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मकाओ गुफा

2017-08-15 15:36:00
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मकाओ गुफा बौद्ध धर्म का विश्वविख्यात सांस्कृतिक धरोहर है ,जो अब तक विश्व में सुरक्षित सब से विशाल और सब से अच्छी तरह संरक्षित बौध कला खजाना मानी जाती है। वह उत्तर पश्चिमी चीन के कानसू प्रांत के त्वेनहुंग शहर के दक्षिण पूर्व में 25 किलोमीटर दूर खड़े मिंगशा पहाड़ की पूर्वी तलहटी में स्थित है । मिंगशा पहाड़ी के पूर्वी पक्ष की चट्टानों पर दक्षिण उत्तर की दिशा में पांच मंजिलों पर खुदी अनगिनत गुफाएं बड़ी सुन्दर शैली में पंक्तिबद्ध अवस्थित हैं । एतिहासिक उल्लेख के अनुसार ईस्वी तीन सौ 66 से ले कर लगातार एक हजार वर्षों की लम्बी अवधि में यहां गुफाओं का निर्माण जारी रहा , सातवीं शताब्दी के थांग राजवंश तक यहां एक हजीर से अधिक गुफाएं खोदी गई थी , इसलिए मकाओ गुफा सहस्त्र बौध गुफा भी कहलाती है ,14वीं शताब्दी तक एक हजार छह सौ अस्सी मीटर लम्बा विशाल गुफा समूह बनाया जा चुका था । सन् 1987 में मकाओ गुफा युनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया । विश्व विरासत कमेटी ने इस का यह मूल्यांकन किया है कि मकाओ गुफा मूर्ति कला तथा भित्ति चित्र कला के लिए विश्व में प्रसिद्ध है , जिस में हजार साल लम्बी पुरानी बौध कला की अभिव्यक्ति होती है ।

चीन के विभिन्न राजवंशों के लोगों ने मकाओ गुफाओं में बड़ी संख्या में बुद्ध मुर्तियां खोदी थीं और रंगीन भित्ति चित्र बनाए थे । मकाओ गुफा पूर्व और पश्चिम को जोड़ने वाले रेशम मार्ग पर स्थित था और प्राचीन काल में पूर्व पश्चिम की धार्मिक व सांस्कृतिक ज्ञान के आदान प्रदान का संगम स्थल था , इसलिए मकाओ गुफा की कलाकृतियों में चीनी और विदेशी कलाओं का अनूठा समावेश हुआ था और विविध कला शैलियों के कारण वह विश्व का शानदार और महान कला खजाना बन गई ।

कालांतर में एतिहासिक परिवर्तन होने तथा विभिन्न प्रकार की क्षति लगने के परिणामस्वरूप मकाओ गुफा समूह में अब कुल पांच सौ गुफाएं बची हैं ,जिन में करीब पचास हजार वर्ग मीटर के भित्ति चित्र तथा दो हजार से ज्यादा बुद्ध मुर्तियां सुरक्षित हैं । गुफाएं आकार और साइज में अलग अलग होती हैं और गुफाओं में सुरक्षित मुर्तियां छोटी बड़ी विविध रूप रंगों में हैं , उन के आभूषण और हस्त मुद्रा भी नाना प्रकार की है , जिस से भिन्न भिन्न एतिहासिक कालों की विशेषता व्यक्त होती है । भित्ति चित्रों में बहुधा बौध धर्म की कथाएं हैं । हजार से अधिक साल गुजरने के बाद भी अब गुफाओं में सुरक्षित भित्ति चित्र रंग में चटक और ताजा लगते हैं । यदि इन चित्रों को एक सूत्र में जोड़ा गया , तो उन की लम्बाई तीस किलोमीटर होगी ।

मकाओ गुफा के भित्ति चित्रों की विषयवस्तु प्रायः बौध धर्म से जुड़ी हुई है , विभिन्न संप्रदायों की बुद्ध , बौधित्सव तथा दिगीश्वर के चित्र है

बौध धर्म की कथाओं पर चित्रावली है और भारत , मध्य एशिया तथा चीन में प्रचलित विभिन्न दंतकथाओं व एतिहासिक हस्तियों की कथाओं पर आधारित चित्र उपलब्ध हैं । विभिन्न कालों के भित्ति चित्रों में विभिन्न जातियों और वर्गों के सामाजिक जीवन , वस्त्र आभूषण ,प्राचीन वास्तु कला , संगीत , नृत्य तथा नटकला के चित्र भी मिलते हैं और चीन और विदेशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान के एतिहासिक मामलों का उल्लेख भी होता है । अतः पश्चिमी विद्वान ने त्वुनहुंग की भित्ति चित्र कला को दीवार पर पुस्तकायल की संज्ञा दी है ।

