टिप्पणी:अमेरिका ने अपने सहयोगी पर निर्दय हमला किया
आजकल जब तुर्की मुद्रा संकट से जुझ रहा है, तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने 10 अगस्त को तुर्की के स्टील और एल्यूमीनियम उत्पादों पर आयात शुल्क दोगुना करने का आदेश दिया। इससे पहले अमेरिका ने तुर्की के न्याय मंत्री और गृह मंत्री की अमेरिका में जमा संपत्ति को फ्रोज़न करने की घोषणा की। तुर्की अमेरिका का नाटो सहपाठी है, लेकिन यह समझ से परे है कि अमेरिका ने अपने सहयोगी के खिलाफ ऐसा कदम क्यों उठाया।
गत वर्ष जी-7 शिखर सम्मेलन की समाप्ति पर जर्मन चांसलर मार्केल ने भी निराशा प्रकट करते हुए कहा कि अपने भागीदारों पर भरोसा करने का युग समाप्त है। यूरोप को अपना भाग्य अपने हाथों में लेना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ‘अमेरिका प्रथम’ का नारा घोषित किया। लेकिन उन्होंने इस नारे के तले अमेरिका की जिम्मेदारी और विश्वास छोड़ दिया। राष्ट्रपति बनने के चौथे दिन में ही ट्रम्प ने टीपीपी हाथ पीछे खींच लिये और अमेरिका ने विभिन्न देशों की अनेक सालों तक अथक वार्ताओं से संपन्न पेरिस समझौते को भी रद्द कर दिया। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य देशों और जर्मनी ने वर्ष 2015 में ईरान के साथ नाभिकीय समझौते पर हस्ताक्षर किये। पर राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी इसे रद्द कर दिया। यहां तक कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र यूनेस्को और मानवाधिकार परिषद से भी किनारा कर लिया। इस वर्ष के मई महीने में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध बन्द करने पर सहमति संपन्न हुई, पर इसके कुछ समय बाद अमेरिका ने चीनी मालों पर टैरिफ लगाना शुरू किया।
पर अमेरिका और तुर्की के बीच मुठभेड़ क्यों पैदा होने लगी है?इस का मूल कारण है कि अमेरिका राजनीति में दृढ़ता से तुर्की को नियंत्रित करना चाहता है। इसी कारण से अमेरिका ने वर्ष 2016 के तुर्की के सैनिक विप्लव में हस्तक्षेप किया और सीरिया में कुर्द शक्तियों का साथ दिया। जब तुर्की ने अमेरिका के पादरी ब्रोंसन को गिरफ्तार किया, तो अमेरिका ने तुर्की के अफसरों की संपत्तियों को फ्रोज़न कर जवाब दिया। व्यापार के सवाल पर अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन की प्रणाली छोड़कर एकतरफावादी नीतियां लागू करना शुरू किया। अमेरिका ने अपने सहपाठियों और महत्वपूर्ण व्यापार सहयोगियों पर दंडनीय टैरिफ लगाया। उनमें यूरोप, कनाडा, मेक्सिको, रूस, चीन और भारत भी शामिल है।
अमेरिका विश्व में एकमात्र ही सुपर पावर है। लेकिन अमेरिका दूसरे देशों की सुरक्षा आवश्यकता की उपेक्षा करता है। अमेरिका की वर्ष 2019 में रक्षा बजत 7 खरब 17 अरब अमेरिकी डालर तक जा पहुंचेगी, जो इसके पीछे दसेक देशों की कुल मात्रा से भी अधिक है। अमेरिका के उप राष्ट्रपति ने यह दावा भी किया कि अमेरिका 8 अरब अमेरिकी डालर की पूंजी लगाकर वर्ष 2020 तक अंतरिक्ष सेना की स्थापना करेगा। अमेरिका के अंतरिक्ष सैन्यीकरण से दूसरे देशों को भी अंतरिक्ष शस्त्रीकरण शुरू करना पड़ेगा। तब विश्व की सुरक्षा खतरे में आ जाएगी।
मध्य पूर्व देशों में ऐसा कथन है कि अमेरिका के साथ मित्रता या शत्रुता दोनों ही खतरनाक है। अमेरिका ने निराधार हवाले से इराक पर आक्रमण किया और सद्दाम हुसैन को मार डाला। वर्ष 2011 में हुए “अरब वसंत” के मुहिम में अमेरिका ने अपने मित्र मिस्र के भूतपूर्व राष्ट्रपति मुबारक को भी छोड़ दिया। जर्मनी में किये गये एक जनमत संग्रह के मुताबिक 82 प्रतिशत जर्मन लोगों का मानना है कि अमेरिका अविश्वसनीय है, जबकि 36 प्रतिशत जर्मन लोगों का मानना है कि रूस विश्वसनीय है। तुर्की के राष्ट्रपति एरडोगन ने कहा कि तुर्की के सामने दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं, जैसे ईरान, रूस और कुछ अन्य यूरोपीय देश।
( हूमिन )


