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स्वर्ग मंदिर

2017-08-15 15:36:00
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यदि आप को पेइचिंग की यात्रा करने का मौका मिला , तो आप लम्बी दीलार , पुराना शाही प्रासाद व समर प्लेस के अलावा जरूर स्वर्ग मंदिर देखने भी जाए , क्यों कि वे सभी प्राचीन चीन के स्थापत्य कल के सर्वोच्च स्तर का प्रतिनिधित्व करते हैं । स्वर्ग मंदिर चीन में अब तक सब से पूर्ण रूप में सुरक्षित सब से बड़ा पूजा स्वरूपी स्थापत्य समूह है । अच्छे मौसम और शांति की प्रार्थना करने के लिए विभिन्न प्राचीन कालों के सम्राट हर साल स्वर्ग मंदिर में पूजा का अनुष्ठान करते थे । सामंती सम्राट स्वर्ग , भूमि , सुर्य , चांद तथा गिरी व नदी से मंगल की प्रार्थना करते थे , लेकिन जिन में से स्वर्ग देवता से प्रार्थना करने का अनुष्ठान सब से महत्वपूर्ण था । प्राचीन चीनी परम्परा के अनुसार सम्राट स्वर्ग राजा का पुत्र होता था , सम्राट स्वर्ग राजा के पुत्र के रूप में जग की प्रजा पर शासन करता था और राज्य का बागडोर संभालता था । इसलिए स्वर्ग की पूजा उन का विशेषाधिकार होता था , यह अधिकार किसी भी अधीनस्थ पदाधिकारी और प्रजा को नहीं होता था । स्वर्ग मंदिर का निर्माण ईसा 1420 में हुआ , जहां मिंग और छिंग राजवंशों ( ईस्वी 1368--1911) के सम्राट स्वर्ग की पूजा करते थे । स्वर्ग मंदिर पेइचिंग के प्राचीन शाही प्रासाद के दक्षिणि में स्थित है ,जिस का क्षेत्रफल शाही प्रासाद से चार गुना बड़ा है । स्वर्ग मंदिर का दक्षिणी भाग की दीवार चौकोर है , जो भूमि का प्रतीक है और उत्तरी भाग की दीवार अर्ध चंद्राकार है , जो स्वर्ग का प्रतीक है , यह डिजाइन प्राचीन चीन की इस मान्यता पर आधारित था कि स्वर्ग गोलाकार होता है और भू-मंडल चौकोर होता है । स्वर्ग मंदिर के भीतरी मंच और बाह्य मंच दो भाग हैं । मंदिर के सभी प्रमुख स्थापत्य निर्माण भीतरी मंच की मध्य धुरी के उत्तर व दक्षिण दोनों ओर केन्द्रित हैं । इस धुरी पर दक्षिण से ले कर उत्तरी अंत तक क्रमशः गोलाकार पूजा मंच , परमेश्वर भवन , स्वर्ग प्रार्थना भवन खड़े नजर आते हैं । गोलाकार पूजा मंच एक विराट तीन मंजिला गोलाकार प्रस्तर मंच है , इस की हर मंजिल पर पत्थर की जंगली होती है , इसी मंच पर सम्राट स्वर्ग की पूजा का अनुष्ठान करते थे । स्वर्ग पूजा का शाही रस्म बहुत जटिल और गंभीर होता था , आम तौर पर चीनी पंचांग के अनुसार हर साल के शीत काल के आगमन के दिन ( हर दिसम्बर की 22 ताऱीख के आपपास ) आयोजित होता है , अनुष्ठान का रस्म सुर्योद्य से पूर्व होता था और सम्राट खुद रस्म का तत्वावधान करते थे । रस्म के आयोजन के समय गोलाकार पूजा मंच के आगे बड़े बड़े आकार वाले लाल लालटेन लटकाए हुए थे , जिन में एक मीटर लम्बी मोमबत्तियां प्रज्वलित होती थी . मंच के दक्षिण पूर्व कोने पर एक विशेष धूपदान रखा जाता था , जिस में पूजा अनुष्ठान में प्रयुक्त पशु और रेशमी कपड़ा जैसी चीजों को जलाया जाता था । रस्म के दौरान सुगंधित धूपबत्ती जलायी जाती थी , बाज साज बजता था और वातावरण अत्यन्त गंभीर और