चीन-भारत संबंध : आत्मविश्वास का महत्व

2017-12-06 16:17:57
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19वीं सीपीसी कांग्रेस में सांस्कृतिक आत्मविश्वास का उल्लेख किया गया। आइये सुनिये इस मुद्दे पर चाइना रेडियो इंटरनेशनल के टिप्पणीकार की समीक्षा।   

 

सपना – यह चाइना रेडियो इंटरनेशनल है। सभी श्रोताओं को सपना की नमस्ते।  

 

हू – और सभी श्रोता दोस्तों को हूमिन का भी नमस्कार।   

 

सपना – हू साहब, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में महासचिव शी चिनफिंग ने अपनी रिपोर्ट में यह प्रस्तुत किया कि हमें चार आत्मविश्वास के विचारों पर डटे रहना चाहिये यानी समाजवादी मार्ग, विचारधारा, राजनीतिक व्यवस्था और संस्कृति का आत्मविश्वास। उन्होंने बल देकर कहा कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास का अधिक बुनियादी, विस्तृत और गहन रूप वाला महत्व है। मुझे याद है कि पहले जो सुनाया गया है वह समाजवादी मार्ग, विचारधारा और राजनीतिक व्यवस्था का आत्मविश्वास है, क्या यह पहली बार है कि पार्टी के नेता ने सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी पेश किया है ?   

 

हू – जी, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 18वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में इसका उल्लेख किया गया है कि हमें चीनी विशेषता वाले मार्ग, चीनी विशेषता वाली विचारधारा और चीनी विशेषता वाली समाजवादी व्यवस्था के आत्मविश्वास पर डटे रहना चाहिये। इससे यह ज़ाहिर है कि कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चीनी जनता अपने देश की राजनीतिक व्यवस्था, विचारधारा और मार्ग के प्रति काफी आश्वस्त है। वर्ष 2016 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव शी चिनफिंग ने पार्टी की 95वीं जयंती पर यह पेश किया कि इन तीनों आत्मविश्वास के अलावा हमें सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी बनाए रखना चाहिये। मेरा विचार है कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास इन तीनों मुद्दों से अधिक अर्थवान है। क्योंकि ये तीन मुद्दे यानी समाजवादी मार्ग, विचारधारा, राजनीतिक व्यवस्था के बारे में जो आत्मविश्वास है, वे सब राजनीतिक हैं । संस्कृति के प्रति जो आत्मविश्वास है, वह और अधिक महत्वपूर्ण है, विशेषकर चीन और भारत जैसे देशों के लिए।

 

सपना – लेकिन भारत में कुछ व्यक्तियों का मानना है कि भारत में जो राजनीतिक व्यवस्था है, वह अधिकांश देशों में चलती रही है, इसलिए राजनीतिक मार्ग या विचारधारा के बारे में भारत को ज्यादा आत्मविश्वास होना चाहिए। लेकिन चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली समाजवादी व्यवस्था के बारे में उन्हें संदेह है, या गलतफहमी लगती है। इसे लेकर आप की क्या समीक्षा है?    

 

हू – जी, मुझसे भी बहुत से भारतीय दोस्तों ने पूछा था कि चीन क्यों समाजवादी मार्ग पर डटा रहेगा ? तब मैं ने जवाब दिया, क्योंकि समाजवाद चीन के लिए सही रास्ता है । बताया गया है कि विश्व में सबसे अच्छा रास्ता नहीं है, रास्ता जो उपयुक्त है, वह सही है। हम दूसरे देशों के राजनीतिक चयन का समादर करते हैं, पर हम इस मामले पर दूसरों के संदेह या उनके वैचारिक भेद के बावजूद अपने राजनीतिक मार्ग पर डटे रहेंगे।

 

सपना – और मुझे याद है कि आप ने यह भी कहा कि चीन और भारत दोनों विश्व में सबसे पुरानी और शानदार प्राचीन सभ्यताएं हैं। प्राचीन काल में चीन और भारत विश्व से आगे चलते रहे थे, लेकिन आधुनिक काल में ये दोनों पश्चिमी सभ्यता द्वारा दबाए गए हैं। और तो और, आधुनिक काल में जो उन्नतिशील प्रणाली है, जैसे रेल मार्ग, विमान, शिक्षा के लिये कॉलेज, संसद, कानून व्यवस्था और राजनीतिक प्रणाली के मोड आदि सब पश्चिम से आते हैं। आधुनिक काल में चीन और भारत के द्वारा जो नवाचार किया गया है, वो बहुत कम है। इन के लिए यह गौरव की बात नहीं है। 

 

