बलिदान करना एशियाई सभ्यता की एक अनूठी अवधारणा है : आमिर खान

2019-05-16 11:30:03
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बुधवार को एशियाई सभ्यता के वैश्विक प्रभाव पर एक फोरम आयोजित हुआ, जो एशियाई सभ्यताओं के बीच संवाद पर सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इस फोरम में एशिया और अन्य क्षेत्रों के 40 से अधिक देशों के सरकारी अधिकारियों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और मीडिया संगठनों के प्रमुख, जाने-माने थिंक टैंक, विद्वानों और फिल्म व टेलीविजन कलाकारों ने भाग लिया।

इस फोरम में भारत के जाने-माने फिल्म अभिनेता आमिर खान भी उपस्थित थे और एक भाषण भी दिया। उन्होंने एशियाई सभ्यता के वैश्विक प्रभाव पर बोलते हुए कहा, “फिल्म के दृष्टिकोण से, मैं वैश्वीकरण के बारे में नहीं सोचता हूं, मैं बस दिलों के अंदर रहना चाहता हूं, मैं कहानियां बताता हूं।” उनका कहना है कि आप जितने ईमानदार हैं, आपकी कहानियां उतनी ही बेहतर हैं, और जितने अधिक लोग उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, उतना ही उन्हें देखना पसंद करेंगे।

आमिर ने अपने भाषण में कहा, “दुनिया को यह बताने के लिए एक विशेष प्रयास करें कि आप वास्तव में क्या कहना चाहते हैं। अगर आप ईमानदार हैं, तो यह बात अपने आप दुनिया में चली जाएगी।” उन्होंने एशिया के योगदान को महान बताते हुए कहा कि एशिया की सभ्यताओं ने कागज और छपाई दी, जो चीनी है और ‘शून्य’ का आविष्कार भी किया, जो भारत से है। ये सभी उत्कृष्ट योगदान हैं, जो लोगों की सोच में योगदान करते हैं।

आमिर खान ने यह भी कहा कि चीन ने ताओवाद दिया, जो हमें बताता है कि जीवन क्या है। यह एक अद्भुत विचार है कि मनुष्य और प्रकृति एक हैं। भारत से बौद्ध धर्म आया, जिसका दुनिया पर जबरदस्त प्रभाव है। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस युग में बहुत सारे आदान-प्रदान और संवाद हैं। यह जानना महत्वपूर्ण है कि हम और आप किस प्रकार का प्रभाव चाहते हैं, विशेष रूप से हमारे आसपास के लोगों के लिए, आप उन पर किस प्रकार का प्रभाव डालना चाहते हैं?” उनका मानना है कि दूसरों पर प्रभाव डालने से पहले खुद में बदलाव लाना जरूरी है।

आमिर खान बलिदान की अवधारणा को खास मानते हैं। उन्होंने कहा, “हमारे भारतीय समाज या परिवार में, एक सदस्य दूसरे सदस्य के लिए योगदान और बलिदान करता है, जो हमारे देश का एक महत्वपूर्ण मूल्य है। मुझे नहीं पता कि यह अवधारणा एशिया के बाहर कैसे समझी जाती है, लेकिन बलिदान करना एशियाई सभ्यता की एक अनूठी अवधारणा है।”

(अखिल पाराशर)

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