मंगलमय होता था । गोलाकार पूजा मंच के उत्तर में परमेश्वर भवन आता है , वह एक तल्ला वाला छोटा सा गोलाकार भवन है , आम दिनों उस में स्वर्ग देवताओं के पूजा तख्ते रखे गए हैं । परमेश्वर भवन की चारों ओर वृताकार दीवार घिरी हुई है , यह दीवार ध्वनि विज्ञान के प्रयोग से बनायी गई मशहूर प्रतिध्वनि वाली दीवार है , प्रतिध्वनि दीवार बड़ा विचित्र स्थापत्य निर्माण है , यदि आप दीवार के किसी हिस्से पर दबी आवाज में कुछ कहा , तो उस के सामने दूसरी तरफ की दीवार पर आवाज साफ साफ सुनाई देती है । स्वर्ग मंदिर का पूजा में प्रयुक्त होने वाला दूसरा निर्माण स्वर्ग प्रार्थना भवन है , यह तीन मंजिला छज्जों वाला गोलाकार विशाल भवन है , जो तीन तल्लों वाले शिलाधार पर खड़ा है । प्रार्थना भवन एक ऐसा स्थान है , जहां सम्राट हर गर्मियों के मौसम में शानदार फसलों की प्रार्थना करते थे । इसलिए प्रार्थना भवन के निर्माण का कृषि संस्कृति से संबंध था , भवन में फर्श से भीतरी छत तक चार ऊंचे लम्बे चार खंभे खड़े है , कहते थे कि ये वसंत , ग्रीष्म , शरद और जाड़े का प्रतिनिधित्व करते थे । प्राचीन चीन की मान्यता के अनुसार दिन के 12 वक्त होते थे , इसलिए पहले तल्ले की छज्जे को टिकाऊ देते वाले 12 खंभे दिन के 12 वक्तों का प्रतिनिधित्व करते थे , बीच के तल्ले की छज्जे को टिकाने वाले 12 खंभे साल के बारह माहों का प्रतिनिधित्व करते थे , उन की कुल संख्या 24 थी , जो चीनी पंचांग के अनुसार साल के 24 ऋतुओं के प्रतीक थे । स्वर्ग मंदिर में गोलाकार पूजा मंच तथा स्वर्ग प्रार्थना भवन इन दो प्रमुख स्थापत्य निर्माणों के अलावा पश्चिमी द्वार के भीतर संगीत विभाग तथा पशु बलि विभाग भी थे , जहां अलग अलग तौर पर कला मंडली के सदस्य रहते थे और पूजा में प्रयुक्त होने वाले पशु पाले जाते थे । प्राचीन चीनी कारीगरों ने स्वर्ग मंदिर के निर्माण में असाधारण सृजन उजागर किया था । स्थापत्यों पर रंगयोजन में भारी परिवर्तन किया गया था , प्राचीन चीन के शाही स्थापत्य निर्माणों पर मुख्यतः पीले रंग का ग्लाज्ड खपरेल इस्तेमाल किए जाते थे , जो शाही सत्ता के सर्वोपरि महत्व का प्रतीक होता था । लेकिन स्वर्ग मंदिर में कारीगरों ने नीले रंग का प्रयोग किया था , जो आसमानी रंग का द्योतक था । प्रतिध्वनि वाली दीवार की ऊपरी सतह , परमेश्वर भवन तथा स्वर्ग प्रार्थना भवन की बाह्य छतों पर तथा इन दोनों भवनों के सहायक भवनों व प्रांगनों की छतों पर नीले रंग की खपरेल डाली गई थी । वर्ष 1998 में स्वर्ग मंदिर विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया । विश्व विरासत कमेटी का मूल्यांकन है कि स्वर्ग मंदिर चीन में सुरक्षित सब से बड़ा पूजा का काम आने वाला प्राचीन स्थापत्य निर्माण है , उस का डिजाइन सुयोजित और नियमबद्ध है , स्थापत्य संरचना विशेष और बेजोड़ है और सजावट सुन्दर और आकर्षक है , जिस के कारण यह मंदिर विश्वविख्यात हो गया है , जो न केवल चीन के स्थापत्य इतिहास में अहम स्थान बनाता ,साथ ही विश्व स्थापत्य कला का अमोल धरोहर भी है ।

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