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टिप्पणी: गुप्त मकसद वाले अमेरिकी राजनीतिज्ञ धार्मिक स्वतंत्रता की चर्चा क्यों कर रहे हैं?

2019-07-20 14:39:55
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अमेरिका के उप राष्ट्रपति माइक पेन्स और विदेश मंत्री माइक पोम्पेओ ने 18 जुलाई को अलग अलग तौर पर भाषण देते हुए चीन को धार्मिक स्वतंत्रता को दबाने और मानवाधिकार का आक्रमण करने का आरोप लगाया। वास्तव में उन्होंने तथ्यों को अनदेखा कर धर्म और मानवाधिकार के झंडे के नीचे चीन के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया है। उन का मकसद है कि चीन में विभाजन और हंगामा बनाया जाएगा। इससे चीन-अमेरिका संबंधों को गंभीरता से नुकसान पहुंचाया गया है।

पश्चिमी देशों में कुछ आदमी हमेशा शिंच्यांग और तिब्बत की बात को लेकर चीन की जातीय और धार्मिक नीतियों को बदनाम करना चाहते हैं। पेन्स और पोम्पेओ ने अपने नवीनतम भाषणों में शिंच्यांग प्रदेश में निर्मित उग्रवाद-विरोधी व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण केंद्र को "री-एजुकेशन कैंप" की संज्ञा दी है और कहा कि चीन ने तिब्बत के धार्मिक सूत्रों को "उत्पीड़न" किया। लेकिन वास्तव में शिंच्यांग प्रदेश प्रति 530 मुसलमानों के पास एक मस्जिद है, मस्जिदों की संख्या 24 हजार 400 तक जा पहुंची है। व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण केंद्र में सामान्य भाषा, कानूनी ज्ञान, व्यावसायिक कौशल और गैर-चरमवाद के कोर्स प्रस्तुत किये जाते हैं। इस से हल्के अपराधियों का बचाव किया जाता है ताकि आतंकवाद को रोका जाए। अभी तक शिंच्यांग में तीन सालों के लिए कोई हिंसक आतंकवादी प्रहार नहीं हुआ। इससे यह जाहिर है कि शिंच्यांग में व्यवसायिक कौशल प्रशिक्षण केंद्र रखना सही है।

उधर चीन के तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में कुल 1700 धार्मिक स्थल हैं। मंदिरों में रहने वाले भिक्षुयों और भिक्षुनियों की संख्या 46 हजार तक जा पहुंची है। तिब्बत बौद्ध कॉलेज की स्थापना करने, तिब्बती बौद्ध धर्म की अवतार प्रणाली तथा दूसरे धार्मिक अनुष्ठान का संरक्षण करने और धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन करने से यह जाहिर है कि तिब्बती लोगों को चीनी संविधान में निर्धारित धार्मिक विश्वास रखने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

इधर के वर्षों में अनेक विदेशी राजनयिकों ने शिंच्यांग और तिब्बत का दौरा किया है। उन्होंने माना है कि चीन सरकार ने मानवाधिकार खासकर अल्पसंख्यक जातीयों के मानवाधिकार के संदर्भ में बहुत से कारगर काम किया है। रूस, सऊदी अरब और पाकिस्तान समेत 37 देशों के जेनेवा स्थित राजदूतों ने संयुक्त रूप से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अध्यक्ष और मानवाधिकार के लिए उच्चायुक्त के समक्ष पत्र लिखकर शिंच्यांग प्रदेश में मानवाधिकार की उपलब्धियों और आतंकवाद विरोधी कार्यों की प्रगतियों का उच्च मूल्यांकन किया।

लेकिन अमेरिका के कुछ लोगों ने खुद शिंच्यांग और तिब्बत का दौरा नहीं किया। उन्होंने इन क्षेत्रों में धार्मिक और मानवाधिकार संरक्षण के तथ्यों को अनदेखा कर अफवाह फैलाने से अपना राजनीतिक मकसद पूरा करना चाहा। उधर अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार संरक्षण के संदर्भ में भी बहुत सी समस्याएं हैं। पूरे अमेरिका में मस्जिदों की संख्या शिंच्यांग प्रदेश के एक दसवां से भी कम है। ट्रम्प सरकार ने "मुस्लिम निषिद्ध" का आदेश भेजा। जिससे अमेरिका में अल्पसंख्यक जातियों की धार्मिक और मानवाधिकार स्थितियां बिगड़ रही हैं। जनमत संग्रह के मुताबिक अमेरिका में 42 प्रतिशत लोगों को नस्लीय संबंधों के प्रति चिन्ता रहती है और 75 प्रतिशत मुस्लिमों का मानना है कि देश में मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव मौजूद है।

गौरतलब है कि चीनी संविधान में धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता निर्धारित तो है, पर किसी भी व्यक्ति के द्वारा धर्म के बहाने पर सामाजिक व्यवस्था को तोड़ा जाने और दूसरे नागरिकों को नुकसान पहुंचाये जाने की इजाजत नहीं है। जब कुछ विदेशी संगठनों ने धर्म के बैनर तले चीनी संविधान और कानूनों का उल्लंघन किया है, तब चीन इन के खिलाफ जबरदस्त कदम उठाएगा। यह किसी भी कानून शासन वाले देश को प्राप्त उचित अधिकार है। लेकिन अमेरिका में कुछ व्यक्तियों ने दोहरा मानक अपनाकर चीन में गैर-कानूनी कार्रवाइयों के खिलाफ किये गये कदम को "उत्पीड़न" बताया और कुछ अपराधियों से भेंट कर चीन के अन्दरूमी मामलों में हस्तक्षेप किया। इससे न सिर्फ चीन-अमेरिका संबंधों के लिए हानिकारक है, बल्कि अमेरिका की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाया जाएगा।

चीन और अमेरिका के राष्ट्रपतियों ने कुछ समय पूर्व ओसाका में वार्ता कर तालमेल, सहयोग और स्थिरता के आधार पर व्यापार वार्ता की बहाली करने पर सहमतियां संपन्न कीं। अमेरिकी शैक्षणिक, राजनयिक, सैन्य और व्यापारिक लोगों ने संयुक्त रूप से राष्ट्रपति ट्रम्प और अमेरिकी कांग्रेस को एक खुला पत्र जारी कर कहा कि चीन के साथ शत्रुता रखने से उलटा प्रभाव पड़ेगा। वाशिंग्टन में चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता करने की सहमति मौजूद नहीं है। इससे यह जाहिर है कि माइक पेन्स और पोम्पेओ समेत कुछ व्यक्तियों ने धर्म के बहाने पर चीन के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने से दोनों देशों के राष्ट्रपतियों की सहमतियों और आम जनमतों का उल्लंघन किया है। ऐसा करने से उन खुद को भी ऐतिहासिक कलंक बनी रहेगी।

( हूमिन )


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