हिंदी दिवस की क्या है सार्थकता!

2018-09-14 14:28:27
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हिंदी दिवस की क्या है सार्थकता!

हिंदी दिवस की क्या है सार्थकता!

पीकिंग यूनिवर्सिटी में हिंदी के प्रोफेसर च्यांग चिंगख्वेई ने बताया कि हाल में मॉरीशस में हिंदी सम्मेलन बहुत सफल रहा। सम्मलेन में भारत सरकार की भूमिका काफी सराहनीय रही। अब14 सितंबर को हिंदी दिवस भी मनाया जा रहा है। भारत और वैश्विक स्तर पर हिंदी का महत्व भी बढ़ रहा है। भारत भी अब एक मजबूत शक्ति बन चुका है। मुझे लगता है कि हिंदी दिवस एक सिर्फ दिवस नहीं है, बल्कि हिंदी को लेकर कुछ न कुछ सीखने और करने की प्रेरणा देता है। भारतीय लोगों ही नहीं बल्कि हम विदेशियों को भी यह शक्ति देता है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार और जोर से करें। मैं कहना चाहता हूं कि सरकारी काम में हिंदी का प्रयोग अधिक से अधिक होना चाहिए। मेरा सुझाव है कि अगर भारत सरकार दूसरी देश की सरकारों के साथ समझौते आदि अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में करने चाहिए। ऐेसे में विदेशों में भी पता चलेगा कि भारत में हिंदी का इस्तेमाल होता है। इस तरह सबसे पहले ऊपर के स्तर से हिंदी का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है।  

 

बीजिंग विदेशी भाषा अध्ययन विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ा रहे विकास कुमार सिंह कहते हैं कि हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए तमाम संस्थान खुल चुके हैं। इसके साथ ही हिंदी दिवस मनाया जाता है,  भारत के बाहर विदेशों में भी हिंदी को बढ़ावा देने के लिए काम किया जा रहा है। लेकिन देश के अंदर ही हिंदी को जितना महत्व मिलना चाहिए उतना मिल नहीं रहा है। भारत में अभी भी अंग्रेजी का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हिंदी बोलने वालों को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती। मैंने भारत में रहकर यह महसूस किया है। ऐसा लगता है कि हम भारतीय लोग ही राष्ट्रभाषा के महत्व को नहीं समझते हैं।

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट आशीष गोरे कहते हैं हिंदी को देश की प्रगति का कर्णधार बनाते हुए अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को साथ लेना होगा। इसके जरिए भारतीय लोगों में अंग्रेज़ी न आने के कारण उपजी हीन भावना को दूर करने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

हिंदी अध्यापन से जुड़ी हिना चतुर्वेदी कहती हैं कि आजादी के बाद से भारत एक राष्ट्रभाषा की जरूरत महसूस करता रहा। अब सवाल यह था कि राष्ट्रभाषा के तौर पर किस भाषा का चुनाव किया जाय। भारत में इतनी भाषाएं बोली जाती थी कि उनमें से किसी एक को चुनना दूसरे को नाराज करना था।

लेकिन हिंदी के पक्ष में यह बात गयी कि वह सभी भाषाओं में से सबसे ज्यादा बोली या समझी जाती थी। इस तरह हिंदी को राष्ट्रभाषा के लिए सबसे उपयुक्त समझा गया। दरअसल हिंदी दिवस हमें हिंदी के महत्व को याद दिलाने का काम करता है। देखा जाय तो हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए सिर्फ एक दिवस या आयोजन ही पर्याप्त नहीं है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए, इसे एक आंदोलन मानें कि हिंदी को पूरे देश में प्रचारित करना होगा। वैसे हमारी आंचलिक भाषाएं किसी से कम नहीं हैं, लेकिन हमें देश को एक सूत्र में बांधने के लिए एक भाषा तो चाहिए। वह काम हिंदी बखूबी कर सकती है। क्योंकि हिंदी में अपने अंदर तमाम दूसरी भाषाओं के शब्दों को समाहित करने की खूबी है। प्रचार के लिए सिर्फ हिंदी दिवस काफी नहीं होते। हिंदी को बढ़ावा देने कि लिए जरूरी है अच्छे साहित्य की रचना हो। अच्छा साहित्य होगा तो पाठक मिल ही जाएंगे। बेहतर या अच्छे साहित्य की रचना ही नहीं होगी तो पाठक या श्रोता कहां से आएंगे।

