सूचना:चाइना मीडिया ग्रुप में भर्ती

एक लाख से कम जन संख्या वाली जातियां

2017-08-15 14:58:41
शेयर
शेयर Close
Messenger Messenger Pinterest LinkedIn

चीन में कुल 20 ऐसी जातियां हैं , जिस की जन संख्या एक लाख से कम है । वे हैं , बुलांग जाति, ताज़िक जाति, आछांग जाति, फुमि जाति, अवनक जाति, नू जाति, चिंग जाति, चिनो जाति, दआंग जाति, पाओआन जाति, रूसी जाति, य्युगु जाति, उज़बेक जाति, मनबा जाति, अलुनछुन जाति, तुलुंग जाति, तातार जाति, हच जाति, गोशान जाति और लोबा जाति ।

लोबा जाति

लोबा जाति की जन संख्या तीन हज़ार के आसपास है । यह चीन में सब से कम जन संख्या वाली जाती है ,जो मुख्यतः चीन के तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के दक्षिण पूर्वी भाग में बसी है । मोथ्वु कांऊटी के उत्तर भाग में रहने वाली लोबा जाति तिब्बती भाषा का प्रयोग करती है, और अन्य स्थानों में बसे लोबा जातीय लोग अपनी लोबा भाषा का प्रयोग करते हैं । लोबा भाषा हान-तिब्बती भाषा श्रेणी का एक अंग है । भिन्न भिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोबा लोगों की बोलियां भी अलग अलग होती हैं । लोबा यह शब्द तिब्बती भाषा से उत्पन्न हैं, जिस का मतलब "दक्षिणी लोग "। तिब्बती लोग लोबा जाति को ऐसा संबोधित करते हैं । वर्ष 1949 में नए चीन की स्थापना से पहले लोबा जाति की अपनी लिपी नहीं थी , कुछ लोबा लोगों को तिब्बती भाषा आती थी । नए चीन की स्थापना के बाद लोबा लोग जातीय समानता अधिकार का उपभोग करते हैं, और राष्ट्र व अन्य जातियों की मदद से आधुनिक रास्ते पर चलने लगे, और लोबा का आर्थिक व सांस्कृतिक विकास तेज़ी से हो रहा । लोबा जाति आदि धर्म में आस्था रखते हैं ।

तुलुंग जाति

तुलुंग जाति की जन संख्या 7400 से थोड़ा अधिक है , जो मुख्यतः युन्नान प्रांत के क्वोंगशान तुलुंग जातीय एवं नू जातीय स्वायत्त कांऊटी के तुलुंग नदी के घाटी क्षेत्र में रहती है । यह जाति हान-तिब्बत भाषा श्रेणी के अन्तगर्त तुलुंग भाषा का प्रयोग करती है , लेकिन अपनी जातीय लिपी नहीं है । तुलुंग जाति प्रकृति को सर्वेश्वर मानती है । इस जाति का नाम "य्वान राजवंश का इतिहास" शीर्षक ऐतिहासिक ग्रंथ में सब से पहले आया , तब उस का नाम छ्याओ था, और मिंग व छिंग राजवंशों में उसे छ्यो व छ्यू कहलाता था । नए चीन की स्थापना के बाद इस जाति के लोगों की इच्छा के अनुसार तुलुंग के नाम का इस्तेमाल किया जाने लगा । पुराने जमाने में तुलुंग जाति की सामाजिक उत्पादन शक्ति बहुत नीचे स्तर की होती थी और आदिम काल के जैसे लकड़ी व बांस से बनाए गए सरल औजार का प्रयोग करती थी , वे आदिम तरीके से खेतीबाड़ी और मछुआगिरी व शिकारी करते थे । वर्ष 1949 में नए चीन की स्थापना के बाद यहां की पिछड़ी स्थिति एकदम बदल गयी । तुलुंग जाति बहुत मेहनती व मेहमाननवाज़ है , अगर किसी घर में कोई काम होगा , तो गांव के सभी लोग उस की मदद रे लिए आते हैं । अगर किसी जानवर का शिकार किया गया , तो शिकार करने में भाग लेने वाले सभी लोगों में उस का बंटवारा किया जाता है । तुलुंग जाति के लोग अपने वचन के वफा हैं, और मित्रता पर भारी महत्व देते है । तुलुंग जाति में रात को किसी के घर का दरवाज़ा बन्द किया जाने की आवश्यकता नहीं है, खोई हुई चीज उस के मालिक को जरूर वापस की जाती है । यह तुलुंग जाति की श्रेष्ठ परम्परागत गुणवत्ता है ।

