तरक्की के लिये चीन-भारत सहयोग बहुत ज़रूरी

2017-09-24 19:21:35
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तरक्की के लिये चीन-भारत सहयोग बहुत ज़रूरी

तरक्की के लिये चीन-भारत सहयोग बहुत ज़रूरी

अन्य सफल भारतीयों की ही तरह तुषार भानुशाली भी चीन में पिछले 13 वर्षों से रह रहे हैं। तुषार पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर है और पिछले 25 वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, वितरण, लॉजिस्टिक्स और योजना के काम से जुड़े हुए हैं।

वर्ष 2004 के अगस्त में चीन आए भानुशाली चीनियों के काम के प्रति सम्मान, लगन और परीश्रम से बहुत प्रभावित हैं। उनका कहना है कि चीन की तरक्की के पीछे चीनियों की लगन और अपने काम के प्रति सम्मान सबसे ज्यादा है। काम के प्रति चीनियों में भारतीयों के मुकाबले 20 से 30 फीसदी ज्यादा लगन है। चीनी कर्मचारी नियम और निर्देशों का अक्षरश: पालन करते हैं।

तुषार के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में यूरोपीय, अमेरिकी तकनीक को चीनियों ने खरीदा उसपर शोधकर अपने तरीके से बनाया, ये चीनियों के काम के प्रति लगन, विदेशियों से सीखने के उत्साह को दिखाता है।

जहां तक भारत में ऐसी व्यवस्था बहाल करने की बात है तो इस क्षेत्र में अभी आधारभूत संसाधनों की बहुत कमी है। वहीं चीनियों ने लगभग 25 वर्ष पहले ही विदेशी तकनीक खरीदकर उसपर गहन रूप से अध्ययन किया और उस तकनीक को अपने स्तर पर उन्नत किया जिसका नतीजा आज सबके सामने है।

 

इलेक्ट्रॉनिक्स के बाज़ार में 25 वर्ष पहले जहां जापानी कंपनी, सोनी, शार्प, तोशीबा, मोराटा, टीडीके, पैनासॉनिक, नैशनल सरीखी कंपनियों का बोलबाला था तो वहीं आज चीनी और ताईवानी कंपनियों जैसे इयागियो, फंगह्वा, वॉलसीन्स जैसी कंपनियों ने बाज़ार में अपनी साख जमाई है।

 

तुषार के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में चीन, भारत मिलकर काम करें तो इससे तकनीक का विकास होगा। भारत की “मेक इन इंडिया” के तहत कुछ चीनी कंपनियों ने भारत में काम करना शुरु किया है जिनमें ह्वावे, श्याओमी, वाएवो, ओप्पो शामिल हैं, ये पहले स्तर का काम है, इसके बाद दूसरे और तीसरे स्तर पर काम किया जा सकता है। पिछले कुछ समय में चीन में निर्माण लागत बढ़ी है ये कमी भारत अपनी कम लागत से पूरा कर सकता है, दोनों के एकसाथ आने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा।

आने वाले समय में निर्माण क्षेत्र में भारत के पड़ोसी देश – बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश – फिलिपींस, लाओस, वियतनाम, कंबोडिया, थाईलैंड, म्यांमार, मलेशिया और इंडोनेशिया इलेक्ट्रॉनिक्स में अपनी मूलभूत ज़रूरतों के लिये भारत और चीन पर ही निर्भर रहेंगे।

निर्माण के क्षेत्र में कुछ सामान भारत में बने और कुछ चीन में, कुछ समय पहले नोकिया जैसी कंपनियों ने भारत में निर्माण शुरु किया था और मलेशिया को अपना निर्यात केन्द्र बनाया था ऐसा कर के हम दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ अफ्रीकी बाज़ारों पर नज़र रख सकते हैं।

 

चीन की सरकार ने निर्माण क्षेत्र में कम ब्याज पर वित्तीय सहायता देकर उद्योगों को आगे बढ़ाने में मदद की साथ ही सस्ती बिजली, पानी और बेहतर सड़कें, रेल और जल यातायात की सेवाएं मुहैया करवाईं, जिसने उद्योगों को और आगे बढ़ाने में मदद की साथ ही स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन बनाए, अगर ये सारी सुविधाएं हमारे देश में भी सरकार मुहैया करवाए तो हम भी इसी तरह तरक्की कर सकते हैं।   

 तरक्की के लिये भारत की आईआईटी, चीन की छिंगह्वा, पेइचिंग विश्वविद्यालय को आपसी तकनीकी सहयोग करना चाहिए।

श्यामन में हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन के बारे में तुषार भानुशाली ने बताया कि इस पूरे समूह में भारत की आगे बढ़ने की संभावना 70 फीसदी है।

भारत के पिछड़ेपन पर एक एक उदाहरण के रूप में तुषार बताते हैं कि अब से सिर्फ़ छै वर्ष पहले जब पूरे भारत में सिर्फ़ तीन से चार हज़ार किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बने हुए थे उस समय पूरे चीन में अस्सी हज़ार किलोमीटर हाईवे का निर्माण पूरा हो चुका था, भारत लंबे समय तक सिर्फ़ कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर के सहारे तरक्की नहीं कर


सकता इसके लिये उसे निर्माण क्षेत्र में मज़बूती लानी ही होगी।

जबतक भारत का आधारभूत ढांचा मज़बूती के साथ तैयार नहीं होगा तबतक भारत का आगे जाना संभव नहीं है।

हाल ही में जापान ने बुलेट ट्रेन में भारत की मदद की और शिंजो अबे और मोदी ने अहमदाबाद-मुंबई लाइन पर इसकी शुरुआत की है ये बहुत बड़ा कदम है जो भारत को बहुत आगे ले जाएगा क्योंकि यातायात का सारा भार हवाई मार्ग नहीं ढो सकता है, रेलवे को एक मज़बूत रीढ़ की तरह बनना चाहिए।

वहीं सड़क निर्माण के क्षेत्र में नितिन गडकरी ने जो तीन और पांच वर्ष के लक्ष्य निर्धारित किये हैं वो भी एक महत्वपूर्ण कदम है जो भारत की आर्थिक तरक्की में एक वरदान साबित होगा।

 

पंकज श्रीवास्तव

 

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