“एशिया में हिन्दी”विषय पर पहली बार की संगोष्ठि पेइचिंग में आयोजित

2017-10-28 16:04:07
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इस संगोष्ठि में जापान, दक्षिण कोरिया, चीन के कई विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों सहित भारत के वर्धा और दिल्ली विश्वविद्यालय से भी प्राध्यापकों ने हिस्सा लिया। संगोष्ठि में न सिर्फ हिन्दी भाषा बल्कि भारत के समाज, विभिन्न वर्गों में साहित्य चिंतन और महाकाव्यों के साथ साथ भाषा विज्ञान और व्याकरण पर भी महत्वपूर्ण चर्चा की गई। दक्षिण कोरिया के हानकुक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर किम वू जू और प्रोफेसर लिम गियुनतुंग ने हिस्सा लिया वहीं जापान में तोक्यो के दाईतो बुनका विश्वविद्यलय के प्रोफेसर हिदेयाकी इशिदा ने उमराव सिंह जाटव के हिन्दी दलित साहित्य का एक उदाहरण पर अपना पर्चा पढ़ा, जापान की ओसाका विश्वविद्यालय की प्रोफेसर हिरोको कोबायाशी ने जापान में हिन्दी के अध्यापन और अध्ययन पर अपना पर्चा पढ़ा इसके अलावा भारत में वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिर्बान घोष ने चीन में हिन्दी का अध्ययन – भारत-चीन द्वीपक्षीय शैक्षणीय सहयोग का संभावित क्षेत्र पर पर्चा पढ़ा, दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रोफेसर अनिल राय ने भारत चीन संबंधों में हिन्दी का योगदान पर अपने विचार रखे, इनके साथ शांगहाई अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा विश्वविद्यालय से प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहानी ने कौरवी का साहित्य और उसके सरोकार पर अपना पर्चा पढ़ा साथ ही चीन के शियान अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रोफेसर राकेश वत्स, लाओयांग विश्वविद्यालय की प्रोफेसर माओ लेई, लायोयांग वि.विद्यालय के ही प्रो. काओ वेई, शांगहाई अंतर्राष्ट्रीय विशविद्यालय की त्सांग यूतुंग, क्वांगतुंग वि.वि. के प्रोफेसर रेन चिंग समेत कई लोगों ने अपने अपने पर्चे पढ़े।

हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य पर आयोजित इस संगोष्ठि से एक बात साफ हो जाती है कि सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर गंभीरता के साथ काम किया जा रहा है। कोई हिन्दी व्याकरण पर तो कोई हिन्दी में शब्दों की पुर्नरावृत्ति पर शोध कर रहा है तो वहीं किसी ने दलित साहित्य पर तो किसी ने सूरसागर जैसे महाकाव्यों पर शोध किया है। हिन्दी के इन सभी विद्वानों का उद्देश्य भारत को सही मायने में जानने के लिये किसी विदेशी भाषा पर निर्भर रहने की जगह हिन्दी भाषा को माध्यम बनाना ये दिखाता है कि हिन्दी को विदेशी धरती पर कुछ विद्वान कितना महत्व दे रहे हैं और इसपर कितनी गंभीरता के साथ शोध कर रहे हैं।

पंकज श्रीवास्तव

 

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