समाज के पिछड़े लोगों के लिये काम करते युवा

2019-05-03 19:46:14
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भारत के समाज में बदलाव लाने के लिये हर व्यक्ति अपने स्तर पर छोटी बड़ी कोशिश करता रहता है जिससे कि वो देश और समाज में अपना कुछ योगदान दे सके। अगर व्यक्ति ज़रा सा भी जागरूक है तो वो समाज में बेहतरी लाने के लिये कुछ न कुछ ज़रूर करता है। कोई गरीबों को पहनने के लिये कपड़े बांटता है, कोई शिक्षा देता है, कोई व्यक्ति रोज़गार परक प्रशिक्षण देता है जिससे कि आने वाले दिनों में समाज में हाशिये पर खड़ा आदमी कल को अपने पैरों पर खड़ा हो सके और अपनी रोज़ी रोटी कमा सके।

पिछले दिनों अपना कार्यक्रम बनाते हुए मेरी एक ऐसे ही व्यक्ति से फोन पर बातचीत हुई जो खुद भी अपना जीवन स्तर बदलने के लिये रोज़ाना कश्मकश में जुटा हुआ है वहीं वो स्लम और झोंपड़पट्टी के इलाकों में रहने वाले बच्चों को, मुफ्त में पढ़ाता है, कॉपी किताबें पेंसिल और बैग भी बांटता है, साथ में पिछड़े इलाकों के स्कूलों में जाकर बच्चों को फोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी भी सिखाता है, इसके अलावा समाज में अलग अलग मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के लिये समय समय पर नुक्कड़ नाटक भी करता है।

इनका नाम दिलीप श्रीवास्तव है, इन्होंने करीब उन्नीस वर्ष पहले पत्रकारिता क्षेत्र में अपने जीवन की शुरुआत की थी, दिलीप ने कई टीवी न्यूज़ चैनलों में बतौर वीडियो टेप एडिटर की नौकरी की, लेकिन इनका मन सिर्फ़ नौकरी करने में और खुद के लिये पैसे कमाने से ज्यादा समाज में अपने स्तर पर कुछ योगदान करने में रमता था इसीलिये इन्होंने चैनलों की मोटी पगार वाली नौकरी छोड़कर स्लम और झोंपड़पट्टी में रहने वाले गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने का काम शुरु किया, यंग विज़न फ़ाउंडेशन नाम की संस्था भी बनाई जिससे बड़े स्तर पर समाज के वंचित बच्चों के लिये कुछ किया जा सके।

बातचीत के दौरान दिलीप ने बताया कि वो स्कूलों में जाकर बच्चों को मोबाइल फोन से डॉक्यूमेंटरी फिल्म, न्यूज़ फिल्म और छोटी फिल्में बनाने के गुर सिखाते हैं, इसके लिये वो पहले स्कूल के प्रिंसिपल से बात कर उन्हें अपने काम के बारे में विस्तार से बताते हैं और प्रिंसिपल की रज़ामंदी के बाद बाद ये बच्चों को फिल्म बनाने, फोटोग्राफ़ी की कला सिखाते हैं, दिलीप का मानना है कि ऐसा करने से बच्चों की प्रतिभा को निखारा जा सकता है, हो सकता है कि आगे ये बच्चे फिल्म क्षेत्र को अपना पेशा बनाएं तब इन्हें बहुत सारी बातें पहले से मालूम होने पर इसका लाभ मिलेगा। बकौल दिलीप जब ये बच्चों को मोबाइल फोन से फिल्म बनाने की कला सिखाते हैं तब बच्चों के साथ साथ उनके अध्यापक भी ये कहते हैं कि मोबाइल फोन तो पहले भी हमारे हाथ में था लेकिन हम इसका इतना बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं ये बात हमें मालूम नहीं थी।

दिलीप झोंपड़पट्टी के बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाते हैं जिसके पीछे इनका उद्देश्य ये है कि बच्चों में पढ़ाई करने से सकारात्मकता का संचार होगा जो आगे एक स्वस्थ समाज के विकास में योगदान देगा। समय समय पर दिलीप अपने पैसों से, कुछ पैसे अपने दोस्तों से लेकर इन गरीब बच्चों को पढ़ाई लिखाई के लिये किताबें, कॉपियां, पेंसिल और बैग देते हैं जिससे इन बच्चों का मन पढ़ाई में लगे और ये इस झोंपड़पट्टी से बाहर निकलकर अपना एक बेहतर भविष्य बनाएं।

समाज में फैली कई तरह की बुराईयों पर प्रहार करने के लिये दिलीप राष्ट्रीय नाट्य मंच और दूसरे नाट्य संगठनों के साथ मिलकर जगह जगह पर नुक्कड़ नाटक करते हैं जिससे गरीब लोगों में एक नई जागरूकता का संचार किया जा सके और वो समाज में फैली बुराईयों को समझ सकें और उससे निपटने में सक्षम हो सकें, फिर चाहे वो समाज में फैले अंधविश्वास, असाक्षरता की बात हो या फिर स्वास्थ्य, स्वच्छ जीवन और बेहतर भविष्य बनाने के लिये आगे बढ़ने का रास्ता दिखाने की बात, दिलीप हर विषय पर मानवीय संवेदनाओं को लोगों तक इन नुक्कड़ नाटकों से पहुंचाते हैं।

हम अगर अपने स्तर पर समाज और देश के लिये कोई भी प्रयास करते हैं तो वो व्यर्थ नहीं जाता, और भारत में दिलीप जैसे कई लोग हैं जो ये चाहते हैं कि भारत में एक बदलाव आए, जो बेहतरी के लिये हो, हर स्तर पर बेहतरी आए।

पंकज श्रीवास्तव

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