टिप्पणी:अमेरिका की तिब्बती अधिनियम से चीन के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश बेकार
28 जनवरी को अमेरिकी संसद ने “2019 तिब्बत नीति और सहायता अधिनियम” पारित कर अंतर्राष्ट्रीय कानून और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी मानदंडों का उल्लंघन किया, और तिब्बती स्वाधीनता बलों को गलत संकेत भेजा।
अधिनियम में कहा गया है कि "दलाई लामा का उत्तराधिकारी केवल तिब्बती बौद्ध धर्म में धार्मिक समूहों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है", और दलाई के पुनर्जन्म में हस्तक्षेप करने वाले चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। अधिनियम का उद्देश्य तिब्बती स्वाधीनता का सहारा करना और चीन को विभाजित करना ही है।
तिब्बती बौद्ध धर्म के मुताबिक जीवित बुद्ध के पुनर्जन्म में निश्चित अनुष्ठान और प्रणाली है। चीन की केंद्रीय सरकार को हमेशा जीवित बुद्ध के पुनर्जन्म की पुष्टि करने का अधिकार है। दलाई लामा का पुनर्जन्म विशुद्ध धार्मिक मामला और दलाई लामा का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। वह तिब्बत में महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा है। सन 1793 में छिंग राजवंश ने गोल्डन बॉटल में लॉटरी निकालने के जरिये जीवित बुद्ध के पुनर्जन्म को तय करने की प्रणाली स्थापित की। इस प्रणाली से तिब्बती बौद्ध धर्म की सामान्य व्यवस्था तथा देश की एकता की रक्षा करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका की गयी है। वर्ष 2007 में चीन सरकार ने "तिब्बती बौद्ध धर्म में जीवित बौद्ध धर्म के पुनर्जन्म के लिए प्रशासनिक उपाय" पारित कर जीवित बुद्ध के पुनर्जन्म को मान्यता देने के लिए केंद्र सरकार का अधिकार पुष्ट किया।
वास्तव में 14वें दलाई लामा खुद के पुनर्जन्म को भी इसी प्रणाली से केंद्रीय सरकार द्वारा पुष्ट किया गया था। लेकिन आज अमेरिकी संसद ने “2019 तिब्बत नीति और सहायता अधिनियम” पारित कर ऐतिहासिक और धार्मिक प्रणाली को तोड़ना चाहा। यह चीन के अन्दरूनी मामलों में क्रूड हस्तक्षेप है, जो अवैध और अप्रभावी है। इस अधिनियम ने यह धमकी भी दी है कि अगर चीन ल्हासा में अमेरिकी कांसुलेट रखने पर सहमत न जताए, तो अमेरिका में किसी भी नये चीनी कांसुलेट की स्थापना भी असंभव होगी। इससे अमेरिका में कुछ राजनीतिज्ञों का आधिपत्यवादी रुख जाहिर है। वियना कन्वेंशन ऑन कांसुलर रिलेशंस के मुताबिक दूसरे देश में कांसुलेट की स्थापना के लिए मेजबान देश की सहमति की आवश्यकता है। लेकिन ऐसे कांसुलेट की स्थापना में आर्थिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा अपने प्रवासियों की संख्या पर ध्यान रखना चाहिये। पर ल्हासा में अमेरिकी कांसुलेट रखने की कोई शर्ते नहीं है। सन 1950 के दशक से ही अमेरिका के सीआईए ने दलाई लामा को बाहर भागने में मदद की। इसके बाद अमेरिकी संसद में कुछ सदस्यों ने दीर्घकाल तक दलाई लामा ग्रुप की सहायता शुरू की। उन्हों ने तिब्बत सवाल के माध्यम से चीन को नियंत्रित करना चाहा। इसलिए उन्हों ने ल्हासा में कांसुलेट रखकर चीन को विभाजित करने का अड्डा रखना चाहा। बेशक, चीन इस पर कभी सहमत नहीं होगा।
ध्यान रहे कि तिब्बत सवाल कोई जातीय और धार्मिक सवाल नहीं है। वह मानवाधिकार की बात भी नहीं है। वह चीन की प्रभुत्ता और प्रादेशिक अखंडता से जुड़ा सैद्धांतिक सवाल ही है। अमेरिकी संसद में पारित तिब्बत से संबंधित विधेयक चीन के लिए कोई प्रभाव नहीं है। आशा है कि अमेरिका में कुछ लोग तिब्बत सवाल से चीन के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप खत्म करेंगे और चीन-अमेरिका सहयोग को बढ़ाने के लिए अधिक काम करेंगे ताकि द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचने से बचा जा सके।
( हूमिन )