टिप्पणी: ड्रैगन और हाथी के एक साथ नाचने से सच्ची“एशियाई सदी”आएगी

2018-12-26 15:35:42
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25 दिसम्बर को भारत में सबसे बड़े दोहरे उद्देश्य वाले पुल—बोगीबील पुल पर यातायात शुरू हुआ, इसकी कुल लम्बाई 4.94 किलोमीटर दूर है। इसके उद्घाटन समारोह में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाग लिया। भारतीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह भारत में 16 सालों में निर्मित यूरोपीय मानक वाला एकमात्र पुल है, जिसका 120 साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इस घटना के साथ-साथ चीन और भारत के आर्थिक विकास से संबंधित चर्चा एक बार फिर उभरी हुई है।

एक दूसरे के पड़ोसी और विश्व में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले दोनों विकासशील देश होने के नाते चीन और भारत के बीच आवाजाही का इतिहास 2 हज़ार साल से अधिक पुराना है। आधुनिक काल में दोनों देशों की जनता ने एक दूसरे के जातीय मुक्ति युद्ध में पारस्परिक समर्थन किया, जिससे एशिया के जागरण को आगे बढ़ गया। चीन, भारत और म्यांमार के आह्वान पर स्थापित पंचशील सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में एक रचना भी मानी जाती है।

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लेकिन चीनी और भारतीय नागरिकों को एक दूसरे की समझ भी कम है। साल 2017 में तोंगलांग घटना पैदा हुई, जिससे चीन-भारत संबंध कसौटी पर खरे उतरे। सौभाग्य की बात है कि चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत अप्रैल महीने में मध्य चीन के हूपेई प्रांत की राजधानी वूहान में अनौपचारिक भेंट-वार्ता की, उन्होंने द्विपक्षी संबंधों के स्वस्थ विकास को आगे बढ़ाने में ज्यादा कदम उठने का फैसला किया। इसके तहत दोनों पक्षों ने चीन-भारत उच्च स्तरीय मानविकी आदान प्रदान व्यवस्था स्थापित की।

पिछले हफ्ते दिल्ली में इस व्यवस्था की औपचारिक शुरुआत हुई। चीनी स्टेट काउंसलर और विदेश मंत्री वांग यी ने उद्घाटन समारोह में कहा कि चीन-भारत उच्च स्तरीय मानविकी आदान-प्रदान व्यवस्था की स्थापना शी चिनफिंग और मोदी के बीच संपन्न महत्वपूर्ण आम सहमति है। इस व्यवस्था का शुरू होना चीन-भारत संबंधों के व्यापक विकास को आगे बढ़ाने का अहम कदम है।

वहीं भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि इस व्यवस्था से दोनों देशों के मानविकी आदान-प्रदान के लिए नया मंच मुहैया करवाया जाएगा। द्विपक्षीय संबंध और सहयोग में नयी जीवन शक्ति का संचार होगी। इस व्यवस्था के तहत पहले सम्मेलन के सफल आयोजन से भारत और चीन के बीच मानविकी आदान-प्रदान और सहयोग को नयी मंजिल पर पहुंचेगी और द्विपक्षीय संबंध स्थिर होंगे।

चीन और भारत हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता वाले देश हैं। लम्बे समय में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इतिहास में चीन के कागज़ आविष्कार, चीनी मिट्टी के बर्तन और चाय आदि भारत में प्रवेश हुए, जबकि भारत के चीनी बनाने, खगोल, कैलेंडर, बिल्डिंग और साहित्य आदि चीन में आए। चीनी लोगों को बहुत परिचित पौराणिक कहानी“पश्चिम की तीर्थ यात्रा”थांग राजवंश काल में महाभिक्षु ह्वांत्सांग के भारत में बौद्ध ग्रंथों की प्राप्ति के आधार पर कथा है। यह चीन और भारत के बीच सांस्कृतिक आवाजाही के एक आदर्श कहानी मानी जाती है।

वास्तव में चीन और भारत संस्कृति और मूल्य दृष्टिकोण आदि पहलुओं में मिलते जुलते हैं। इधर के सालों में“दंगल”जैसी हिन्दी फिल्में चीन में बहुत लोकप्रिय रही हैं। इसका एक कारण है कि दोनों देशों की संस्कृति आपस में मान्यता हासिल होती है।

विश्व में सबसे बड़े विकासशील देश होने के नाते चीन और भारत के बीच कई समान विचारधाराएं और हित मौजूद हैं। मसलन् मुक्त व्यापार के संवर्धन, वैश्विकता, विश्व व्यापार संगठन में सुधार और जलवायु परिवर्तन के मुकाबले आदि मामलों में दोनों देशों के पास मिलती-जुलती विचारधारा हैं।

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चीन-भारत उच्च स्तरीय मानविकी आदान-प्रदान का एक अहम भाग चीन-भारत मीडिया मंच है। मीडिया द्विपक्षीय संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। क्योंकि नागरिक आम तौर पर मीडिया की रिपोर्टों से एक दूसरे की समझ लेते हैं। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने मीडिया से आशा जताई कि एक सच्चे चीन, एक सच्चे भारत और लगातार आगे बढ़ रहे चीन-भारत संबंध को दोनों देशों के नागरिकों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पेश किया जाएगा। यह दोनों देशों के मीडिया प्रतिनिधियों का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है।

यह सच है कि चीन-भारत संबंधों में कुछ चुनौतियां फिर भी मौजूद है। दोनों देशों के नेताओं के रणनीतिक नेतृत्व में चीन और भारत के बीच मानविकी आदान प्रदान को आगे बढ़ाने बहुत सार्थक है। जिससे एक दूसरे के बीच गलतफ़हमी कम होगी, पारस्परिक विश्वास बढ़ेगी और दोनों के बीच मौजूद सवाल के समाधान के लिए मददगार साबित होगा।

वर्तमान में वैश्विक अर्थतंत्र पूर्व की और स्थानांतरण कर रहा है। एशिया सबसे जीवन शक्ति उपलब्ध और सबसे तेज़ आर्थिक वृद्धि वाला क्षेत्र है। चीन और भारत की लगातार तेज़ आर्थिक वृद्धि विश्व ध्यानाकर्षक है। कुछ लोगों का अनुमान है कि 21वीं सदी एशिया की शताब्दी होगी। चीनी नेता तंग श्याओफिंग ने कहा था कि चीन और भारत के विकसित होने से सच्चे मायने एशियाई शताब्दी हासिल होगी। पिछले हफ्ते भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि लोग एशिया में चीन और भारत के नेतृत्व की प्रतीक्षा में हैं, ताकि एक एक एशियाई शताब्दी का आगमन हो। यह स्पष्ट है कि चीन और भारत दोनों को हाथ मिलाकर आगे बढ़ना चाहिए। ड्रैगन और हाथी को एक साथ नाचना चाहिए, न कि स्पर्धा करनी चाहिए।

(श्याओ थांग)


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