता है कि बीते पाँच सालों में चीनी निवेशकों ने भारत की स्टार्ट-अप कंपनियों में कुल 4 अरब डॉलर की पूंजी लगायी है। भारत के नवीन विज्ञान व तकनीक क्षेत्रों में चीनी उद्यमों का अपेक्षाकृत बड़ा निवेश भी है। चीन से आयी पूंजी कम समय में भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों के विकास पर असर डालेगी।

साथ ही भारत विश्व में सबसे तेज विकास करने वाले डिजिटल बाजारों में से एक है। विज्ञान और तकनीकी कंपनियों के लिए इस का बाजार का मूल्य होता है। अलीबाबा, टेनसेंट और टिक-टॉक जैसी चीनी कंपनियों ने ज्यादा से ज्यादा भारतीय उपभोक्तों को आकर्षित करने की कोशिश की। भारत विश्व का विशाल स्मार्ट फोन बाजार भी है। भारत के पहले पाँच स्मार्ट मोबाइल फोनों के ब्रांडों में चार चीनी ब्रांड हैं, जिनकी बाजार में हिस्सेदारी लगभग 80% है, जबकि भारतीय स्मार्ट फोनों की हिस्सेदारी सिर्फ 1% है।

और तो और चीनी उद्यम भारत के इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को अहम उपकरण भी देते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारत चीन को नियंत्रित करने वाली कोई भी कार्यवाई करता है, तो संभवतः सप्लाई बंद होगी और खर्चा बढ़ जाएगा। भारत को इसके लिए बहुत उच्च आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी।

(श्याओयांग)

 

 

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