पहलाज निहलानी – सिनेमा की एक परिभाषा

2019-03-20 17:16:08
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आमतौर पर जब हम फिल्मों की बातें करते हैं तो पर्दे पर दिखने वाले कलाकार, गायक, संगीतकार और फिल्म निर्देशक के बारे में ही बातें करते हैं लेकिन कोई भी फिल्म निर्माता के बारे में बात नहीं करता, जबकि फिल्म बनाने का सारा ज़िम्मा निर्माता का होता है। वही फिल्म के लिये पैसों का प्रबंध करता है, वही फिल्म निर्माण की सारी सामग्री जुटाता है, बड़े कलाकारों को अपनी फिल्म में काम करने के लिये तारीख लेता है और फिल्म बनने के बाद उसे बेचने की कवायद भी वही करता है लेकिन बहुत कम लोग फिल्म निर्माता यानी प्रोड्यूसर के बारे में जानते हैं।

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पहलाज निहलानी निर्माता और निर्देशक होने के साथ साथ भारतीय सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। साथ ही वो 22 वर्षों तक एसोसिएशन ऑफ पिक्चर्स एंड टीवी प्रोग्राम प्रोड्यूसर्स के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, इस पद से पहलाज ने खुद वर्ष 2009 में इस्तीफ़ा दिया था। इस पद पर रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किये जैसे फिल्म उद्योग को संगठित करना, फिल्मों के लिये बैंक फाइनेंस शुरु करवाना, मल्टीप्लेक्स को लाना, पाइरेसी को रोकना, फिल्म उद्योग को इंडस्ट्री का दर्जा देना, सेटेलाइट सिस्टम को बढ़ावा देना काम शामिल हैं। पहलाज निहलानी ने ही फिल्म स्टार गोविंदा और चंकी पांडे को अपनी फिल्मों में मुख्य भूमिका दी जिसके बाद इन दोनों कलाकारों का भविष्य रातों रात बदल गया और वो आसमान की बुलंदियों पर पहुंच गए।

छोटी उम्र में बड़ी शुरुआत -

पहलाज ने अपने करियर की शुरुआत मात्र 13 साल की उम्र में ही शुरु कर दी थी। तभी से वो फिल्मों के वितरण से जुड़े काम करने लगे थे, बाद में वो फिल्मों के निर्माता बने।

1963 में जब पहलाज निहलानी ने 13 साल की उम्र में फिल्म वितरण के क्षेत्र में कदम रखा और अबतक वो 155 फिल्मों को रिलीज़ कर चुके हैं। पहली बार वर्ष 1979 में हथकड़ी फिल्म पहलाज की पहली फिल्म थी जिसके वो निर्माता बने। इस फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा, संजीव कुमार और राकेश रौशन मुख्य कलाकार थे।

प्रोड्यूसरों की अहमियत -

फिल्म जगत में निर्माताओं को फिल्म बनाने के क्षेत्र में होने वाली दिक्कतों का ज़िक्र करते हुए पहलाज निहलानी ने सीआरआई को बताया कि आज के दौर में प्रोड्यूसरों को कोई भी नहीं पूछता है क्योंकि आज स्टूडियो आ गए हैं, एक ज़माना था जब प्रोड्यूसर कलाकारों के लिये खुदा का दर्जा रखते थे, बाद में फिल्म निर्देशकों को ये खिताब मिला और ये खिताब प्रोड्यूसरों और डायरेक्टरों के बीच में ही घूमता रहता था। फिल्म निर्माण दल के बाकी लोग खुद को कर्मचारी समझते थे लेकिन आज का दौर बदल गया है। आज के दौर में स्टूडियो का वर्चस्व बढ़ गया है, और स्टूडियो वही चलते हैं जिनके पास बड़े सितारों की शूटिंग की तारीख़ होती है, बाकी कहानी और दूसरी बातों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। जबकि कहानी फिल्म की आत्मा होती है।

बढ़ता फिल्मों का निर्माण -

इसके साथ ही कलाकार भी प्रोड्यूसर बन गए हैं बावजूद इसके चलने को सिर्फ़ आठ – दस एक्टर्स चल रहे हैं। पहले पूरे भारत में सारी भाषाओं को मिलाकर करीब 800 फिल्में बनती थीं, जबकि आज सोलह सौ से अठारह सौ फिल्में बनती हैं। लेकिन चलने वाले सिर्फ आठ दस कराकार हैं। समय बदल गया है। देशभर में स्क्रीन की संख्या भी बढ़ गयी है।

बदलते दौर में मल्टीप्लेक्स का आगमन -

जहां देश में पहले सिर्फ़ 13 हज़ार सिनेमा हॉल थे वहीं आज उनमें से कई सिनेमा घरों को तोड़ कर नए आठ हज़ार मल्टीप्लेक्स बनाए गए हैं। आज लोग विसालिता भरा जीवन जीना चाहते हैं, इसलिये आज पांच सितारा सिनेमा हॉल बन गये हैं जहां पर चाय भी ढाई सौ रुपये में मिलती है। लेकिन लोग ऐसे सिनेमा हॉल में जाकर बहुत खुश हैं, ऐसे हालात में सिंगल सिनेमा हॉल के लिये मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।

