चीन को छोड़कर क्या भारत के वस्त्र उद्योग को सफलता मिलेगी

2020-10-16 18:58:23
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भारत सरकार ने हाल में चीन से रेशम सूत के आयात पर पाबंदी लगाने का फैसला किया। उद्देश्य है कि चीन के वस्त्र कच्चे माल पर निर्भरता कम की जाएगी। इसके साथ अमेरिका ने भी चीनी बुनाई के माल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया। ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक स्थिति में काफी भारतीय लोगों का मानना है कि भारत के वस्त्र उद्योग को तेज विकास का मौका मिलेगा, पर क्या यह आसान है?

वास्तव में भारत हर साल चीन से 46 करोड़ अमेरिकी डॉलर के संश्लिष्ट सूत, 36 डॉलर के नायलॉन और 14 डॉलर के बटन, ज़िपर, हैंगर व पिन जैसे सामान का आयात करता है। इसके अलावा, बुनाई के माल और वस्त्र से संबंधित उपकरण के मामले में भी भारत चीन पर निर्भर रहता है। आयातित रेशम पर निर्भरता कम करने के लिए भारतीय वस्त्र मंत्रालय सिल्क समग्र योजना लागू कर रही है। उद्देश्य है कि स्थानीय रेशम के उत्पादन की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाया जाए।

वहीं, पिछले महीने अमेरिकी सरकार ने 6 चीनी उद्यमों से सूती और वस्त्र के आयात पर पाबंदी लगाई। कुछ लोगों का मानना है कि इससे भारत के सूती पर ज्यादा ध्यान आकर्षित होगा और निर्यात में इजाफा भी बढ़ेगा। लेकिन भारतीय विशेषज्ञों ने कहा कि भारत की तुलना में अन्य दक्षिण एशियाई देश और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को इससे ज्यादा लाभ मिलेगा।

भारत का वस्त्र बाजार विशाल है, पर विश्व बाजार में इसके मजबूत प्रतियोगी भी हैं। वियतनाम दुनिया का तीसरा बड़ा वस्त्र उत्पादक देश है, वहीं बांग्लादेश के कपड़ों का निर्यात पिछले पाँच सालों में 26 अरब डॉलर से 33 अरब डॉलर तक बढ़ा है, जबकि भारत का वस्त्र निर्यात करीब 36 अरब डॉलर के आसपास रहा है।

भारत दुनिया में सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश है और दूसरा बड़ा रेशम उत्पादक देश है। पिछले साल भारत का वस्त्र बाजार करीब 2.5 खरब डॉलर रहा। भारत का वस्त्र उद्योग लगातार कई सालों से दुनिया की पहली पंक्ति में है। लेकिन खेद की बात है कि कोविड-19 महामारी की वजह से भारत के वस्त्र उद्योग पर बड़ा प्रभाव पड़ा। आशा है कि भारत शीघ्र ही महामारी की रोकथाम में विजय पाएगा और सामान्य उत्पादन बहाल करेगा।

(ललिता)

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