लेकिन अवार्चीन इतिहास में त्वुनहुंग की मकाओ गुफा पर बड़ी मनमानी लूट खसोट की गई थी , जिस से बेशुमार सांस्कृतिक अवशेष विदेशों में ले जाए गए थे , जो चीन के इतिलास में एक नहीं पुर्ति की जा सकने वाली भंयकर सांसकृतिक क्षति है ।

वर्ष 1900 में मकाओ गुफा के एक गुप्त पुस्तक भंडार का संयो��� से पता लगाया गया , इस गुप्त भंडार को आगे चल कर बौध सूत्र गुफा कहलाने लगी । इस तीन मीटर लम्बे चौड़े भंडार में बौध सूत्रों , दस्तावेजों , रेशमी कपड़ों , चित्रों , रेशमी बुद्ध तस्वीरों तथा हस्तलिपि की प्रतियों के ढेर के ढेर छुपे थे , जिन की संख्या 50 हजार से अधिक थी । ये सांस्कृतिक अवशेष ईस्वी चौथी शताब्दी से ले कर 11 वीं शताब्दी तक के थे और उन में चीन , मध्य एशिया , दक्षिण एशिया तथा यूरोप के इतिहास , भूगोल , राजनीति , जाति , सेना , भाषा लिपि , कला साहित्य , धर्म और औषधि चिकित्सा जैसे सभी क्षेत्रों के विषय मिलते थे , जो चीन का प्राचीन विश्व कोश माना जाता है ।

बौध सूत्र गुफा का पता चलने के बाद उसकी ओर विश्व के विभिन्न देशों के तथाकथित अन्वेषज्ञों का ध्यान आकृट हो गया , वे उसे लूटने के लिए एक के बाद एक त्वुनहुंग आ धमके । मात्र बीस से कम सालों की अवधि में वे त्वुनहुंग की मकाओ गुफा से 40 हजार बौध सूत्र और बड़ी मात्रा में अमोल भित्ति चित्र व मुर्तियां लूट कर अपने देश ले गए, जिस से मकाओ गुफा की संपत्ति को अकूत भारी क्षति पहुंची ।अब भी ब्रिटेन , फ्रांस , रूस , भारत , जर्मनी , डैन्मार्क , स्वीडन , दक्षिण कोरिया , फनलैंड तथा अमरीका में त्वुनहुंग की मकाओ गुफा के हजारों अवशेष संगृहित रहे हैं , जिन की कुल संख्या बौध सूत्र गुफा के कुल अवशेषों का दो तिहाई भाग बनती है ।

बौध सूत्र गुफा का पता लगने के बाद कुछ चीनी विद्वान भी त्वुनहुंग के सांस्कृतिक धरोहरों के अध्ययन में लगे । वर्ष 1910 में प्रथम खपे में चीनी विद्वानों की विशेष रचनाएं प्रकाशित हुईं , इस तरह विश्व उत्कर्ष शास्त्र के नाम से त्वुनहुंग शास्त्र का जन्म हुआ । बीते दशकों में विश्व के विभिन्न देशों के विद्वानों ने त्वुनहुंग कला पर बड़ा उत्सुकता दिखाई और उस पर लगातार अनुसंधान किया । चीनी विद्वानों ने त्वुनहुंग शास्त्र के अध्ययन में जो भारी उपलब्धियां प्राप्त की है , उस का अत्यन्त बड़ा प्रभाव हुआ है ।

मूल्यवान चीनी सांस्कृतिक खजाने के रूप में त्वुनहुंग की मकाओ गुफा की रक्षा को चीन सरकार हमेशा बड़ा महत्व देती आई है । विश्व के विभिन्न स्थानों से मकाओ गुफा का दौरा करने आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है । मकाओ गुफा के अवशेषों की रक्षा के लिए चीन सरकार ने मकाओ गुफा के सामने सानवी पहाड़ की तलहटी में त्वुनहुंग कला संग्रहालय बनाया , जिस में मकाओ गुफा की कुछ कला कृतियों की प्रतियां प्रदर्शित होती हैं ।

इधर के सालों में चीन सरकार ने बीस करोड़ य्वान की राशि लगा कर मकाओ गुफा का काल्पनिक दिजिगल गुफा बनाने की योजना बनायी । सूत्रों के अनुसार दिजिगल गुफा में दर्शक असली मकाओ गुफा देखने का अनुभव पा सकते हैं , दिजिगल गुफा के भीतर घूमते हुए भीतरी स्थापत्य कला , रंगीन मुर्तियां तथा भित्ति चित्र आदि सभी कला कृतियां देखने को मिलती हैं । विशेषज्ञों का कहना है कि दिजिगल मकाओ गुफा के निर्माण से मकाओ गुफा के असली भित्ति चित्रों को क्षति पहुंचने से बचाया जा सकता है और त्वुनहुंग के सांस्कृतिक धरोहकों को पंजीकृत तथा सुरक्षित करने में मदद मिलेगी , ताकि मकाओ गुफा के अवशेषों और संस्कृति की आयु दीर्घ बनायी जाएगी ।

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