बकौल निहलानी पहले जहां टिकट के दाम बहुत सस्ते होते थे तो दर्शक सिनेमा हॉल में लगने वाली लगभग हर फिल्म देखता था लेकिन आज महंगी टिकट होने के कारण वो कुछ चुनिंदा फिल्में ही देखना पसंद करता है। आज दर्शक वही फिल्में देखता है जिसका रिव्यू बढ़िया हो ऐसे में बिकाऊ मीडिया बड़ी भूमिका निभा रहा है, निर्माता उसे जब पैसे देते हैं तो वो अच्छी रिपोर्ट लिखता है जिससे फिल्म का बाज़ार चमक उठता है। ऐसे में जो फिल्में अच्छी हैं और उनके निर्माताओं ने मीडिया को पैसे नहीं खिलाए तो मीडिया उनके बारे में अच्छे रिव्यू नहीं लिखते जिसका नुकसान उन फिल्मों को उठाना पड़ता है। पहलाज आगे बताते हैं कि अब समय बदल रहा है।

स्टूडियो का चलन -

पहले प्रोड्यूसर कहानी चुनकर कलाकारों के साथ फिल्में बनाता था वहीं आज कुछ प्रोड्यूसर खुद स्टूडियो बन गए हैं और चुने हुए सितारों के साथ एक ग्रुप बना लिया है जिसकी वजह से विदेशी फिल्म स्टूडियो भी उनकी फिल्मों में अपना पैसा लगा रहे हैं, फिर विशेष तारीखों जैसे त्योहार, स्कूलों की छुट्टियों को ध्यान में रखकर हॉल बुक कराए जाते हैं और फिल्मों का ज़बर्दस्त प्रचार किया जाता है, वहीं छोटे प्रोड्यूसरों के पास हॉल में बुकिंग नहीं होती है इससे अच्छी फिल्मों को दर्शक नहीं मिल पाते हैं।

गोविन्दा और चंकी पांडे को दिया बड़ा ब्रेक –

जब गोविंदा फिल्मों में आए तो उस समय मिठुन चक्रवर्ती शीर्ष पर थे और अमिताभ का दौर थोड़ा फीका हो चला था, मिठुन के पास फिल्मों में काम करने के लिये तारीख नहीं थी वहीं गोविंदा की भाव भंगिमाएं बहुत श्रेष्ठ थीं और उनके डांस करने का अंदाज़ नेचुरल और बढ़िया था। पहलाज निहलानी को गोविंदा की सफलता पर पूरा भरोसा था इसलिये उन्होंने गोविंदा से एक ही फिल्म में डांस, एक्टिंग, इमोशन, कॉमेडी सबकुछ करवाया जिसका नतीजा था इल्ज़ाम फिल्म सुपर हिट रही। इसी तरह वर्ष 1987 में आग ही आग फिल्म में चंकी पांडे को पहलाज ने बड़ा ब्रेक दिया जिसमें धर्मेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा, डैनी, मौशमी चटर्जी जैसे बड़े कलाकार थे, पहलाज बताते हैं कि किसी नए कलाकार को अगर बड़े स्टार्स के साथ काम करने का मौका मिले तो उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

सेंसर बोर्ड के रहे अध्यक्ष –

पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे लेकिन इस काम के बारे में उनके विचार ये बताते हैं कि यहां पर काम करने का कोई श्रेय किसी को नहीं दिया जाता है जबकि अपयश हमेशा मिलता रहता है, यहां पर अध्यक्ष के सिर पर ढेर सारी ज़िम्मेदारियां रहती हैं। जो व्यक्ति फिल्मों का जानकार नहीं है उसके लिये ये काम सरकारी दफ्तर में जाने के जैसा है लेकिन जो व्यक्ति पूरी जम्मेदारी के साथ ये काम करता है उसके लिये ये पद कांटों के ताज से कम नहीं है।

भले ही समय के साथ फिल्मों की कहानियां, सिनेमाघर और कहानी को पर्दे पर दिखाने के अंदाज़ में बदलाव आया है लेकिन इसके साथ एक बात ये भी सच है कि पहले के मुकाबले आज हमें हर विषय पर फिल्में देखने को मिलती हैं, आज भारत में फिल्मों के पास कहानियों का अंबार है, फिल्म निर्माण में नित नए प्रयोग हो रहे हैं एक तरफ़ जहां ग्राफ़िक्स का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है तो वहीं शूटिंग के लिये रेड कैमरे का इस्तेमाल भी किया जा रहा है जिससे हाई रेज़ोल्यूशन यानी आठ हज़ार मेगा पिक्सल (8K) पर शूटिंग हो रही है। ये सारे परिवर्तन इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि वैश्विक सिनेमा के परिदृष्य में भारतीय दर्शकों की बढ़ती आकाक्षाओं को देखते हुए फिल्म निर्माण में बहुत से सकारात्मक परिवर्तन हो रहे हैं जो सिनेमा उद्योग के उज्जवल भविष्य को दिखा रहे हैं।

पंकज श्रीवास्तव

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