( चित्रः तुलुंग ज���ति की परम्परागत प्रथा--- बैल से ईस्वर की पूजा )

चिनो जाति

चिनो जाति की जन संख्या 20 हज़ार से ज्यादा है , और वह मुख्य तौर पर दक्षिण पश्चिमी चीन के युन्नान प्रांत के शीश्वांगपानना प्रिफ़ैक्चर में स्थित एक बड़े पहाड़ पर रहती है । चिनो जाति हान-तिब्बती भाषा व्यवस्था की चिनो भाषा का प्रयोग करती है और उस की अपनी जातीयलिपी नहीं है । पुराने जमाने में चिनो जाति प्रकृति को सर्वेश्वर मानती थी और अपने पूर्वज की बड़ी आराधन से पूजा करती थी । चिनो जाति की उत्पति के बारे में कोई लिखित ऐतिहासिक सामग्री नहीं मिलती है , आम तौर पर चिनो जातीय लोग चुगल्यांग नाम के सुप्रसिद्ध प्राचीन चीनीराजनीतिज्ञ और सैन्यशास्त्री की उपासना करते हैं । किवदंती के अनुसार, चीन के त्रिराज्य काल में शु राज्य के प्रधान मंत्री चुगल्यांग ने सेना ले कर को दक्षिण की ओर अभियान चलाया , सेना के कुछ सिपाही फुर नदी और मोच्यांग नदी ,यहां तक कि काफी ज्यादा दूर उत्तर से यहां आए थे , इस से चिनो जाति उत्पन्न हुई । नए चीन की स्थापना के बाद , चिनो जाति आदिम समाज के अंतिम काल से छूट कर सीधे सामाजवादी समाज में प्रवेश कर गई । और उस की आदिम पिछड़ी स्थिति का भी पूर्ण रूप से अंत हो गया । वर्तमान में चिनो जाति के अपने कार्यकर्ता , डाक्टर , व्यापारी के अलावा, कृषि वैज्ञानिक व तकनीशियन भी प्रशिक्षित हुए हैं ।

(चित्रः चिनो जाति की महिला )

