(इंटरव्यू) चीनी और भारतीय मानसिकता में बहुत ज्यादा अंतर नहीं : मधुलिका रा चौहान

2018-09-26 15:59:56
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(इंटरव्यू) चीनी और भारतीय मानसिकता में बहुत ज्यादा अंतर नहीं : मधुलिका रा चौहान

(इंटरव्यू) चीनी और भारतीय मानसिकता में बहुत ज्यादा अंतर नहीं : मधुलिका रा चौहान

“चीनी लोगों में आगे बढ़ने की बहुत इच्छा है। वे अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ना चाहते हैं, और अपना विकास करने के साथ-साथ अपने देश का भी विकास करना चाहते हैं,” चीन में रह रही एक भारतीय लेखिका, समाजसेवी एवं आईटी प्रोफेशनल मधुलिका रा चौहान ने सीआरआई के साथ खास बातचीत में यह बात कही।

पिछले लगभग 11 वर्षों से चीन के तालियन शहर में रह रही मधुलिका रा चौहान एक आईटी कंपनी में कार्यरत हैं और लेखन व सामाजिक कार्यों में भी अपना समय देती हैं। उन्होंने सीआरआई के साथ खास बातचीत में बताया कि वह वाराणसी, उत्तर प्रदेश (भारत) में संचालित "वानप्रस्थ सामाजिक संस्था", जो महिलाओं व बालिकाओं के स्वास्थ्य के लिए, वृद्धों की देखभाल के लिए व पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्य करती है, उसकी एनआरआई समन्वयक के पद पर अपनी सेवाएं देती हैं।

भारत के मुरादाबाद में पैदा हुईं मधुलिका ने बताया कि उन्हें बचपन से ही लिखने व पढ़ने का शौक रहा है। उन्होंने कई कहानियां और उपन्यास लिखी हैं, जिसमें से 2 का प्रकाशन भी हो चुका है और बाकियों के प्रकाशन की बात चल रही है। साल 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें लेखन व सामाजिक कार्यों में सहयोग व भारत से दूर रह कर भी अपनी जड़ों से जुड़कर सेवा कार्यों के लिए "प्रवासी भारतीय पुरस्कार" से सम्मानित किया गया है। भारत के केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वी.के. सिंह ने उन्हें यह पुरस्कार भेंट किया।

बेहतर जीवन की तलाश में साल 2007 में चीन आयी मधुलिका ने चीन में रहने का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा, “चीनी और भारतीय मानसिकता में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। दोनों देशों के लोगों की सोच व इच्छा आगे बढ़ने की है। भारतीय लोग हमेशा से ही वसुधैव कुटुम्बकम (सारा विश्व एक परिवार है) की सोच रखते हैं, इसलिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ यहां (चीन) के लोगों के साथ तालमेल बैठाने में कोई भी परेशानी नहीं आती है।” उनका मानना है कि दोनों देशों की सभ्यताओं में पुरातन होने के साथ-साथ कई समानताएं भी हैं।

उन्होंने बातचीत में यह भी कहा कि भारत से जुड़ा रहने के लिए वह संस्था के साथ जुड़कर सेवा कार्य कर रही हैं और यहां रहकर अपनी कर्मभूमि (चीन) व जन्मभूमि (भारत) में पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य जागरूकता व वृद्धों की देखभाल में अपना छोटा-सा ही सही, योगदान देकर अपने पूर्वजों से हर समय जुड़े रहने का अहसास करती हैं। उनका कहना है कि चीन के लोगों के प्यार व सहयोग की वजह से ही अब चीन उन्हें दूसरा घर लगने लगा है।

(अखिल पाराशर)


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