टिप्पणी:आईएमएफ में नव उभरती शक्तियों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाना चाहिये
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने 16 जुलाई को अध्यक्ष क्रिस्टिन लागार्ड का इस्तीफा स्वीकृत करने और नये अध्यक्ष निर्वाचित करने वाला कार्यक्रम शुरू करने की बात कही। जबकि कोई भी व्यक्ति नये अध्यक्ष का पद संभाले, आईएमएफ में नव उभरती शक्तियों के बोलने वाले अधिकार और प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाना चाहिये।
वास्तव में आईएमएफ अमेरिका और यूरोप के नेतृत्व में ब्रिटन वुड्स प्रणाली की विरासत है। नई शताब्दी में प्रवेश होने के बाद विश्व की आर्थिक संरचना में भारी परिवर्तन आया है। नव उभरती शक्तियों का तेज़ उद्धार होने के साथ साथ विश्व के आर्थिक शासन में उन का योगदान भी बढ़ता रहा है। दूसरी तरफ वैश्विक आर्थिक प्रशासन व्यवस्था आर्थिक असंतुलन, बहुपक्षीय व्यापार कार्यक्रम तथा संप्रभु ऋण संकट के समाधान में कमजोर रहा है। इसी स्थिति में आईएमएफ में सुधार लाने और नये बाजारों और विकासमान देशों की वैश्विक आर्थिक मामलों में भागीदारी को बढ़ाने का आम रूझान नजर आया है।
सन 2016 में प्रस्तुत आईएमएफ 2010 कोटा और शासन सुधार रूपरेखा के अनुसार 6 प्रतिशत कोटा नये बाजारों और विकासमान देशों तक स्थानांतरित किया गया। चीन का मतदान अधिकार छठे से बढ़कर तीसरे स्थान पर बढ़ा और भारत, रूस और ब्राजील का मतदान अधिकार भी उन्नत हुआ। साथ ही विकसित देशों ने उभरते बाजारों और विकासशील देशों को दो कार्यकारी बोर्ड सीटें दी हैं। लेकिन आईएमएफ के कोटा और शासन की स्थितियों में जो सुधार आया है, वह आर्थिक परिदृश्य के परिवर्तन के अनुकूल नहीं है। मिसाल के तौर पर विश्व के जीडीपी में नव उभरती शक्तियों और विकासमान देशों का अनुपात आधे भाग से ऊपर हो गया है। विश्व की आर्थिक वृद्धि में उन का योगदान भी 80 प्रतिशत तक जा पहुंची है। लेकिन आईएमएफ में सबसे बड़ा मतदान अधिकार फिर भी अमेरिका के पास है।
आजकल आईएमएफ में 15वां कोटा निरीक्षण किया जा रहा है। नये कोटा वितरण पर सहमति संपन्न होने की संभावना मौजूद है। भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस संगठन का नया अध्यक्ष निर्वाचित किया जाए, आईएमएफ में नव उभरती शक्तियों और विकासमान देशों के अनुपात को आगे बढ़ाने की जरूरत है। ऐसे करने से आईएमएफ की निष्पक्षता और वैधता को बरकरार रखा जा सकेगा।
( हूमिन )