अलुनछुन जाति

अलुनछुन जाति की जन संख्या 8 हज़ार से ज्यादा है , और वह मुख्य तौर पर भीतरी मंगोलिया स्वायत्त प्रदेश तथा हेलुंगच्यांग प्रांत के संगम स्थल पर महा शिंगआनलिंग और लघु शिंगआनलिंग पर्वत मालाओं में रहती है । भीतरी मंगोलिया स्वायत्त प्रदेश के हुलुनबेर प्रिफैक्चर में अलुनछुन जातीय स्वायत्त लीग स्थापित है । अलुनछुन जाति अपनी अलुनछुन भाषा का प्रयोग करती है, जो आर्ताई भाषा व्यवस्था का एक अंग है । इस जाति के अपनी लिपी नहीं होने के कारण हान जाति की लिपी का इस्तेमाल करती है । "अलुनछुन" का मतलब "पर्वत पर रहने वाला" है । यह नाम छिंग राजवंश क प्रारंभिक काल के ऐतिहासिक ग्रंथों में देखने को मिलता है । अलुनछुन लोगों का जीवन शिकारी के काम पर निर्भर होता है , साथ ही मछुआगिरी का काम भी करते हैं । अलुनछुन पुरूषों को जानवरों की आदत व जीवन नियम की खूब जानकारी होती है, और उन्हें शिकारी का खासा अनुभव प्राप्त है, इसलिए सभी अलुनछुन पुरूष श्रेष्ठ घुड़सवारी व निशानेबाज है । 20 शताब्दी के 40 वाले दशक तक अलुनछुन जाति आदिम समाज का घूमांतू शिकारी जीवन बिताती थी , जब कोई शिकार मिला , तो कबीले में उस का बराब बंटवारा किया जाता था । इस जाति में आदिम समाज की साझा उपभोग व बराबर वितरण की आदत सुरक्षित थी । चाहे बुढ़े हो, या कमज़ोर , चाहे बीमार हो, या विगलांग , सभी लोगों को शिकार का एक भाग मिल सकता था । यहां तक कि उक्त उन व्यक्तियों को ज्यादा दिया जाता था । नए चीन की स्थापना के बाद अलुनछुन जाति ने समाजवादी समाज में सीधा प्रवेश किया । वर्तमान में उन का अपना स्थाई निवास स्थान कायम हुआ है , और अलुनछुन जाति शिकारी के जीवन से विदा होकर जंगलों व जानवरों की रक्षा करने वाली जाती बन गयी । अलुनछुन लोग बहुत बुद्धिमान है , और वे शाल पेड़ के छाल से कपड़ा, जूता, बोक्स, बालटी आदि विविध सुन्दर हस्तशिल्प चीजें बना सकते हैं । इन चीजों पर रंगबिरंगी डिज़ाइन होती है और बहुत उपयोगी होती है । अलुनछुन जाति मान जाति के सामान धर्म में विश्वास करती और प्रकृति की पूजा करती ।

(चित्रः अलुनछुन जाती के शिकारी )

तातार जाति

तातार जडाति की जन संख्या लगभग पांच हज़ार है, और वह मुख्य तौर पर शिन्च्यांग उइगुर स्वायत्त प्रदेश के यीनिंग, ताछङ और उरूमुची में रहती थी । तातार जाति अपनी तातार भाषा का प्रयोग करती है, जो आर्ताई भाषा व्यवस्था का एक अंग है । वर्तमान में कुछ बुढ़ों में तातार व्यक्ति तातार भाषा का प्रयोग करने के अलावा, अन्य लोग स्थानीय कज़ाखी व वेवूर भाषाओं का प्रयोग करते हैं । तातार जाति ने अरबी अक्षरों के आधार पर अपनी लिपी बनायी है । लेकिन लम्बे समय में कज़ाख जाति और उइगुर जाति के साथ रहने के कारण इन दो जातियों की लिपी धीरे धीरे तातार जाति में प्रचलित हो गई है । तातार जातीय लोग इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं । तातार जाति के पूर्वज थांग राजवंश में चीन के उत्तरी भाग में बसे तुर्कि खां राज्य के एक कबीला तारतार थे । 13वीं शताब्दी में मंगोल जाति के पश्चिमी ओर विस्तार के समय पश्चिमी लोग मंगोल जाति को तातार कहते थे । 19वीं शताब्दी के शुरू में बहुत से तातार लोग रूस से चीन के शिन्च्याग प्रदेश में स्थानांतरित कर आ बसे . और दूसरे विश्व युद्ध के बाद अन्य कुछ तातार लोग भी यहां आए , इस से चीन की तातार जाति पैदा हुई । तातार जाति बहुधा चरवाही है । अब उच्च शिक्षा प्राप्त तातार लोग , विशेषकर शिक्षा का काम करने वाले तातार लोग शहरों व कस्बों में रहते हैं, और शिन्च्यांग उइगुर स्वायत्त प्रदेश के शिक्षा कार्य के लिए अपना योगदान कर रहे हैं ।

(चित्रः तातार जाती का विशेष वास्तु निर्माण है । )

शेयर

सबसे लोकप्रिय

Related stories