हू – जी, बिल्कुल सही। लेकिन चीन और भारत में जो अभी अभियान चलाया जा रहा है, वह भी नवाचार ही है। इधर बीस तीस वर्षों में चीन और भारत ने अपने अन्दरूनी मामलों में सुधार करते हुए विश्व को काफी योगदान दिया है, केवल आर्थिक और तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक संदर्भ में भी शामिल हैं। और हमारे नेता ने पार्टी की कांग्रेस में यह घोषित किया है कि चीन वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार और निर्माण के लिए अपना योगदान पेश करेगा। राजनीतिक रास्ते पर हमें आत्मविश्वास बनाए रखने की काफी आवश्यकता है।

 

सपना – चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव शी चिनफिंग ने पार्टी की कांग्रेस में एक बार फिर सांस्कृतिक आत्मविश्वास पर जोर दिया है। आप के विचार में चीन और भारत के जैसे देशों के लिए सांस्कृतिक आत्मविश्वास और अधिक महत्वपूर्ण है। यह क्यों है, आप कुछ बताइये।

 

हू – क्योंकि चीन और भारत विश्व में सबसे बड़े विकासमान देश हैं। दोनों देशों की जनसंख्या एक अरब से ऊपर है और प्राचीन काल में चीन और भारत दोनों ने बहुत बड़ी और शानदार सभ्यता की शुरुआत की थी, पर आधुनिक काल में हम पश्चिमी देशों के पीछे चले गये हैं। प्राचीन काल में प्राप्त हमारे गौरव को पश्चिमी देशों की आधुनिक सभ्यता के नीचे रौंदा गया था, यह हमारी जनता के दिल में सबसे बड़े दुख की बात है।

 

सपना – और इसीलिये चीन और भारत में लोग देखे जा सकते हैं, जो यूरोपीय संस्कृति के सामने सिर झुकाते हैं, और इन लोगों की दृष्टि से पश्चिम में सब कुछ उन्नतिशील हैं, पर एशिया में सब पिछड़े हुए हैं। श्वेतों के सामने वे अपने को कमतर समझते हैं। हालांकि भारत को सन 1947 में ही स्वाधीनता प्राप्त हुई थी और चीन की मुक्ति भी सन 1949 में पूरी हुई थी। पर एशिया में कुछ व्यक्तियों द्वारा पश्चिम की चापलूसी करने की आदत आज भी नहीं बदली है, यह क्यों है?

 

हू – हां, आप ने जो मुक्ति और स्वाधीनता की चर्चा की है, वह राजनीतिक है, पर मन की जो मुक्ति या स्वाधीनता है वह दूसरी बात है। इधर के वर्षों में चीन और भारत के आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगतियों में काफी सुधार आया है, जिससे हमारी जनता का गौरव भी बहुत बढ़ा है। उसके चलते हमें भी संस्कृति को लेकर आत्मविश्वास का नारा बुलंद करना चाहिये।

 

सपना – इसी दृष्टि से सांस्कृतिक आत्मविश्वास का दायरा और अधिक बढ़ा है । चीन और भारत दोनों की कई हजार सालों की प्राचीन संस्कृति हैं। और इन कई हजार सालों में संस्कृति हमेशा मानसिक सहारे की भूमिका निभाती रही है। लेकिन आधुनिक काल में चीन और भारत पश्चिमी सभ्यता के सामने इतने कमजोर थे, यह क्यों है?

 

हू – आधुनिक काल में चीन और भारत की कमज़ोरी और अक्षमता का दोष उनकी संस्कृतियों को नहीं लगाना चाहिए। इतिहास को प्रभावित करने के अनेक तत्व मौजूद थे, और इतिहास की नदी यहीं तक खत्म भी नहीं, वह आगे बहती जा रही है। इधर दो तीन दशकों में चीन और भारत का प्रदर्शन कितना अच्छा है। सो मुझे काफी विश्वास है कि चीन और भारत अपनी उपलब्धियों से अपने आप को साबित कर सकेंगे।     

 

सपना – जी हां, आपने बिल्कुल सही कहा। और आप का सतत रुख है कि दुनिया में सब कुछ बदल रहा है, संस्कृतियों में भी लगातार विकास और परिवर्तन नजर आ रहा है। विश्वास है कि चीन और भारत हाथ में हाथ लगाकर अपनी सभ्यता का पुनरुद्धार करने के लिए कोशिश करेंगे। अच्छा श्रोता दोस्तों, आज का कार्यक्रम यहीं समाप्त है, अगले सप्ताह में फिर मिलेंगे। अब आप आज्ञा दें, नमस्ते।    

 

हू – नमस्ते।

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