जबकि हिंदी लेखन से जुड़ी अनीता ज्यादा आशावान नहीं हैं, कहती हैं कि हिंदी के अपने ही इस भाषा से मुंह मोड़ रहे हैं। अगर हिंदी दिवस मनाने से हिंदी का भला होता है तो रोज ऐसे दिवस मनाने चाहिए। बकौल अनीता हिंदी के बारे में यह बात कही जा सकती है, जैसे मां-बाप को घर से निकाल कर पहले आश्रम में भेज दिया गया हो। फिर उन्हें सम्मानित करने के लिए हार पहना रहे हैं।

क्वांगतोंग विदेशी भाषा अध्ययन विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने वाली किरण वालिया कहती हैं कि हिंदी आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। हमारे सामने यह चुनौती खड़ी है कि एक ओर हम हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बनाने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर युवा वर्ग अंग्रेजी की तुलना में हिदी बोलना अपनी कमज़ोरी समझता है। खुद को सम्मानित महसूस नहीं करता। या फिर हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग कर स्वयं को गौरवान्वित समझता है। इस तरह हिंदी भाषा का, हिदी बोली का सही रूप बिगड़ता जा रहा है।

 

प्रो. बलदेव भाई कहते हैं कि आज भारत में ही नहीं दुनिया के सैंकड़ों विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। सभी हिंदी प्रेमियों को यह जानकर आश्चर्य और हर्ष होगा कि हाल में मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में दो दर्जन देशों के गैर-भारतीय हिंदी प्रतिनिधि आए थे। उन प्रतिनिधियों की हिंदी बहुत अच्छी है, उनके विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। इससे पता चलता है कि हिंदी का महत्व भारतीय जनमानस के मन और व्यवहार आज भी है। लेकिन अंग्रेज़ी को सरकारों द्वारा प्रतिष्ठा दी जाती रही, तो हिंदी के साथ एक पिछड़ेपन का भाव जुड़ता चला गया कि अंग्रेजी अभिजात्य और तरक्की की भाषा है और हिंदी आम आदमी की भाषा है। हिंदी के साथ आत्महीनता का भाव अनावश्यक रूप से जुड़ता चला गया। इस भाव से बाहर निकलने की जरूरत है।

हिंदी कैसे बनेगी स्वाभिमान की भाषा, इस पर बलदेव कहते हैं कि जनता और हिंदी प्रेमियों के स्तर पर ये बहुत आवश्यक है कि वे हिंदी को व्यवहार में लाते समय एक भाषायी स्वाभिमान के साथ जोड़ें।

गांधी जी ने कहा था कि, जिस राष्ट्र की कोई अपनी भाषा नहीं होती, वह राष्ट्र गूंगा होता है। अंग्रेजी तो उपनिवेश काल में थोपी गयी भाषा है, यह भारतीय भाषा नहीं है। लेकिन बड़ी विडंबना इस बात की है कि जब देश आजाद हुआ, उस वक्त सत्ता पाने वालों ने भारतीय भाषायी स्वाभिमान को दिल में आत्मसात नहीं किया। इसीलिए उन्हें लगा कि हम अंग्रेज़ी के बिना चल नहीं सकते। भले ही अंग्रेजी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा माना जाता हो। लेकिन विश्व में तमाम प्रतिष्ठित देश हैं, जर्मनी, फ्रांस, जापान, चीन या इजराइल। इन सभी देशों में अंग्रेजी का इस्तेमाल नहीं के बराबर होता है। इन्होंने अपनी भाषाओं के महत्व को समझा और विकास किया। इजराइल का उदाहरण प्रमुख तौर पर दिया जा सकता है कि जब वह यहूदी राष्ट्र बना तो उन्होंने बिखरी हुई भाषा हिब्रू को प्रतिष्ठित करने का जिम्मा उठाया।

प्रोफेसर लोहनी कहते हैं, मुझे लगता है कि हिंदी और अंग्रेज़ी की तुलना नहीं होनी चाहिए। हिंदी का मूल्यांकन करते वक्त अंग्रेज़ी ने उसे कितना नुकसान पहुंचाया इस तरह मूल्यांकन करना ठीक नहीं है। अंग्रेजी पहले ही विश्व भाषा बन चुकी थी। अंग्रेजी से परहेज करने वाले देश भी आज अंग्रेजी को अपना रहे हैं। विश्व की तमाम भाषाओं में इंग्लिश के शब्द प्रवेश कर चुके हैं। हां यह बात सही है कि हिंदी में अंग्रेजी के शब्द कुछ ज्यादा आ चुके हैं। शायद इसकी वजह यह भी है कि हम अंग्रेज़ों के उपनिवेश थे। लेकिन कहा जा सकता है कि प्रत्येक भाषा के विकास में अन्य भाषाओं का योगदान होता है। अंग्रेजी की स्वीकार्यता दूसरे तौर पर बढ़ी है कि आप यात्रा पर दूसरे देश जाते हैं, वहां अंग्रेजी से आपका काम चलता है। ऐसे में अंग्रेजी से नुकसान जैसी कोई बात नहीं है।

भारत में उच्च वर्ग या शासक वर्ग अंग्रेजी में खुद को सहज समझता है, जबकि आम तौर पर अंग्रेजी बोलने, लिखने वालों का प्रतिशत बहुत कम है। लेकिन ऊपरी तौर पर मूल्यांकन करने में ऐसा लगता है कि तमाम लोग अंग्रेज़ी में बात करना सुविधाजनक समझते हैं। और हां अगर आज वास्तव में एक कोने से दूसरे कोने में जाकर बात कर सकते हैं या फिर अपने विचार साझा कर सकते हैं, वो भाषा हिंदी है। आज भारत के तमाम कोनों में हिंदी पहुंच चुकी है। लेकिन पूर्व से पश्चिम या दक्षिण में आम लोग अंग्रेजी नहीं जानते हैं। लेकिन उच्च वर्गीय भावना ने लोगों को दबाने का काम किया। लेकिन धीरे-धीरे यंत्र और संसाधनों में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल से साफ है के ये अपना स्थान बना रही हैं।

प्रोफेसर च्यांग चिंगख्वेई कहते हैं मुझे लगता है कि भारत सरकार हिंदी को लेकर गंभीर है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या विदेश मंत्री या अन्य बड़े नेता, हिंदी में अपनी बात रखना पसंद करते हैं। यह हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अच्छा है।

उधर विकास कुमार सिंह कहते हैं,चीन में एक ही भाषा बोली जाती है, वह है चीनी। दक्षिण क्वांगतोंग प्रांत में या कुछ अन्य क्षेत्रों में अपनी भाषाएं हैं। लेकिन पूरे देश में मानक भाषा मंदारिन ही है। स्कूलों, विश्वविद्यालयों में इसी भाषा में अध्ययन होता है। इस तरह पूरा राष्ट्र एक भाषा के जरिए आपस में जुड़ा रहता है।

लेकिन हाल के वर्षों में विशेषकर जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से हिंदी का बेहतर ढंग से प्रचार-प्रसार हो रहा है। मोदी की पहल से हिंदी की लोकप्रियता में इजाफा हुआ है, क्योंकि वह जब भी किसी विदेशी दौरे पर जाते हैं, हिंदी में ही भाषण देते हैं।  

 

अनिल आजाद पांडेय

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